भारतकोश
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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२४ मई, १८८४परिच्छेद ८०५०३

अनुभव कर लेने पर क्या वह फिर रुकता है ?

श्रीरामकृष्ण – (हँसकर) – हा; लकड़ी में एक बार आग लग जाने पर फिर बुझती नहीं। (भक्तों के प्रति) ये विश्वास की अनेक बातें जानते हैं।

बन्धो. – मेरा विश्वास बहुत अधिक है!

श्रीरामकृष्ण – अपने घर की औरतों को बलराम की लड़कियों के साथ लाना।

बन्धो. – बलराम कौन हैं?

श्रीरामकृष्ण – बलराम को नहीं जानते? बोसपाड़ा में घर है।

किसी सरलचित्त व्यक्ति को देखकर श्रीरामकृष्ण आनन्द में विभोर हो जाते हैं। बन्द्योपाध्याय बहुत सरल हैं। निरंजन भी सरल है। इसीलिए उसे भी बहुत चाहते हैं।

श्रीरामकृष्ण – (मास्टर के प्रति) – तुम्हें निरंजन से मिलने के लिए क्यों कह रहा हूँ? यह देखने के लिए कि वह वास्तव में सरल है या नहीं।

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