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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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४९६ श्रीरामकृष्णवचनामृत २४ मई, १८८४

वशीभूत नहीं किया जा सकता। अपनी परछाईं को पकड़ना कठिन है परन्तु सूर्य जब सिर पर आ जाता है तो परछाईं आधे हाथ के भीतर रहती है।”

भक्त – ईश्वर-दर्शन का स्वरूप कैसा है?

श्रीरामकृष्ण – नाटक का अभिनय नहीं देखा है? लोग सब आपस में बातचीत कर रहे हैं; ऐसे समय परदा उठ गया तब सब लोगों का सारा मन अभिनय में लग जाता है। फिर बाहर की ओर दृष्टि नहीं रहती। इसी का नाम है समाधिस्थ होना।

“फिर परदा गिरने पर पुनः बाहर की ओर दृष्टि। मायारूपी परदा गिरने पर फिर मनुष्य बहिर्मुख हो जाता है। (नरेन्द्र बन्द्योपाध्याय के प्रति) तुमने अनेक देशों में भ्रमण किया है। कुछ साधुओं की कहानी सुनाओ।”

बन्द्योपाध्याय ने भूटान में दो योगियों को देखा था, वे आधा सेर नीम का रस पी जाते थे, ये ही सब कहानियाँ कह रहे हैं। फिर नर्मदा के तट पर साधु के आश्रम में गये थे। उस आश्रम के साधु ने पैण्ट पहने बंगाली बाबू को देखकर कहा था, 'इसके पेट में छुरी है।'

श्रीरामकृष्ण – देखो, साधुओं के चित्र घर में रखने चाहिए, इससे सदा ईश्वर का उद्दीपन होता है।

बन्द्योपाध्याय – मैंने आपका चित्र कमरे में रखा है और साथ ही एक पहाड़ी साधु का चित्र भी रखा है – हाथ में गांजा की चिलम में आग जल रही है।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, साधुओं का चित्र देखने से उद्दीपन होता है। जैसे मिट्टी का बना हुआ आम देखने से वास्तविक आम का उद्दीपन होता है, युवती स्त्री देखने से लोगों के मन में जिस प्रकार भोग का उद्दीपन होता है।

“इसीलिए तुम लोगों से कहता हूँ कि सदैव ही साधु-संग आवश्यक है। (बन्द्योपाध्याय के प्रति) संसार की ज्वाला तो देखी है। भोग लेने में ही ज्वाला है। चील के मुँह में जब तक मछली थी, तब तक झुण्ड के झुण्ड कौए आकर उसे तंग कर रहे थे।

“साधु-संगति में शान्ति होती है। जल के भीतर मगर बहुत देर तक रहता है, साँस लेने के लिए एक एक बार जल के ऊपर चला आता है। उस समय साँस लेकर शान्त हो जाता है।”

नाटकवाला – जी आपने भोग की बातें कहीं सो ठीक है। ईश्वर से भोग माँगने पर अन्त में विपत्ति होती है। मन में कितने प्रकार की कामनाएँ उठ रही हैं, सभी कामनाओं से तो मंगल नहीं होता। ईश्वर कल्पतरु हैं। मनुष्य उनसे जो भी कुछ माँगता है, वही उसे प्राप्त होता है। अब उसके मन में यदि ऐसी भावना हो कि 'ये तो कल्पतरु हैं अच्छा, देखें, यदि शेर यहाँ पर आ जाय तो जानों।' बस शेर की याद करते ही शेर आ खड़ा होता है और उसे खा जाता है।