श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
२४ मई, १८८४ | परिच्छेद ८० | ५०३
| २४ मई, १८८४ | परिच्छेद ८० | ५०३ |
|---|
अनुभव कर लेने पर क्या वह फिर रुकता है ?
श्रीरामकृष्ण – (हँसकर) – हा; लकड़ी में एक बार आग लग जाने पर फिर बुझती नहीं। (भक्तों के प्रति) ये विश्वास की अनेक बातें जानते हैं।
बन्धो. – मेरा विश्वास बहुत अधिक है!
श्रीरामकृष्ण – अपने घर की औरतों को बलराम की लड़कियों के साथ लाना।
बन्धो. – बलराम कौन हैं?
श्रीरामकृष्ण – बलराम को नहीं जानते? बोसपाड़ा में घर है।
किसी सरलचित्त व्यक्ति को देखकर श्रीरामकृष्ण आनन्द में विभोर हो जाते हैं। बन्द्योपाध्याय बहुत सरल हैं। निरंजन भी सरल है। इसीलिए उसे भी बहुत चाहते हैं।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर के प्रति) – तुम्हें निरंजन से मिलने के लिए क्यों कह रहा हूँ? यह देखने के लिए कि वह वास्तव में सरल है या नहीं।
<br> <div align="center">□ □ □
</div>परिच्छेद ८१
परिच्छेद ८१
संसार में किस प्रकार रहना चाहिए
(१)
जन्मोत्सव दिन। भक्तों के संग में
श्रीरामकृष्ण पंचवटी के नीचे पुराने वटवृक्ष के चबूतरे पर विजय, केदार, सुरेन्द्र, भवनाथ, राखाल आदि बहुत से भक्तों के साथ दक्षिण की ओर मुँह किये बैठे हैं। कुछ भक्त चबूतरे पर बैठे हैं। अधिकांश चबूतरे के नीचे, चारों ओर खड़े हुए हैं। दिन के एक बजे का समय होगा। रविवार २५ मई १८८४।
श्रीरामकृष्ण का जन्म-दिन फाल्गुन शुक्ला द्वितीया है। परन्तु उनका हाथ अभी अच्छा नहीं हुआ, इसलिए अब तक जन्मोत्सव नहीं मनाया गया। अब हाथ बहुत कुछ अच्छा है। इसलिए भक्तगण आनन्द मनाना चाहते हैं। सहचरी का गाना होगा। सहचरी की उम्र ज्यादा हो गयी है, परन्तु कीर्तन करने में उसकी प्रसिद्धि है।
मास्टर श्रीरामकृष्ण को कमरे में न देख पंचवटी की ओर चले आये। देखा, सब के मुख पर प्रसन्नता झलक रही है। उन्होंने यह नहीं देखा कि श्रीरामकृष्ण भी पेड़ के नीचे चबूतरे पर बैठे हैं। मास्टर खड़े थे – श्रीरामकृष्ण के बिलकुल सामने। उन्होंने व्यग्रतापूर्वक पूछा, वे कहाँ हैं? उनकी यह बात सुनकर सब के सब बड़े जोर से हँस पड़े। एकाएक सामने श्रीरामकृष्ण को देखकर वे लज्जित हो गये, उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। देखा श्रीरामकृष्ण के बाईं ओर केदार (चटर्जी) और विजय (गोस्वामी) चबूतरे पर बैठे हुए हैं। श्रीरामकृष्ण दक्षिण की ओर मुँह किये बैठे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य, मास्टर से) – देखो, हमने दोनों को – केदार और विजय को कैसा मिला दिया है!
श्रीवृन्दावन से श्रीरामकृष्ण माधवी-लता ले आये थे। उसे पंचवटी में १८६८ ई. में लगाया था। अब वह लता खूब बड़ी हो गयी है। छोटे-छोटे लड़के उस पर बैठकर झूल रहे हैं, नाच रहे हैं, श्रीरामकृष्ण आनन्दपूर्वक देखते हुए कह रहे हैं – 'बन्दर के बच्चों का सा भाव है, गिर जाने पर भी नहीं छोड़ते!'
सुरेन्द्र चबूतरे के नीचे खड़े हैं। श्रीरामकृष्ण स्नेहपूर्वक कह रहे हैं – तुम ऊपर चले
२५ मई, १८८४ | परिच्छेद ८१ | ५०५
२५ मई, १८८४ | परिच्छेद ८१ | ५०५
आओ, इस तरह पैर भी मजे में झुला सकोगे!
सुरेन्द्र ऊपर चले गये। भवनाथ कुर्ता पहने हुए बैठे हैं, यह देखकर सुरेन्द्र ने कहा, 'क्यों जी, आप विलायत जा रहे हैं क्या?'
श्रीरामकृष्ण हँसते हुए कहते हैं, हमारा विलायत ईश्वर के पास है।
श्रीरामकृष्ण भक्तों से अनेक विषयों पर बातचीत कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – मैं कभी कभी धोती-कपड़ा फेंककर आनन्दमय होकर घूमता था। शम्भू ने एक दिन कहा, 'क्यों जी, तुम इसीलिए कपड़े फेंककर घूमते हो! – बड़ा आराम मिलता है! – मैंने एक दिन ऐसा करके देखा था।'
सुरेन्द्र – आफिस से लौटकर कपड़े उतारता हुआ कहता हूँ, माँ, तुमने कितने बन्धनों से जकड़ रखा है।
श्रीरामकृष्ण – अष्टपाशों से बाँध रखा है। लज्जा, घृणा, भय, जाति-अभिमान, संकोच, छिपाने की इच्छा आदि सब।
श्रीरामकृष्ण गाने लगे। पहले गाने का भाव है – 'माँ, मुझे यही खेद है कि तुम्हारे जैसी माता के रहते भी मेरे जागते हुए घर में चोरी हो।' दूसरे गाने का अर्थ है – 'माँ, तुम इस संसार में खूब पतंग उड़ा रही हो। आशा की वायु पर पतंग उड़ रही है, उसमें माया की डोर लगी हुई है।'
श्रीरामकृष्ण – माया की डोर स्त्री-पुत्र हैं। विषय से वह डोर मांजी गयी है, इसीलिए उसमें इतनी तेजी आ गयी है। विषय अर्थात् कामिनी-कांचन।
श्रीरामकृष्ण फिर गाने लगे। गीत का भाव – “संसार में पासा खेलने के लिए आना है। यहाँ आकर मैंने बड़ी-बड़ी आशाएँ की थीं। आशा की आशा भग्न दशा ही है। पहले मेरे हक में पंजा आया। पौबारह! अठारह, सोलह, जिस तरह फिर फिरकर आया करते हैं, उसी तरह मैं भी युग और युगांतरों में आता गया। कच्चे बारह के पड़ने पर, माँ, पंजे और छक्के में मुझे बंध जाना पड़ा। छः दो आठ, छः चार दस, माँ, ये कोई मेरे वंश में नहीं हैं। इस खेल में मुझे कोई यश न मिला। अब तो बाजी भी खतम होनी चाहती है।”
श्रीरामकृष्ण – पंजा अर्थात् पञ्चभूत। पंजे और छक्के में बँध जाना, अर्थात् पञ्चभूतों और षड्रिपुओं के वश में आना। छः तीनों नौ को अंगूठा दिखाना, अर्थात् छः रिपुओं के बस में न आना और तीनों गुणों के पार हो जाना।
“सत्त्व, रज और तम, इन तीनों गुणों ने आदमी को अपने वश में कर रखा है। तीनों भाई-भाई हैं। सत्त्व के रहने पर वह रज को बुला सकता है और रज के रहने पर वह तम को बुला सकता है। तीनों गुण चोर हैं। तमोगुण विनाश करता है, रजोगुण बद्ध करता है, सतोगुण बन्धन तो जरूर खोलता है, परन्तु वह ईश्वर के पास तक नहीं ले जा सकता।”
विजय – (सहास्य) – सत् भी चोर है न?
५०६ श्रीरामकृष्णवचनामृत २५ मई, १८८४
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – वह ईश्वर के पास नहीं ले जा सकता, परन्तु रास्ता दिखा देता है।
भवनाथ – वाह! कैसी सुन्दर बात है!
