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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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२४ मई, १८८४ | परिच्छेद ८० | ४९७

श्रीरामकृष्ण – हाँ, यह ध्यान में रखना कि शेर आता है। अधिक और क्या कहूँ, इधर मन रखो, ईश्वर को न भूलो – सरल भाव से उन्हें पुकारने पर वे दर्शन देंगे।

“एक और बात – नाटक के अन्त में कुछ हरिनाम करके समाप्त किया करो। इससे जो लोग गाते हैं और जो लोग सुनते हैं वे सभी ईश्वर का चिन्तन करते करते अपने अपने स्थानों में जायेंगे।”

नाटकवाले प्रणाम करके बिदा हुए।

गृही भक्तों की स्त्रियों को उपदेश

दो भक्तों की स्त्रियों ने आकर श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया। वे श्रीरामकृष्ण का दर्शन करने आयी हैं, इसलिए उपवास किये हुई हैं। दोनों ही घूँघटवाली, दो भाइयों की पत्नियाँ हैं। उम्र यही २२-२३ वर्ष के भीतर ही होगी। दोनों ही पुत्रों की माताएँ हैं।

श्रीरामकृष्ण – (स्त्रियों के प्रति) – देखो, तुम शिवपूजा किया करो। कैसे पूजा करनी होती है, 'नित्यकर्म' नाम की पुस्तक है, उसे पढ़कर देख लेना। देवपूजा करने से बहुत देर तक देवता का काम कर सकोगी। फूल चुनना, चन्दन घिसना, देवता के बर्तनों को मलना, देवता के लिए जलपान की सामग्री को सजाना – ये सब काम करने से उधर ही मन लगा रहेगा। नीच बुद्धि, हिंसा, क्रोध ये सब भाग जायेंगे। तुम दोनों – देवरानी जेठानी जब आपस में बातचीत किया करो, तो देवताओं की ही बातें किया करो।

“किसी प्रकार से ईश्वर में मन को लगा देना। एक बार भी उनकी विस्मृति न हो। जैसे तेल की धार – उसके बीच कुछ और नहीं है। एक ईंट या पत्थर को भी यदि ईश्वर मानकर भक्ति के साथ उसकी पूजा करो, तो उससे भी उनकी कृपा से ईश्वर-दर्शन हो सकता है।

“पहले जो कहा, शिवपूजा – यह सब पूजा करनी चाहिए। उसके बाद मन पक्का हो जाने पर अधिक दिन पूजा नहीं करनी पड़ती। उस समय सदा ही मन का योग बना रहता है – सदा ही स्मरण-मनन होता रहता है।”

बड़ी बहू – (श्रीरामकृष्ण के प्रति) – हमें क्या कृपा कर कुछ मन्त्र दे देंगे?

श्रीरामकृष्ण – (स्नेह के साथ) – मैं तो मन्त्र नहीं देता? मन्त्र देने से शिष्य का पाप-ताप लेना पड़ता है। माँ ने मुझे बच्चे की स्थिति में रखा है। अब तुम्हें जो शिवपूजा के लिए कह दिया है वही करो। बीच-बीच में आती रहना, बाद में ईश्वर की इच्छा से जो होने का है, होगा। स्नान-यात्रा के दिन फिर आने की चेष्टा करना।

“घर पर हरिनाम करने के लिए मैंने जो कहा था, क्या वह हो रहा है?”

बहू – जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण – तुम लोग उपवास करके क्यों आयी हो? खाकर आना चाहिए।

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