श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ मई, १८८४ परिच्छेद ८० ४९५
हो जाता है।
"मन को जिस रंग में रँगवाओगे उसका वही रंग हो जाता है। मन मानो धोबी के घर का धुला हुआ कपड़ा है।"
विद्या – तो इसे एक बार पहले धोबी के घर भेजना होगा।
श्रीरामकृष्ण – हाँ, पहले चित्तशुद्धि, उसके बाद मन को यदि ईश्वर-चिन्तन में छोड़ दो, तो उसी रंग का बन जायगा। फिर यदि संसार करो, नाटकवाले का काम करो या जो कुछ भी करो, उसी प्रकार का बन जायगा।
(३)
श्रीरामकृष्ण ने थोड़ा सा ही विश्राम किया था कि कलकत्ते से हरि, नारायण, नरेन्द्र बन्द्योपाध्याय आदि ने आकर भूमिष्ठ हो उन्हें प्रणाम किया। नरेन्द्र बन्द्योपाध्याय प्रेसीडेन्सी कॉलेज के संस्कृत अध्यापक राजकृष्ण बन्द्योपाध्याय के पुत्र हैं। घर में मेल न होने के कारण श्यामपुकुर में अलग मकान लेकर स्त्री-पुत्र के साथ रहते हैं। बहुत ही सरलचित्त व्यक्ति हैं; २९-३० साल की उम्र होगी। जीवन के शेष भाग में उन्होंने प्रयाग में निवास किया था। ५८ वर्ष में उनका देहान्त हुआ था।
ध्यान के समय वे घण्टा-ध्वनि आदि नाना प्रकार के शब्द सुनते थे। भूटान, उत्तर पश्चिम तथा अन्य अनेक प्रदेशों में उन्होंने भ्रमण किया था, बीच-बीच में श्रीरामकृष्ण का दर्शन करने आते थे।
हरि (स्वामी तुरीयानन्द) उन दिनों अपने बागबाजार के मकान में भाइयों के साथ रहते थे। जनरल असेम्बली में प्रवेशिका (मैट्रिक) तक पढ़कर उस समय घर पर ईश्वर-चिन्तन, शास्त्र-पाठ तथा योग का अभ्यास किया करते थे। कभी कभी दक्षिणेश्वर में जाकर श्रीरामकृष्ण का दर्शन करते थे। श्रीरामकृष्ण बागबाजार में बलराम के घर जाने पर उन्हें कभी कभी बुला लेते थे।
बौद्धधर्म की बात: ब्रह्म ज्ञानस्वरूप है
श्रीरामकृष्ण – (भक्तों के प्रति) – बुद्धदेव की बात हमने अनेक बार सुनी है। वे दस अवतारों में से एक हैं। ब्रह्म अचल, अटल है, निष्क्रिय है और ज्ञानस्वरूप है। जब बुद्धि उस ज्ञानस्वरूप में लीन हो जाती है, उस समय ब्रह्मज्ञान होता है, उस समय मनुष्य बुद्ध बन जाता है।
"न्यांगटा (तोतापुरी) कहा करता था, मन का लय बुद्धि में, और बुद्धि का लय ज्ञानस्वरूप में हो जाता है।
"जब तक 'अहं' भाव रहता है, तब तक ब्रह्मज्ञान नहीं होता। ब्रह्मज्ञान होने पर, ईश्वर का दर्शन होने पर 'अहं' अपने वश में आ जाता है। ऐसा न होने पर 'अहं' को