श्रीरामकृष्ण – हाँ, यह बड़ी ऊँची बात है।
भक्तगण ये सब बातें सुनकर आनन्द मना रहे हैं।
(२)
कामिनी-कांचन के सम्बन्ध में उपदेश
श्रीरामकृष्ण – बन्धन का कारण कामिनी-कांचन है। कामिनी-कांचन ही संसार है। कामिनी-कांचन ही हमें ईश्वर को देखने नहीं देता।
यह कहकर श्रीरामकृष्ण ने अंगौछे से मुख छिपा लिया। फिर कहा, “क्या अब तुम लोग मुझे देख रहे हो? यही आवरण है। यह कामिनी-कांचन का आवरण दूर हुआ नहीं कि चिदानन्द मिले।
“देखो न, जिसने स्त्री का सुख छोड़ा उसने संसार का सुख छोड़ा, ईश्वर उसके बहुत निकट हैं।”
कोई भक्त बैठे, कोई खड़े ये सब बातें सुन रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (केदार, विजय आदि से) – स्त्री का सुख जिसने छोड़ा, उसने संसार का सुख छोड़ा। यह कामिनी-कांचन ही आवरण है। तुम्हारे इतनी बड़ी बड़ी मूंछें हैं, तो भी तुम लोग उसी में हो! कहो, मन ही मन विचार करके देखो।
विजय – जी हाँ, यह सच है।
केदार चुप हैं। श्रीरामकृष्ण फिर कहने लगे – “सभी को देखता हूँ, स्त्रियों के वशीभूत हैं। मैं कप्तान के घर गया था। वहाँ से होकर राम के घर जाना था। इसलिए कप्तान से कहा – 'गाड़ी का किराया दे दो।' कप्तान ने अपनी स्त्री से कहा। वह स्त्री भी वैसी ही थी – 'क्या हुआ' 'क्या हुआ' करने लगी! अन्त में कप्तान ने कहा, 'खैर वे ही लोग (राम आदि) दे देंगे।' गीता-भागवत-वेदान्त सब स्त्री के सामने झुकते हैं। (सब हँसते हैं।)
“रुपया-पैसा और सर्वस्व बीबी के हाथ में! और फिर कहा जाता है – 'मैं दो रुपये भी अपने पास नहीं रख सकता – न जाने मेरा स्वभाव कैसा है।'
“बड़े बाबू के हाथ में बहुत से काम हैं, परन्तु वे किसी को देते नहीं। एक ने कहा गुलाब-जान के पास जाकर सिफारिश कराओ तो काम हो जायगा। गुलाब-जान बड़े बाबू की रखेली है।
“पुरुषों में यह समझ नहीं रह गयी कि देखें कि वे स्त्रियों के कारण कितना उतर
२५ मई, १८८४ | परिच्छेद ८१ | ५०७
| २५ मई, १८८४ | परिच्छेद ८१ | ५०७ |
|---|
गये हैं।
“किले में जब गाड़ी पर सवार होकर पहुँचा, तब जान पड़ा कि मैं साधारण रास्ते से होकर आया। वहाँ पहुँचने पर देखा तो चार मंजिल नीचे चला गया था। रास्ता ढालू था। जिसे भूत पकड़ता है, वह नहीं समझ सकता है कि उसे भूत लगा है। वह सोचता है, मैं बिलकुल ठीक हूँ।”
विजय – (सहास्य) – कोई ओझा मिल गया तो वह उतार देता है।
श्रीरामकृष्ण ने इसका विशेष उत्तर नहीं दिया, केवल कहा, वह ईश्वर की इच्छा है। वे फिर स्त्रियों के सम्बन्ध में कहने लगे।
श्रीरामकृष्ण – जिससे पूछता हूँ, वही कहता है, जी हाँ, मेरी स्त्री अच्छी है। किसी की स्त्री खराब नहीं निकली! (सब हँसते हैं।)
“जो लोग कामिनी-कांचन लेकर रहते हैं, वे नशे में कुछ समझ नहीं पाते। जो लोग शतरञ्ज खेलते हैं, वे बहुत समय तक नहीं समझते कि कौनसी चाल ठीक होगी; परन्तु जो लोग अलग से देखते हैं वे बहुत कुछ समझते हैं।
“स्त्री मायारूपिणी है। नारद राम की स्तुति करते हुए कहने लगे – ‘हे राम, जितने पुरुष हैं, सब तुम्हारे ही अंश से हुए हैं और जितनी स्त्रियाँ हैं, वे सब मायारूपिणी सीता के अंश से हुई हैं। मैं और कोई वरदान नहीं चाहता। यही करो जिससे तुम्हारे पादपद्मों में शुद्धा भक्ति हो। फिर तुम्हारे मोहिनी-माया में मुग्ध न होऊँ।’ ”
सुरेन्द्र के छोटे भाई गिरीन्द्र और उनके भतीजे नगेन्द्र आदि आये हुए हैं। नगेन्द्र वकालत के लिए तैयारी कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (गिरीन्द्र आदि से) – तुम लोगों से कहता हूँ, तुम लोग संसार में न फँस जाना। देखो, राखाल को ज्ञान और अज्ञान का बोध हो गया है – सत् असत् का विचार पैदा हो गया है – अब मैं उससे कहता हूँ तू घर जा, कभी कभी यहाँ आना, दो एक रोज रह जाया करना।
“और तुम लोग आपस में मिलकर रहोगे, तभी तुम्हारा कल्याण होगा, और आनन्दपूर्वक रहोगे। नाटकवाले अगर एक स्वर से गाते हैं तो नाटक अच्छा होता है, और जो लोग सुनते हैं, उन्हें भी आनन्द मिलता है।
“ईश्वर पर अधिक मन रखकर और संसार में थोड़ा मन लगाकर संसार का काम करना।
“साधुओं का बारह आने मन ईश्वर पर रहता है, चार आने दूसरे कामों में लगाते हैं। साधु ईश्वर की ही कथा पर अधिक ध्यान रखते हैं। साँप की पूँछ पर पैर रखने से फिर रक्षा नहीं। शायद पूँछ में उसे अधिक चोट लगती है।”
श्रीरामकृष्ण झाऊतल्ले की ओर जाते समय सींती के गोपाल से छाते के बारे में कह
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
५०८ श्रीरामकृष्णवचनामृत २५ मई, १८८४
गये हैं। गोपाल ने मास्टर से कहा, 'वे कह गये हैं, अपना छाता कमरे में रख देना।' पंचवटी में कीर्तन का आयोजन होने लगा। श्रीरामकृष्ण आकर बैठे। सहचरी गा रही है। भक्तगण चारों ओर बैठे हैं, कोई कोई खड़े भी हैं।
कल शनिवार अमावस्या थी। जेठ का महीना है। आज ही से मेघ दिखलायी देने लगे। एकाएक आँधी भी चल पड़ी। श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ अपने कमरे में चले आये। निश्चय हुआ कि कीर्तन उसी कमरे में होगा।
श्रीरामकृष्ण – (सींती के गोपाल से) – क्यों जी छाता ले आये हो?
गोपाल – जी नहीं, गाना सुनते ही सुनते भूल गया।
छाता पंचवटी में पड़ा हुआ है, गोपाल जल्दी से लेने के लिए चले गये।
श्रीरामकृष्ण – मै इतना लापरवाह तो हूँ, फिर भी इस दरजे को अभी नहीं पहुँचा।
"राखाल ने एक जगह निमन्त्रण की बात पर तेरह तारीख को कह दिया ग्यारह तारीख!
"और गोपाल आखिर गौओं के पाल (समूह) ही तो हैं! (सब हँसते हैं।)
"वही, जो एक सुनारों की कहानी है – एक कहता है 'केशव', दूसरा कहता है 'गोपाल', तीसरा कहता है 'हरि', चौथा कहता है 'हर'! उसमें, उस गोपाल का अर्थ है, गौओं का पाल (समूह)!" (सब हँसते हैं।)
सुरेन्द्र गोपाल को लक्ष्य करके हँसते हुए कह रहे हैं – 'कान्हा कहाँ हैं?'
