श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
परिच्छेद ५६
परिच्छेद ५६
अधर के मकान पर दुर्गापूजा-महोत्सव में
(१)
जगन्माता के साथ वार्तालाप
श्री अधर के मकान पर नवमी-पूजा के दिन दालान में श्रीरामकृष्ण खड़े हैं। सन्ध्या के बाद श्रीदुर्गामाई की आरती देख रहे हैं। अधर के घर पर दुर्गापूजा का महोत्सव है। इसलिए वे श्रीरामकृष्ण को निमन्त्रित करके लाए हैं।
आज बुधवार है। १० अक्टूबर १८८३ ई.। श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ पधारे हैं। उनमें बलराम के पिता तथा अधर के मित्र स्कूल-इन्स्पेक्टर सारदाबाबू भी आए हैं। अधर ने पूजा के उपलक्ष्य में पड़ोसी तथा आत्मीयजनों को भी निमन्त्रण दिया है। वे भी आए हैं।
श्रीरामकृष्ण संध्या की आरती देखकर भावविभोर होकर पूजा के दालान में खड़े हैं। भावाविष्ट होकर माँ को गाना सुना रहे हैं।
अधर गृही भक्त हैं। और भी अनेक गृही भक्त उपस्थित हैं। वे सब त्रितापों से तापित हैं। सम्भव है इसीलिए श्रीरामकृष्ण सभी के मंगल के लिए जगन्माता की स्तुति कर रहे हैं।
(संगीत का भावार्थ) – “हे तारिणि! मुझे तारो। अब की बार शीघ्र तारो। हे माँ, जीवगण यम से भयभीत हो गए हैं। हे जगज्जननि! संसार को पालनेवाली! लोगों को मोहनेवाली जगज्जननि! तुमने यशोदा की कोख में जन्म लेकर हरि की लीला में सहायता की थी; तुमने वृन्दावन में राधा बन ब्रजवल्लभ के साथ विहार किया। रास रचकर रसमयी तुमने रासलीला का प्रकाश किया। हे माँ, तुम गिरिजा हो, गोपतनया हो, गोविन्द की मनमोहिनी हो, तुम सद्गति देनेवाली गंगा हो। हे गौरि, सारा विश्व तुम्हारा गुणगान गाता है। हे शिवे! हे सनातनि! सदानन्दमयी सर्वस्वरूपिणि! हे निर्गुणे, हे सगुणे! हे सदाशिव की प्रिये! तुम्हारी महिमा को कौन जानता है!”
श्रीरामकृष्ण अधर के मकान के दुमँजले पर बैठकघर में बैठे हैं। कमरे में अनेक आमन्त्रित व्यक्ति आए हैं।
बलराम के पिता और सारदाबाबू आदि पास बैठे हैं।
१० अक्टूबर, १८८३
परिच्छेद ५६
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श्रीरामकृष्ण अभी भी भावविभोर हैं। आमन्त्रित व्यक्तियों को सम्बोधित कर कह रहे हैं, “मैंने भोजन कर लिया है; अब तुम लोग भी भोजन करो।”
अधर की पूजा और नैवेद्य को माँ ने ग्रहण किया है; क्या इसीलिए श्रीरामकृष्ण जगन्माता के आवेश में आकर कह रहे हैं, ‘मैंने खा लिया है; अब तुम लोग भी प्रसाद पाओ’?
श्रीरामकृष्ण भावाविष्ट होकर जगन्माता से कह रहे हैं, “माँ! मैं खाऊँ? या तुम खाओगी? माँ, कारणानन्दरूपिणी।”
क्या श्रीरामकृष्ण जगन्माता को और अपने को एक ही देख रहे हैं! जो माँ हैं, क्या वही स्वयं लोकशिक्षा के लिए पुत्र के रूप में अवतीर्ण हुई हैं? क्या इसीलिए श्रीरामकृष्ण भाव के आवेश में कह रहे हैं, मैंने भोजन कर लिया है?
