श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१६ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १५ जून, १८८४
होना है, तो ईश्वर के लिए पागल बनो।”
(४)
भवनाथ, महिमा आदि भक्तों के साथ हरिकथा-प्रसंग
श्रीरामकृष्ण हॉलवाले कमरे में आये। उनके बैठने के आसन के पास एक तकिया लगा दिया गया। श्रीरामकृष्ण ने बैठते समय ‘ॐ तत् सत्’ इस मन्त्र का उच्चारण करके तकिये को स्पर्श किया। विषयी लोग इस बगीचे में आया-जाया करते हैं और ये सब तकिये वे अपने काम में लाते हैं, इसीलिए शायद श्रीरामकृष्ण ने उस मन्त्र का उच्चारण कर तकिये को शुद्ध कर लिया। भवनाथ, मास्टर आदि उनके पास बैठे हैं। समय बहुत हो गया है, परन्तु भोजन आदि का बन्दोबस्त अभी तक नहीं हुआ। श्रीरामकृष्ण बालकस्वभाव हैं। कहा, ‘क्यों जी, अभी तक कुछ देता क्यों नहीं? नरेन्द्र कहाँ हैं?’
एक भक्त – (श्रीरामकृष्ण के प्रति, सहास्य) – महाराज, अध्यक्ष रामबाबू हैं, वे ही सब देखभाल करते हैं। (सब हँसते हैं।)
श्रीरामकृष्ण – (हँसते हुए) – राम अध्यक्ष है, तब तो हो चुका!
एक भक्त – जी रामबाबू जहाँ अध्यक्ष होते हैं, वहाँ प्रायः यही हाल हुआ करता है। (सब हँसते हैं।)
श्रीरामकृष्ण – (भक्तों से) – सुरेन्द्र कहाँ है, अहा, सुरेन्द्र का स्वभाव बहुत ही अच्छा हो गया है। बड़ा स्पष्टवक्ता है, बोलते समय किसी से दबता नहीं। और देखो, मुक्तहस्त भी है। कोई उसके पास सहायता के लिए जाता है, तो उसे खाली हाथ नहीं लौटाता। (मास्टर से) तुम भगवानदास के पास गये थे, उनके बारे में क्या राय है?
मास्टर – जी, मैं कालना गया था। भगवानदास बहुत वृद्ध हो गये हैं, रात में भेंट हुई थी। जाजम पर लेटे हुए थे। एक आदमी प्रसाद ले आया और खिलाने लगा। जोर से बोलने पर सुनते हैं। आपका नाम सुनकर कहने लगे, तुम लोगों को अब क्या चिन्ता है?
“उस घर में नाम-ब्रह्म की पूजा होती है।”
भवनाथ – (मास्टर से) – आप बहुत दिनों से दक्षिणेश्वर नहीं गये। वे दक्षिणेश्वर में मुझसे आपके सम्बन्ध में पूछताछ किया करते थे और कहा था, मास्टर को अरुचि हो गयी क्या?
यह कहकर भवनाथ हँसने लगे। श्रीरामकृष्ण दोनों की बातचीत सुन रहे थे, फिर मास्टर की ओर स्नेहपूर्ण दृष्टि से देखकर बोले, “क्यों जी, बहुत दिन तक तुम वहाँ गये क्यों नहीं?”
मास्टर इसका कुछ जवाब न दे सके। इसी समय महिमाचरण आ पहुँचे।