(३)
कीर्तन करनेवाली गौरांग के संन्यास का कीर्तन गा रही है। श्रीरामकृष्ण गौरांग-संन्यास का कीर्तन सुनते सुनते खड़े होकर समाधिमग्न हो गये। उसी समय भक्तों ने उनके गलें में फूलों की माला डाल दी। भवनाथ और राखाल श्रीरामकृष्ण को पकड़े हुए हैं कि कहीं गिर न जायँ। श्रीरामकृष्ण उत्तर की ओर मुँह किये हुए हैं। विजय, केदार, राम, मास्टर, मनमोहन, लाटू आदि भक्तगण मण्डलाकार उन्हें घेरकर खड़े हैं।
कृष्ण ही अखण्ड सच्चिदानन्द हैं वे ही जीव-जगत् हैं
धीरे धीरे समाधि छूट रही है। श्रीरामकृष्ण सच्चिदानन्द श्रीकृष्ण से बातचीत कर रहे हैं। 'कृष्ण' इस नाम का एक एक बार उच्चारण कर रहे हैं। कभी कभी साफ उच्चारण भी नहीं होता। कह रहे हैं – "कृष्ण! कृष्ण! सच्चिदानन्द! – कहाँ हो, आजकल तुम्हारा रूप देखने को नहीं मिलता! अब तुम्हें भीतर भी देख रहा हूँ और बाहर भी। जीव, जगत्, चौबीस तत्त्व सब तुम्हीं हो। मन, बुद्धि सब तुम्हीं हो। गुरु के प्रणाम में है –
अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
२५ मई, १८८४ | परिच्छेद ८१ | ५०९
| २५ मई, १८८४ | परिच्छेद ८१ | ५०९ |
|---|
तुम्हीं अखण्ड हो, चराचर को व्याप्त किये हुए भी तुम्हीं हो। तुम्हीं आधार हो, तुम्हीं आधेय हो। प्राण-कृष्ण! मन-कृष्ण! बुद्धि-कृष्ण! आत्मा-कृष्ण! प्राण हे गोविन्द! मेरे जीवन हो!"
विजय को भी आवेश हो गया है। श्रीरामकृष्ण कहते हैं, बाबू क्या तुम भी बेहोश हो गये हो?
विजय – (विनीत भाव से) – जी नहीं।
कीर्तन करनेवाली ने गाया – 'सदा ही हृदय में रखती, ऐ प्राण प्यारे!' श्रीरामकृष्ण फिर समाधिमग्न हो गये। – टूटा हाथ भवनाथ के कन्धे पर है।
श्रीरामकृष्ण का मन जब कुछ बहिर्मुख हुआ, तब गानेवाली ने गाया – तुम्हारे लिए जिसने सर्वस्व का त्याग किया, उसे भी इतना दुःख!
श्रीरामकृष्ण ने गानेवाली को प्रणाम किया। बैठकर गाना सुन रहे हैं। – कभी कभी भावाविष्ट हो रहे हैं। गानेवाली ने गाना बन्द कर दिया। श्रीरामकृष्ण बातचीत करने लगे।
श्रीरामकृष्ण – (विजय आदि भक्तों के प्रति) – प्रेम किसे कहते हैं? ईश्वर पर जिसका प्रेम होता है – जैसे चैतन्यदेव का – वह संसार को तो भूल जायगा ही, किन्तु इतनी प्रिय वस्तु यह जो देह है, वह उसे भी भूल जायगा।
प्रेम के होने पर क्या होता है, इसका हाल श्रीरामकृष्ण एक गीत गाकर बतला रहे हैं। गीत का भाव है :–
"मेरे वे दिन कब आयेंगे जब हरि हरि कहते हुए मेरी आँखों से धारा बह चलेगी – शरीर पुलकायमान हो उठेगा – संसार की वासना मिट जायेगी – दुर्दिन दूर होंगे और सुदिन आयेंगे। ईश्वर की ऐसी दया कब होगी?"
श्रीरामकृष्ण खड़े होकर नृत्य कर रहे हैं। भक्तगण भी उनके साथ नाच रहे हैं। श्रीरामकृष्ण ने मास्टर की बाँह पकड़ कर उन्हें मण्डल के भीतर खींच लिया।
नृत्य करते हुए श्रीरामकृष्ण फिर समाधि में डूब गये। चित्रवत् खड़े रह गये। केदार समाधि भंग करने के लिए अब कह रहे हैं –
"हृदय-कमल मध्ये निर्विशेषं निरीहं, हरि-हर-विधि-वेद्यं योगिभिर्ध्यानगम्यम्। जनन-मरण-भीति-भ्रंशि सच्चित्स्वरूपं, सकल-भुवन-बीजं ब्रह्म-चैतन्यमीड़े।।"
क्रमशः श्रीरामकृष्ण की समाधि छूटी। उन्होंने आसन ग्रहण किया और नाम ले रहे हैं – ॐ सच्चिदानन्द! गोविन्द! गोविन्द! गोविन्द! योगमाया! – भागवत भक्त भगवान!
कीर्तन और नृत्य की जगह की धूल श्रीरामकृष्ण ले रहे हैं।
५१० श्रीरामकृष्णवचनामृत २५ मई, १८८४
(४)
संन्यासी का कठिन व्रत। संन्यासी और लोकशिक्षा
श्रीरामकृष्ण गंगा के किनारेवाले गोल बरामदे में बैठे हुए हैं। पास ही विजय, भवनाथ, मास्टर, केदार आदि भक्तगण हैं। श्रीरामकृष्ण एक एक बार कह रहे हैं, हा कृष्ण चैतन्य!
श्रीरामकृष्ण – (विजय आदि भक्तों से) – घर में खूब राम नाम किया गया है, कोई कहता था, इसीसे खूब रंग जमा!
भवनाथ – तिस पर संन्यास की बात!
श्रीरामकृष्ण – अहा! क्या भाव है!
यह कहकर श्रीरामकृष्ण ने गौरांग पर एक गाना गाया। गीत के समाप्त होने पर आपने विजय आदि भक्तों से कहा – “कीर्तन में बहुत ही अच्छा कहा है! – संन्यासी को नारी की ओर नजर भी उठाकर न देखना चाहिए, संन्यासी का धर्म यही है।”
विजय – जी हाँ।
श्रीरामकृष्ण – संन्यासी को देखकर लोग शिक्षा लेंगे न, इसीलिए इतना कठोर नियम है। संन्यासी को स्त्रियों का चित्र भी न देखना चाहिए। उसके लिए ऐसा कठोर नियम है। काला बकरा माता की बलि पर चढ़ाया जाता है, परन्तु जरा भी कहीं घाव हुआ तो फिर उसकी बलि नहीं दी जाती। स्त्रियों का संग तो करना ही नहीं चाहिए। इतना ही नहीं वरन् उनसे बातचीत करना भी संन्यासी के लिए निषिद्ध है।
विजय – छोटे हरिदास ने एक भक्त स्त्री के साथ बातचीत की थी, चैतन्यदेव ने हरिदास का त्याग कर दिया था।
श्रीरामकृष्ण – संन्यासी के लिए कामिनी-कांचन, जैसे सुन्दरी स्त्री के लिए उसके देह की एक खास बदबू। वह बदबू रही तो सब सौन्दर्य ही वृथा है।
“मारवाड़ी ने मेरे नाम से रुपये लिख देना चाहा – मथुर ने जमीन लिख देना चाहा, परन्तु मैं यह कुछ न ले सका।
“संन्यासी के लिए बड़े कठिन नियम हैं। जब साधु-संन्यासी का भेष किया, तब उसे ठीक ठीक साधुओं और संन्यासियों का काम करना चाहिए। थिएटर में देखा नहीं? जो राजा बनता है, वह राजा की ही तरह रहता है, जो मन्त्री बनता है, वह ठीक उसी तरह के आचरण करता है।
“किसी बहुरुपिये ने त्यागी साधु का स्वाँग दिखाया, बिलकुल साधु बन गया। दर्शकों ने उसे एक तोड़ा रुपया देना चाहा। वह ‘उँह’ कहकर चला गया। तोड़ा छुआ तक नहीं। परन्तु थोड़ी देर बाद, देह और हाथ-पैर धोकर अपने कपड़े पहनकर वह आया।
२५ मई, १८८४ | परिच्छेद ८१ | ५११
| २५ मई, १८८४ | परिच्छेद ८१ | ५११ |
|---|
कहा, “क्या दे रहे थे अब दीजिये। जब साधु बना था तब रुपये नहीं छू सका, अब चार आने भी मिल जायें तो न छोड़ें।'
“परन्तु मनुष्य परमहंस की अवस्था में बालक हो जाता है। पाँच वर्ष के बालक को स्त्री-पुरुष का ज्ञान नहीं होता। फिर भी लोक-शिक्षण के लिए परमहंस को सावधान रहना पड़ता है।”
श्रीयुत केशव सेन कामिनी-कांचन के भीतर थे, इसीलिए लोक-शिक्षण में बाधा पड़ी थी। श्रीरामकृष्ण यही बात कह रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – ये – (केशव) – समझे?
