श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ८१
संसार में किस प्रकार रहना चाहिए
(१)
जन्मोत्सव दिन। भक्तों के संग में
श्रीरामकृष्ण पंचवटी के नीचे पुराने वटवृक्ष के चबूतरे पर विजय, केदार, सुरेन्द्र, भवनाथ, राखाल आदि बहुत से भक्तों के साथ दक्षिण की ओर मुँह किये बैठे हैं। कुछ भक्त चबूतरे पर बैठे हैं। अधिकांश चबूतरे के नीचे, चारों ओर खड़े हुए हैं। दिन के एक बजे का समय होगा। रविवार २५ मई १८८४।
श्रीरामकृष्ण का जन्म-दिन फाल्गुन शुक्ला द्वितीया है। परन्तु उनका हाथ अभी अच्छा नहीं हुआ, इसलिए अब तक जन्मोत्सव नहीं मनाया गया। अब हाथ बहुत कुछ अच्छा है। इसलिए भक्तगण आनन्द मनाना चाहते हैं। सहचरी का गाना होगा। सहचरी की उम्र ज्यादा हो गयी है, परन्तु कीर्तन करने में उसकी प्रसिद्धि है।
मास्टर श्रीरामकृष्ण को कमरे में न देख पंचवटी की ओर चले आये। देखा, सब के मुख पर प्रसन्नता झलक रही है। उन्होंने यह नहीं देखा कि श्रीरामकृष्ण भी पेड़ के नीचे चबूतरे पर बैठे हैं। मास्टर खड़े थे – श्रीरामकृष्ण के बिलकुल सामने। उन्होंने व्यग्रतापूर्वक पूछा, वे कहाँ हैं? उनकी यह बात सुनकर सब के सब बड़े जोर से हँस पड़े। एकाएक सामने श्रीरामकृष्ण को देखकर वे लज्जित हो गये, उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। देखा श्रीरामकृष्ण के बाईं ओर केदार (चटर्जी) और विजय (गोस्वामी) चबूतरे पर बैठे हुए हैं। श्रीरामकृष्ण दक्षिण की ओर मुँह किये बैठे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य, मास्टर से) – देखो, हमने दोनों को – केदार और विजय को कैसा मिला दिया है!
श्रीवृन्दावन से श्रीरामकृष्ण माधवी-लता ले आये थे। उसे पंचवटी में १८६८ ई. में लगाया था। अब वह लता खूब बड़ी हो गयी है। छोटे-छोटे लड़के उस पर बैठकर झूल रहे हैं, नाच रहे हैं, श्रीरामकृष्ण आनन्दपूर्वक देखते हुए कह रहे हैं – 'बन्दर के बच्चों का सा भाव है, गिर जाने पर भी नहीं छोड़ते!'
सुरेन्द्र चबूतरे के नीचे खड़े हैं। श्रीरामकृष्ण स्नेहपूर्वक कह रहे हैं – तुम ऊपर चले