विजय – जी हाँ।
श्रीरामकृष्ण – इधर-उधर दोनों की रक्षा के लिए बढ़े, इसीलिए विशेष कुछ न कर सके।
विजय – चैतन्यदेव ने नित्यानन्द से कहा, 'नित्यानन्द, अगर मैं संसार का त्याग न करूंगा, तो लोगों का कल्याण न होगा। मुझे देखकर सब लोग संसार में रहना ही पसन्द करेंगे। कामिनी-कांचन का त्याग करके श्रीभगवान के पादपद्मों में सम्पूर्ण मन समर्पित कर देने की चेष्टा फिर कोई न करेगा।'
श्रीरामकृष्ण – चैतन्यदेव ने लोक-शिक्षा के लिए ही संसार का त्याग किया था।
“साधु-संन्यासी को अपने कल्याण के लिए भी कामिनी-कांचन का त्याग करना चाहिए। और निर्लिप्त होने पर भी लोक-शिक्षा के लिए उसे अपने पास कामिनी-कांचन न रखना चाहिए। संन्यासी – जगद्गुरु! उसे देखकर लोगों में चेतना आती है।”
सन्ध्या होने को है। भक्तगण क्रमशः प्रणाम करके बिदा हो रहे हैं। विजय केदार से कह रहे हैं – आज सुबह मैंने आपको देखा था (ध्यान में); देह में हाथ लगाना चाहा, पर फिर कहीं कोई नहीं!
परिच्छेद ८२
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
परिच्छेद ८२
सुरेन्द्र के घर में महोत्सव
(१)
श्रीयुत सुरेन्द्र के बगीचे में
आज श्रीरामकृष्ण सुरेन्द्र के बगीचे में आये हैं। रविवार, ज्येष्ठ कृष्ण ६, १५ जून १८८४। श्रीरामकृष्ण आज सुबह नौ बजे से भक्तों के साथ आनन्द मना रहे हैं।
सुरेन्द्र का बगीचा कलकत्ते के पास काकुड़गाछी गाँव में है। उसके पास ही राम का बगीचा भी है जिसमें करीब छः महीने पहले श्रीरामकृष्ण पधारे थे। आज सुरेन्द्र के बगीचे में महोत्सव है।
सुबह से ही संकीर्तन होने लगा है। कीर्तनिये कृष्ण और गोपियों के सम्बन्ध में कीर्तन गा रहे हैं। गोपियों का प्रेम, कृष्ण के विरह से राधिका की अवस्था – यही सब गाया जा रहा है। श्रीरामकृष्ण को क्षण क्षण में भावावेश हो रहा है। भक्तगण उद्यानगृह के भीतर चारों ओर कतार बाँधे खड़े हैं।
उद्यानगृह में जो कमरा सब से बड़ा है, उसी में कीर्तन हो रहा है। जमीन पर सफेद चद्दर बिछी हुई है। जगह-जगह पर तकिये भी लगे हैं। इस कमरे के पूर्व और पश्चिम ओर एक एक कमरा और उत्तर और दक्षिण ओर बरामदे हैं। उद्यानगृह के सामने अर्थात् दक्षिण की ओर एक तालाब है, पक्का घाट भी बँधा हुआ है। गृह और तालाब के बीच से पूर्व-पश्चिम की ओर रास्ता है। रास्ते के दोनों तरफ फूल और क्रोटन आदि के पेड़ लगे हैं। उद्यानगृह के पूर्व तरफ से उत्तर के फाटक तक एक और रास्ता गया है। उसके भी दोनों ओर अनेक प्रकार की फूल-पत्तियों के पेड़ लगे हैं। फाटक के पास और रास्ते के पूर्व ओर एक और तालाब है – उसमें भी पक्का घाट है। यहाँ गांव के साधारण आदमी नहाया करते हैं और पीने के लिए पानी भी इसीसे ले जाते हैं। उद्यानगृह के पश्चिम की ओर भी रास्ता है, उसके दक्षिण-पश्चिम में रन्धनगार है। आज यहाँ खूब धूम है, यहाँ श्रीरामकृष्ण और भक्तों की सेवा होगी। सुरेश और राम प्रत्येक समय सब तरह की देखभाल कर रहे हैं।
उद्यान-गृह के बरामदे में भी भक्तों का समावेश हुआ है। कोई-कोई अकेले कोई
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
१५ जून, १८८४ | परिच्छेद ८२ | ५१३
| १५ जून, १८८४ | परिच्छेद ८२ | ५१३ |
|---|
मित्रों के साथ, उपर्युक्त तालाब के किनारे टहल रहे हैं। कोई कोई बँधे घाट पर जाकर थोड़ी देर के लिए विश्राम कर रहे हैं।
संकीर्तन हो रहा है। संकीर्तनवाले कमरे में बहुत से भक्त एकत्र हुए हैं। भवनाथ, निरंजन, राखाल, सुरेन्द्र, राम, मास्टर, महिमाचरण और मणि मल्लिक आदि कितने ही भक्त आये हैं। बहुत से ब्राह्मभक्त भी उपस्थित हैं।
कृष्णलीला गायी जा रही है। कीर्तनिया पहले गौर-चन्द्रिका गा रहा है। गौरांग ने संन्यास धारण किया है – वे कृष्ण के प्रेम में पागल हो गये हैं। उन्हें न देखकर नवद्वीप की भक्तमण्डली विलाप कर रही है। यही गीत कीर्तनिया गा रहा है।
श्रीरामकृष्ण को भावावेश है। एकाएक खड़े होकर बड़े ही करुणापूर्ण स्वरों में एक पद गाने लगे – “सखि! तू मेरे प्राणवल्लभ को मेरे पास ले आ या मुझे ही वहीं छोड़ आ।” श्रीरामकृष्ण को राधिका का भाव हो गया है। ये बातें कहते ही उनकी जबान रुक गयी। देह निःस्पन्द हो गयी और आँखें अर्धनिमीलित रह गयीं। उनका बाह्य-ज्ञान बिलकुल जाता रहा। वे समाधिमग्न हो गये।
बड़ी देर बाद श्रीरामकृष्ण अपनी साधारण दशा में आये। फिर वही करुण-स्वर! कहते हैं – “सखि! उसके पास ले जाकर तू मुझे खरीद ले, मैं तेरी दासी हो जाऊँगी। कृष्ण का प्रेम मुझे तू ही ने तो सिखाया था – प्राणवल्लभ!”
कीर्तनियों का गाना होने लगा। श्रीमती कह रही हैं – ‘सखि! मैं यमुना में पानी भरने न जाऊँगी। कदम्ब के नीचे प्रिय सखा को मैंने देखा था। उसे देखते ही मैं विह्वल हो जाती हूँ।’
श्रीरामकृष्ण को फिर आवेश हो रहा है। दीर्घ श्वास छोड़कर कातर भाव से कह रहे हैं – ‘आहा! आहा!’
कीर्तन हो रहा है। श्रीराधा की उक्ति – (कीर्तन का भाव) –
“संग-सुख की लालसा से मैं उनके शीतल अंग का निरीक्षण किया करती हूँ। माना कि वह तुम लोगों का है, परन्तु मुझे उसके दर्शन भी तो एक बार करा दो। वह भूषणों का आभूषण जब चला गया, तब ये भूषण किस काम के रहे? मेरे सुदिन चले गये हैं, ये दुर्दिन आये हैं। दुर्दशा के दिनों के आते कुछ देर भी न लगी।”
“सखि! मैं डूब मरूँगी, भला कह तो सही, कन्हैया जैसे गुणागार को मैं किसे दे जाऊँ? परन्तु देख, राधा की देह को जला न देना, पानी में भी उसे प्रवाहित न करना, वह कृष्ण के विलास की देह है, उसे तमाल की ही डाल पर रखना; क्योंकि कृष्ण भी काले हैं और तमाल की डाल भी काली है!”
| ५१४ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १५ जून, १८८४ |
|---|
श्रीराधा की मूर्छित दशा का वर्णन
“श्रीराधा मूर्छित हो गयीं, ज्ञान जाता रहा, जीवन की संगिनी ने आँखें भी मूँद लीं। कोई सखी उनकी देह में चन्दन लगाती है और कोई दुःख के आँसू बहा रही है। कोई उसके मुँह पर जल-सिंचन भी करती है।
“उन्हें मूर्छित देख सखियाँ कृष्ण का नाम ले रही हैं। कृष्ण का नाम सुन उन्हें चेतना हो आयी! तमाल देखकर वे सोचती हैं कि कहीं कृष्ण तो सामने आकर नहीं खड़े हो गये।
“सखियों ने सलाह करके मथुरा में कृष्ण के पास एक दूती को भेजा। समवयस्क किसी मथुरानिवासिनी से उसका परिचय हो गया। गोपियों की दूती ने कहा, मुझे बुलाना न होगा, वह आप ही आ जायेंगे। जहाँ पर कृष्ण हैं, वहीं मथुरानिवासिनी के साथ वह दूती जा रही है। वह रास्ते में विकल हो, रोकर कृष्ण को पुकार रही है –
'हे गोपियों के जीवनाधार! तुम कहाँ हो? – प्राणवल्लभ! राधावल्लभ! लज्जानिवारण हरि! एक बार तो दर्शन दे दो। मैंने बड़ा गर्व करके इन लोगों से कहा है कि तुम आप ही मिलोगे।'
गाना – “मधुपुर की नागरी हँसकर कहती है, 'ऐ गोकुल की गोपकुमारी, सातवें द्वार के उस पार राजा रहते हैं, क्या तू वहाँ तक जायगी? और तू जायगी भी कैसे? तेरी हिम्मत देखकर तो मुझे लाज आती है।' उसकी ये बातें सुनकर दूती दुःखित हो कृष्ण को पुकारने लगी – 'हे गोपियों के जीवन! हे नागर! हाय, तुम कहाँ हो? दर्शन दे दासी के प्राणों की रक्षा करो।' ”
“हे गोपियों के जीवन! तुम कहाँ हो?” इतना सुनते ही श्रीरामकृष्ण समाधिमग्न हो गये। अन्त में कीर्तनिये ऊँचे स्वर से कीर्तन गाने लगे। श्रीरामकृष्ण फिर खड़े हो गये। समाधिमग्न। कुछ होश आने पर अस्पष्ट स्वरों में कह रहे हैं – 'किट्न्-किट्न्' (कृष्ण-कृष्ण), भाव में भरपूर मग्न हैं। पूरा नाम उच्चारण नहीं कर सकते।
राधा-कृष्ण का मिलनगीत कीर्तनिये गा रहे हैं। श्रीरामकृष्ण भी गाते हैं – “राधा खड़ी है, अंग झुकाये हुए, श्याम के बाईं ओर मानो तमाल को घेरकर।”
अब नामकीर्तन होने लगा। खोल-करताल लेकर अब कीर्तनिये एक साथ गाने लगे। भक्तगण पागलसे हो गये। श्रीरामकृष्ण नृत्य कर रहे हैं। उन्हें घेरकर भक्तगण भी आनन्द से नाच रहे हैं। सब लोग 'जय राधे गोविन्द जय राधे गोविन्द' कह रहे हैं।
कीर्तन हो जाने पर श्रीरामकृष्ण ने जरा देर के लिए आसन ग्रहण किया। इसी समय निरंजन आये और श्रीरामकृष्ण को भूमिष्ठ हो प्रणाम किया। श्रीरामकृष्ण उन्हें देखकर ही खड़े हो गये। आनन्द से श्रीरामकृष्ण की आँखें उज्ज्वल हो गयीं, कहा, “तू आ गया! (मास्टर से) देखो, यह लड़का बड़ा सरल है। सरलता पूर्वजन्मार्जित बहुत बड़ी तपस्या का फल है। कपटाचार, पटवारी बुद्धि, इन सब के रहते ईश्वर-प्राप्ति नहीं होती।
१५ जून, १८८४ | परिच्छेद ८२ | ५१५
१५ जून, १८८४ | परिच्छेद ८२ | ५१५
“देखा नहीं, ईश्वर उसी वंश में अवतार लेते हैं जहाँ सरलता पायी जाती है। दशरथ कितने सरल थे! नन्द – श्रीकृष्ण के पिता – कितने सरल थे! अब भी आदमी कहते हैं, अहा! कैसा सरल है – मानो नन्द घोष हो।
(निरंजन से) “देख, तेरे मुँह पर स्याही आ गयी है, तू आफिस का काम करता है न? इसीलिए आफिस में हिसाबकिताब करना पड़ता होगा, और भी कितने ही तरह के काम होंगे! सब समय सोचना पड़ता होगा।
“संसारी आदमी जिस तरह नौकरी करते हैं, तू भी वैसे ही करता है, परन्तु कुछ भेद है। तूने अपनी माँ के लिए नौकरी की है। माँ गुरु हैं, ब्रह्ममयी की मूर्ति हैं अगर बीबी और बच्चों के लिए तू नौकरी करता तो मैं कहता ‘तुझे धिक्कार है, सौ बार धिक्कार है।’
(मणि मल्लिक से) “देखो, यह लड़का बड़ा सरल है, परन्तु आजकल कुछ झूठ बोलने लगा है। यही इतना दोष है। उस दिन कह गया, आऊँगा, परन्तु फिर नहीं आया। (निरंजन से) इसी पर राखाल कहता था, एँड़ेदाह में आकर तूने क्यों नहीं भेंट की?”
निरंजन – मैं एँड़ेदाह में बस दो दिनों के लिए आया था।
श्रीरामकृष्ण – (निरंजन से) – ये हेडमास्टर हैं। तुझसे मिलने गये थे। मैने भेजा था। (मास्टर से) क्या उस दिन बाबूराम को मेरे पास तुमने भेजा था?
श्रीरामकृष्ण पश्चिमवाले कमरे में दो-चार भक्तों के साथ बातचीत कर रहे हैं। उसी कमरे में कुछ टेबिल और कुर्सियाँ इकट्ठी की हुई रखी थीं। श्रीरामकृष्ण टेबिल के सहारे खड़े हैं।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – अहा! गोपियों का कैसा अनुराग है! तमाल देखकर प्रेम से विह्वल हो गयीं – एकदम प्रेमोन्माद! श्रीराधा की विरहाग्नि इतनी प्रचण्ड थी कि आँख के आँसू भी उसके ताप में सूख जाते थे। पानी बनने से पहले ही वाष्प होकर उड़ जाते थे। कभी कभी दूसरे को उनके भाव का कुछ पता ही नहीं चलता था। बड़े तालाब में हाथी के धँसने पर भी दूसरों को पता नहीं चलता।
मास्टर – जी हाँ। गौरांग का भी यही हाल था। वन देखकर उन्होंने उसे वृन्दावन सोचा था और समुद्र देखकर यमुना।
श्रीरामकृष्ण – अहा! उस प्रेम का एक बूँद भी अगर किसी को हो – कैसा अनुराग! कैसा प्यार! सिर्फ सोलह आने अनुराग नहीं, पाँच चवन्नी और पाँच आने। प्रेमोन्माद इसी का नाम है। बात यह है कि उन्हें प्यार करना चाहिए। तो फिर तुम चाहे जिस मार्ग पर रहो, साकार पर ही विश्वास करो या निराकार पर – ईश्वर मनुष्य के रूप में अवतार लेते हैं इस बात पर चाहे विश्वास करो या न करो – उन पर अनुराग रहने से ही काफी है। तब वे खुद समझा देंगे कि वे कैसे हैं।
“अगर पागल ही होना है, तो संसार की चीज लेकर क्यों पागल होते हो? पागल
५१६ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १५ जून, १८८४
होना है, तो ईश्वर के लिए पागल बनो।”
(४)
भवनाथ, महिमा आदि भक्तों के साथ हरिकथा-प्रसंग
श्रीरामकृष्ण हॉलवाले कमरे में आये। उनके बैठने के आसन के पास एक तकिया लगा दिया गया। श्रीरामकृष्ण ने बैठते समय ‘ॐ तत् सत्’ इस मन्त्र का उच्चारण करके तकिये को स्पर्श किया। विषयी लोग इस बगीचे में आया-जाया करते हैं और ये सब तकिये वे अपने काम में लाते हैं, इसीलिए शायद श्रीरामकृष्ण ने उस मन्त्र का उच्चारण कर तकिये को शुद्ध कर लिया। भवनाथ, मास्टर आदि उनके पास बैठे हैं। समय बहुत हो गया है, परन्तु भोजन आदि का बन्दोबस्त अभी तक नहीं हुआ। श्रीरामकृष्ण बालकस्वभाव हैं। कहा, ‘क्यों जी, अभी तक कुछ देता क्यों नहीं? नरेन्द्र कहाँ हैं?’
एक भक्त – (श्रीरामकृष्ण के प्रति, सहास्य) – महाराज, अध्यक्ष रामबाबू हैं, वे ही सब देखभाल करते हैं। (सब हँसते हैं।)
श्रीरामकृष्ण – (हँसते हुए) – राम अध्यक्ष है, तब तो हो चुका!
एक भक्त – जी रामबाबू जहाँ अध्यक्ष होते हैं, वहाँ प्रायः यही हाल हुआ करता है। (सब हँसते हैं।)
श्रीरामकृष्ण – (भक्तों से) – सुरेन्द्र कहाँ है, अहा, सुरेन्द्र का स्वभाव बहुत ही अच्छा हो गया है। बड़ा स्पष्टवक्ता है, बोलते समय किसी से दबता नहीं। और देखो, मुक्तहस्त भी है। कोई उसके पास सहायता के लिए जाता है, तो उसे खाली हाथ नहीं लौटाता। (मास्टर से) तुम भगवानदास के पास गये थे, उनके बारे में क्या राय है?
मास्टर – जी, मैं कालना गया था। भगवानदास बहुत वृद्ध हो गये हैं, रात में भेंट हुई थी। जाजम पर लेटे हुए थे। एक आदमी प्रसाद ले आया और खिलाने लगा। जोर से बोलने पर सुनते हैं। आपका नाम सुनकर कहने लगे, तुम लोगों को अब क्या चिन्ता है?
“उस घर में नाम-ब्रह्म की पूजा होती है।”
भवनाथ – (मास्टर से) – आप बहुत दिनों से दक्षिणेश्वर नहीं गये। वे दक्षिणेश्वर में मुझसे आपके सम्बन्ध में पूछताछ किया करते थे और कहा था, मास्टर को अरुचि हो गयी क्या?
यह कहकर भवनाथ हँसने लगे। श्रीरामकृष्ण दोनों की बातचीत सुन रहे थे, फिर मास्टर की ओर स्नेहपूर्ण दृष्टि से देखकर बोले, “क्यों जी, बहुत दिन तक तुम वहाँ गये क्यों नहीं?”
मास्टर इसका कुछ जवाब न दे सके। इसी समय महिमाचरण आ पहुँचे।
१५ जून, १८८४ | परिच्छेद ८२ | ५१७
१५ जून, १८८४ | परिच्छेद ८२ | ५१७
महिमाचरण काशीपुर में रहते हैं। श्रीरामकृष्ण पर इनकी बड़ी भक्ति है और सर्वदा ये दक्षिणेश्वर आया-जाया करते हैं। ब्राह्मण के लड़के हैं, कुछ पैतृक सम्पत्ति भी है। स्वाधीन रहते हैं, किसी की नौकरी नहीं करते। सारे समय शास्त्राध्ययन और ईश्वरचिन्तन किया करते हैं। कुछ पाण्डित्य भी है, अंग्रेजी और संस्कृत के बहुत से ग्रन्थों का अध्ययन किया है।
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य, महिमाचरण से) – यह क्या! यहाँ तो जहाज आ गया! (सब हँसते हैं।) इन सब स्थानों में तो डोंगे ही आ सकते हैं, यह तो एकदम जहाज आ गया। (सब हँसे।) परन्तु एक बात है। यह आषाढ़ का महीना है। (सब हँसते हैं।)
महिमाचरण के साथ कितनी ही तरह की बातें हो रही हैं।
श्रीरामकृष्ण – (महिमा के प्रति) – अच्छा, बताओं, लोगों को खिलाना एक तरह से उन्हीं की सेवा नहीं है? – सब जीवों के भीतर वे अग्नि के रूप से विराजमान हैं। खिलाना अर्थात् उनमें आहुति देना।
"परन्तु इसलिए बुरे आदमी को न खिलाना चाहिए – ऐसे आदमी जिन्होंने व्यभिचार आदि महापातक किया हो। घोर विषयासक्त आदमी जहाँ बैठकर भोजन करते हैं, वहाँ सात हाथ तक की मिट्टी अपवित्र हो जाती है।
"हृदय ने सिऊड़ में एक बार कुछ आदमियों को भोजन कराया था। उनमें अधिकांश मनुष्य बुरे थे। मैंने कहा, 'देख हृदय, उन्हें अगर तू खिलायेगा तो मैं तेरे घर एक क्षण भी न ठहरूँगा।' (महिमा से) – अच्छा, मैंने सुना है, पहले लोगों को तुम बहुत खिलाते-पिलाते थे। अब शायद खर्च बढ़ गया है!" (सब हँसते हैं।)
(५)
ब्राह्मभक्तों के संग में। अहंकार। दर्शन का लक्षण
अब पत्तल पड़ रहे हैं – दक्षिणवाले बरामदे में। श्रीरामकृष्ण महिमाचरण से कह रहे हैं, "तुम एक बार जाओ, देखो वे सब क्या कर रहे हैं। और तुमसे मैं कह नहीं सकता, परन्तु जी में आ जाय तो परोस भी देना।" "सामान ले आया जाय, परोसने की बात तो तब है!" – यह कहकर महिमाचरण लम्बे डग से दालान की ओर चले गये, फिर कुछ देर बाद लौटकर आ गये।
श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ आनन्दपूर्वक भोजन कर रहे हैं।
भोजन के पश्चात् घर में आकर विश्राम करने लगे। भक्तगण भी दक्षिणवाले तालाब में हाथ-मुँह धोकर पान खाते हुए फिर श्रीरामकृष्ण के पास आ गये। सब ने आसन ग्रहण किया।
| ५१८ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १५ जून, १८८४ |
|---|
दो बजे के बाद प्रताप आये। ये एक ब्राह्मभक्त हैं। आकर श्रीरामकृष्ण को नमस्कार किया। श्रीरामकृष्ण ने भी सिर झुकाकर नमस्कार किया। प्रताप के साथ बहुतसी बातें हो रही हैं।
प्रताप – मैं दार्जिलिंग गया था।
श्रीरामकृष्ण – परन्तु तुम्हारा शरीर उतना सुधर नहीं पाया। जान पड़ता है, कोई बीमारी हो गयी है।
प्रताप – जी, केशव को जो बीमारी थी, वही मुझे भी है। उन्हें भी यही बीमारी थी।
केशव की दूसरी बातें होने लगीं। प्रताप कहने लगे, केशव का वैराग्य उनके बचपन से ही जाहिर हो रहा था। उन्हें खेलते-कूदते हुए लोगों ने बहुत कम देखा है। हिन्दू कॉलेज में पढ़ते थे। उसी समय सत्येन्द्र के साथ उनकी बड़ी मित्रता हो गयी और उसी कारण श्रीयुत देवेन्द्रनाथ ठाकुर से उनकी मुलाकात हुई। केशव में दोनों बातें थीं, योग भी और भक्ति भी। कभी कभी उनमें भक्ति का इतना उद्रेक होता था कि वे मूर्छित हो जाते थे। गृहस्थों में धर्म लाना उनके जीवन का प्रधान उद्देश्य था।
महाराष्ट्र देश की एक स्त्री के सम्बन्ध में बातचीत होने लगी।
प्रताप – हमारे देश की कुछ महिलाएँ विलायत गयी थीं। महाराष्ट्र देश की एक महिला विलायत गयी थीं। वे खूब पण्डिता हैं; परन्तु ईसाई हो गयी हैं। आपने क्या उनका नाम सुना है?
श्रीरामकृष्ण – नहीं, परन्तु तुम्हारे मुख से जैसा सुन रहा हूँ, इससे जान पड़ता है, उसे प्रसिद्धि तथा सम्मान-प्राप्ति की इच्छा है। इस तरह का अहंकार अच्छा नहीं। 'मैंने किया' यह अज्ञान से होता है। 'हे ईश्वर तुम्हीं ने ऐसा किया', यही ज्ञान है। ईश्वर ही कर्ता हैं, और सब अकर्ता।
“मैं-मैं करने से कितनी दुर्गति होती है, इसका ज्ञान बछड़े की अवस्था सोचने पर हो जाता है। बछड़ा 'हम्मा हम्मा' (मैं, मैं) किया करता है। उसकी दुर्गति देखो। बड़ा होने पर उसे सुबह से शाम तक हल जोतना पड़ता है – चाहे धूप हो, चाहे वृष्टि। कभी कसाई के हाथ गया कि उसने उसकी बिलकुल ही सफाई कर दी। मांस लोगों के पेट में चला गया और चमड़े के जूते बने। आदमी उन पर पैर रखकर चलता है। इतने पर भी दुर्गति की इति नहीं होती। चमड़े से जंगी ढोल मढ़े गये और लकड़ी से लगातार वह पीटा जाने लगा। अन्त में अँतड़ियों को लेकर ताँत बनायी गयी। जब धुनिये के धनुए में वह लगा दी जाती है और वह रूई धुनता है तब वह 'तू-ऊं – तूं-ऊं' कहने लगता है। तब 'हम्मा-हम्मा' नहीं कहता। जब 'तूं-ऊं-तूं-ऊं' कहता है, तब कहीं निस्तार पाता है। तब मुक्ति होती है। कर्म-क्षेत्र में फिर नहीं आना पड़ता।
“जीव भी जब कहता है, 'हे ईश्वर, मैं कर्ता नहीं हूँ, कर्ता तुम हो – मैं यन्त्र मात्र
१५ जून, १८८४ | परिच्छेद ८२ | ५१९
| १५ जून, १८८४ | परिच्छेद ८२ | ५१९ |
|---|
हूँ, यन्त्री तुम हो, तब जीव संसार-यन्त्रणाओं से मुक्ति पाता है। तभी उसकी मुक्ति होती है, फिर इस कर्मक्षेत्र में उसे नहीं आना पड़ता।”
एक भक्त – जीव का अहंकार कैसे दूर हो?
श्रीरामकृष्ण – ईश्वर के दर्शन के बिना अहंकार दूर नहीं होता। यदि किसी का अहंकार मिट गया हो, तो उसे अवश्य ही ईश्वर के दर्शन हुए होंगे।
भक्त – महाराज, किस तरह समझ में आये कि ईश्वर के दर्शन हो चुके हैं?
श्रीरामकृष्ण – ईश्वर-दर्शन के कुछ लक्षण हैं। श्रीमद्भागवत में कहा है, जिस आदमी को ईश्वर के दर्शन हुए हैं उसके चार लक्षण हैं – बालवत्, पिशाचवत्, जड़वत् तथा उन्मत्तवत्।
“जिसे ईश्वर के दर्शन हुए होंगे, उसका स्वभाव बालक की तरह का हो जायेगा। वह त्रिगुणातीत हो जाता है। किसी गुण को गाँठ नहीं बाँधता, शुचि और अशुचि भी उसके पास बराबर हैं। इसीलिए वह पिशाचवत् है, और पागल की तरह कभी हँसता है, कभी रोता है। देखते ही देखते बाबुओं की तरह सजावट कर लेता है और फिर सब कपड़े बगल में दबाकर बिलकुल नंगा होकर घूमता है, इस तरह वह उन्मत्तवत् हो जाता है। और कभी यही है कि जड़ की तरह कहीं चुपचाप बैठा हुआ है, इसलिए जड़वत्।”
भक्त – ईश्वर-दर्शन के बाद क्या अहंकार बिलकुल चला जाता है?
श्रीरामकृष्ण – कभी कभी वे अहंकार बिलकुल पोंछ डालते हैं, जैसे समाधि की अवस्था में। कभी अहंकार कुछ रख भी देते हैं; परन्तु उस अहंकार में दोष नहीं। जैसे बालक का अहंकार। पाँच वर्ष का बच्चा मैं-मैं करता है, परन्तु किसी का अनिष्ट करना वह नहीं जानता।
“पारस पत्थर के छू जाने पर लोहा भी सोना हो जाता है। लोहे की तलवार सोने की तलवार हो जाती है। परन्तु तलवार का आकार मात्र रह जाता है, वह किसी का अनिष्ट नहीं कर सकती।”
(६)
जीवन का उद्देश्य – कर्म अथवा ईश्वरलाभ?
श्रीरामकृष्ण – (प्रताप से) – तुम विलायत गये थे, वहाँ क्या क्या देखा?
प्रताप – आप जिसे कांचन कहते हैं, विलायत के आदमी उसी की पूजा करते हैं; परन्तु कोई कोई अच्छे, अनासक्त मनुष्य भी हैं। यों तो आदि से अन्त तक सब रजोगुण की ही महिमा है। अमेरिका में भी मैंने यही देखा।
श्रीरामकृष्ण – (प्रताप से) – विषयकार्यों में केवल विलायतवालों को ही आसक्ति नहीं है, सभी जगह यही हाल है। परन्तु, बात यह है कि कर्मकाण्ड को आदिकाण्ड कहा
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ५२० श्री रामकृष्णवचनामृत १५ जून, १८८४
है। सतोगुण (भक्ति, विवेक, वैराग्य, दया आदि सब) के बिना ईश्वर नहीं मिल सकते। रजोगुण में कर्म का आडम्बर होता है, इसीलिए रजोगुण से तमोगुण आ जाता है। ज्यादा कर्म में फँसने पर ही ईश्वर को मनुष्य भूल जाता है। तब कामिनी-कांचन में भी आसक्ति बढ़ जाती है।
"परन्तु कर्मों का बिलकुल त्याग कोई नहीं कर सकता। तुम्हारी प्रकृति खुद तुमसे कर्म करा लेगी, तुम अपनी मर्जी से करो या न करो। इसीलिए कहा है, अनासक्त होकर कर्म करो, अर्थात् कर्म-फल की आकांक्षा न करो; जैसे, पूजा, जप, तप, यह सब कर रहे हो, परन्तु सम्मान या पुण्य के लिए नहीं।
"इस तरह अनासक्त होकर कर्म करने का ही नाम कर्मयोग है। यह बड़ा कठिन है। एक तो कलिकाल है, सहज ही आसक्ति आ जाती है। सोच रहा हूँ, अनासक्त होकर काम कर रहा हूँ, परन्तु न जाने किधर से आसक्ति आ जाती है, समझ में नहीं आता। कभी पूजा और महोत्सव किया या बहुत से कंगालों को खिलाया, सोचा, अनासक्त होकर मैं यह सब कर रहा हूँ, परन्तु फिर भी न जाने किधर से लोक-सम्मान की इच्छा आ जाती है, पता नहीं। बिलकुल अनासक्त होना उसके लिए सम्भव है जिसे ईश्वर के दर्शन हो चुके हैं।"
एक भक्त – जिन्होंने ईश्वर को प्राप्त नहीं किया, उनके लिए क्या उपाय है? क्या वे विषय-कर्म छोड़ दें?
श्रीरामकृष्ण – कलिकाल के लिए भक्तियोग है, नारदीय भक्ति। ईश्वर का नाम-गुणगान और व्याकुल होकर प्रार्थना करना – 'हे ईश्वर, मुझे ज्ञान दो, भक्ति दो, मुझे दर्शन दो।' कर्मयोग बड़ा कठिन है। इसीलिए प्रार्थना करनी चाहिए, 'हे ईश्वर, मेरे कर्म घटा दो और जितने कर्म तुमने रखे हैं, उन्हें तुम्हारी कृपा से अनासक्त होकर कर सकूँ और अधिक कर्म लपेटने की मेरी इच्छा न हो!'
"कर्म कोई छोड़ नहीं सकता। 'मैं सोच रहा हूँ', 'मैं ध्यान कर रहा हूँ' – ये भी कर्म हैं। भक्ति पा लेने पर विषयकर्म आप ही आप घट जाते हैं। तब वे अच्छे नहीं लगते। मिश्री का शरबत मिल जाय, तो फिर सीरा कौन पीता है?"
एक भक्त – विलायत के आदमी 'कर्म करो – कर्म करो' कहा करते हैं, तो क्या कर्म जीवन का उद्देश्य नहीं है?
श्रीरामकृष्ण – जीवन का उद्देश्य है ईश्वर-लाभ। कर्म तो आदिकाण्ड है, वह जीवन का उद्देश्य नहीं हो सकता। निष्काम कर्म एक उपाय हो सकता है, परन्तु वह भी उद्देश्य नहीं हैं।
"शम्भू कहता था, अब ऐसा आशीर्वाद दीजिये कि जो रुपये हैं, उनका सद्व्यय कर सकूँ। अस्पताल, दवाखाना, रास्ताघाट, कुआँ इनके तैयार करने में लग जाय। मैंने
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
१५ जून, १८८४ | परिच्छेद ८२ | ५२१
| १५ जून, १८८४ | परिच्छेद ८२ | ५२१ |
|---|
कहा, यह सब काम अनासक्त होकर कर सको तो अच्छा है, परन्तु है यह बड़ा कठिन। और चाहे जो हो, कम से कम इतना याद रहे कि तुम्हारे मनुष्य-जीवन का उद्देश्य है ईश्वर-लाभ – अस्पताल और दवाखाना बनाना नहीं। सोचो कि ईश्वर तुम्हारे सामने आये, आकर तुमसे कहा, कोई वर माँगो। तो क्या तुम उनसे कहोगे, मेरे लिए कुछ अस्पताल और दवाखाने बनवा दो या यह कहोगे, 'हे भगवन्, तुम्हारे पादपद्मों में मेरी शुद्धा भक्ति हो – मैं तुम्हें सब समय देख सकूँ।' अस्पताल, दवाखाना ये सब अनित्य वस्तुएँ हैं। एकमात्र ईश्वर वस्तु है, और सब अवस्तु। उन्हें प्राप्त कर लेने पर जान पड़ता है, कर्ता वे ही हैं, हम लोग अकर्ता हैं। तो फिर क्यों उन्हें छोड़कर इतने काम इकट्ठे कर हम अपनी जान दें? उन्हें पा लेने पर उनकी इच्छा से कितने ही अस्पताल और दवाखाने हो जायेंगे।
“इसीलिए कहता हूँ, कर्म आदिकाण्ड है, कर्म जीवन का उद्देश्य नहीं, साधना करके और भी आगे बढ़ जाओ। साधना करते हुए जब और आगे बढ़ जाओगे, तब अन्त में समझोगे, ईश्वर ही एकमात्र वस्तु है, और सब अवस्तु, ईश्वरलाभ ही जीवन का उद्देश्य है। एक लकड़हारा जंगल में लकड़ी काटने गया था। एकाएक किसी ब्रह्मचारी से उसकी भेंट हो गयी। ब्रह्मचारी ने कहा, 'सुनो जी, बढ़ते जाओ।' लकड़हारा घर लौटकर सोचने लगा, ब्रह्मचारी ने आगे बढ़ने के लिए क्यों कहा।
“इसी तरह कुछ दिन बीत गये। एक दिन वह बैठा हुआ था, एकाएक ब्रह्मचारी की बात याद आ गयी। तब उसने मन ही मन कहा, मैं आज और भी आगे बढ़ जाऊँगा। वन में और भी आगे चलकर उसने देखा, चन्दन के हजारों पेड़ थे। तब मारे आनन्द के लोटपोट हो गया। चन्दन की लकड़ी उस दिन घर ले आया। बाजार में बेचकर खूब धनी हो गया।
“और भी बढ़ने पर ईश्वर की प्राप्ति होगी, उनके दर्शन होंगे। क्रमशः उनके साथ मुलाकात और बातचीत होगी।”
केशव के स्वर्गलाभ के पश्चात् मन्दिर की वेदी को लेकर जो विवाद हुआ था, अब उसकी बात होने लगी।
श्रीरामकृष्ण – (प्रताप से) – सुना है, तुम्हारे साथ वेदी के सम्बन्ध में कोई झगड़ा हुआ है। जिन लोगों ने झगड़ा किया है, वे तो सब ऐसे ही हैं। – मानो कीड़े-मकोड़े। (सब हँसते हैं।)
(भक्तों को) “देखो, प्रताप और अमृत ये सब शंख की तरह बजते हैं। और दूसरे आदमियों को देखो, उनमें कोई आवाज ही नहीं हैं।' (सब हँसते हैं।)
प्रताप – महाराज, बजने की बात अगर आपने चलायी तो आम की गुठली भी तो बजती है!
५२२ श्रीरामकृष्णवचनामृत १५ जून, १८८४
(७)
श्रीरामकृष्ण – (प्रताप से) – देखो, तुम्हारे ब्राह्मसमाज का लेक्चर सुनकर आदमी का भाव आसानी से ताड़ लिया जाता है। मुझे एक हरिसभा में ले गये थे। आचार्य थे एक पण्डित, नाम समाध्यायी था। कहा, ईश्वर नीरस हैं, हमें अपने प्रेम और भक्ति से उन्हें सरस कर लेना चाहिए। यह बात सुनकर मैं तो दंग रह गया। तब एक कहानी याद आ गयी। एक लड़के ने कहा था, मेरे मामा के यहाँ बहुत से घोड़े हैं – गोशाले भर। अब सोचो, अगर गोशाला है, तो वहाँ गौओं का रहना ही सम्भव है, घोड़ों का नहीं। इस तरह की असम्बद्ध बातें सुनकर आदमी क्या सोचता है? यही कि घोड़े-सोड़े कहीं कुछ नहीं हैं! (सब हँसते हैं।)
एक भक्त – घोड़े तो हैं ही नहीं, गौएँ भी नहीं हैं! (सब हँसते हैं।)
श्रीरामकृष्ण – देखो न, जो रस-स्वरूप हैं, उन्हें कहता है 'नीरस'; इससे यही समझ में आता है कि ईश्वर क्या चीज हैं, उसने कभी अनुभव भी नहीं किया।
'मैं कर्ता, मेरा घर' अज्ञान। जीवन का उद्देश्य 'डुबकी लगाना'
श्रीरामकृष्ण – (प्रताप से) – देखो, तुमसे कहता हूँ। तुम पढ़े लिखे बुद्धिमान और गम्भीर हो। केशव और तुम मानो गौरांग और नित्यानन्द; दोनों भाई थे। लेक्चर देना, तर्क झाड़ना, वादविवाद यह सब तो खूब हुआ। क्या तुम्हें ये सब अब भी अच्छे लगते हैं? अब सब मन समेटकर ईश्वर पर लगाओ। अपने को अब ईश्वर में उत्सर्ग कर दो।
प्रताप – जी हाँ, इसमें क्या सन्देह है, यही करना चाहिए; परन्तु यह सब जो मैं कर रहा हूँ, उनके (केशव के) नाम की रक्षा के लिए ही कर रहा हूँ।
श्रीरामकृष्ण – (हँसकर) – तुमने कहा तो है कि उनके नाम की रक्षा के लिए सब कुछ कर रहे हो; परन्तु कुछ दिन बाद यह भाव भी न रह जायगा। एक कहानी सुनो। किसी आदमी का घर पहाड़ पर था, घर क्या, कुटिया थी। बड़ी मेहनत करके उसने बनाया था। कुछ दिन बाद एक बहुत बड़ा तूफान आया। कुटिया हिलने लगी। तब उसे बचाने के लिए उस आदमी को बड़ी चिन्ता हुई। उसने कहा, हे पवन देव, देखो महाराज, घर न तोड़ियेगा। पवन देव क्यों सुनने लगे? कुटिया चरचराने लगी। तब उस आदमी ने एक उपाय सोच निकाला। उसे याद आ गया कि हनुमानजी पवन देव के लड़के हैं। बस, घबराया हुआ वह कहने लगा – दोहाई है, घर न तोड़ियेगा, दोहाई है, हनुमानजी का घर है। कितनी ही बार उसने कहा, 'हनुमानजी का घर है', 'हनुमानजी का घर है,' पर इससे कोई लाभ न हुआ। तब कहने लगा, 'महाराज, लक्ष्मणजी का घर है – लक्ष्मणजी का।' इससे भी कुछ हल न हुआ तब कहा, 'सुनो, यह श्रीरामचन्द्रजी का घर है; देखो महाराज, इसे अब न तोड़िये। दोहाई है, जय रामजी की।' इससे भी कुछ न हुआ। घर चरचराता हुआ