इसी प्रकार भाव के आवेश में देह के बीच षट्चक्र और उसमें माँ को देख रहे हैं। इसलिए फिर भावविभोर होकर गाना गा रहे हैं -
(भावार्थ) - “हे माँ हरमोहिनी, तूने संसार को भुलावे में डाल रखा है। मूलाधार महाकमल में तू वीणावादन करती हुई चित्तविनोदन करती है। महामन्त्र का अवलम्बन कर तू शरीररूपी यन्त्र के सुषुम्नादि तीन तारों में तीन गुणों के अनुसार तीन ग्रामों में संचरण करती है। मूलाधारचक्र में तू भैरव राग के रूप में अवस्थित है; स्वाधिष्ठानचक्र के षड्दल कमल में तू श्री राग तथा मणिपूरचक्र में मल्हार राग है। तू वसन्त राग के रूप में हृदयस्थ अनाहतचक्र में प्रकाशित होती है। तू विशुद्धचक्र में हिण्डोल तथा आज्ञाचक्र में कर्णाटक राग है। तान-मान-लय-सुर के सहित तू मन्द्र-मध्य-तार इन तीन सप्तकों का भेदन करती है। हे महामाया, तूने मोहपाश के द्वारा सब को अनायास बाँध लिया है। तत्त्वाकाश में तू मानो स्थिर सौदामिनी की तरह विराजमान है। 'नन्दकुमार' कहता है कि तेरे तत्त्व का निश्चय नहीं किया जा सकता। तीन गुणों के द्वारा तूने जीव की दृष्टि को आच्छादित कर रखा है।”
(भावार्थ) - “माँ के गूढ़ तत्त्वों को सोचते सोचते प्राणों पर आ बीती। जिसके नाम से कालभय नष्ट होता है, जिसके चरणों के नीचे महाकाल है, उसका काला रूप क्यों हुआ? काले रूप अनेक हैं, पर यह बड़ा आश्चर्यजनक काला रूप है, जिसे हृदय के बीच में रखने पर हृदयरूपी पद्म आलोकित हो जाता है। रूप में काली है, नाम में काली है, काले से भी अधिक काली है। जिसने इस रूप को देखा है, वह मोहित हो गया है, उसे दूसरा रूप अच्छा नहीं लगता। 'प्रसाद' आश्चर्य के साथ कहता है कि ऐसी लड़की कहाँ थी, जिसे बिना देखे, केवल कान से जिसका नाम सुनकर ही मन जाकर उससे लिप्त हो गया!”
अभया की शरण में जाने से सभी भय दूर हो जाते हैं, सम्भव है इसीलिए वे भक्तों को अभयदान दे रहे हैं और गाना गा रहे हैं -
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(भावार्थ) - “मैंने अभय पद में प्राणों को सौंप दिया है” इत्यादि।
श्री सारदाबाबू पुत्रशोक से अत्यन्त व्यथित हैं। इसलिए उनके मित्र अधर उन्हें श्रीरामकृष्ण के पास लाये हैं। वे गौरांग के भक्त हैं। उन्हें देखकर श्रीरामकृष्ण में श्रीगौरांग का उद्दीपन हुआ है। श्रीरामकृष्ण गा रहे हैं -
(भावार्थ) - “मेरा अंग क्यों गौर हुआ?” इत्यादि।
अब श्रीगौरांग के भाव में आविष्ट हो गाना गा रहे हैं। कह रहे हैं, सारदाबाबू यह गाना बहुत चाहते हैं।
(भावार्थ) - “भावनिधि गौरांग का भाव होगा नहीं तो क्या? भाव में हँसते हैं, रोते हैं, नाचते हैं, गाते हैं। वन देखकर वृन्दावन समझते हैं। गंगा देख उसे यमुना मान लेते हैं। गौरांग सिसक-सिसककर रो रहे हैं। यद्यपि वे बाहर ‘गोर’ हैं तथापि भीतर वे ‘कृष्ण’ हैं।
(भावार्थ) - “माँ! पड़ोसी लोग हल्ला मचाते हैं। मुझे गौरकलंकिनी कहते हैं? क्या यह कहने की बात है? कहाँ कहूँगी? ओ प्यारी सखि, लज्जा से मरी जाती हूँ। एक दिन श्रीवास के मकान में कीर्तन की धूम मची हुई थी; गौररूपी चन्द्रमा श्रीवास के आँगन पर लोटपोट हो रहा था। मैं एक कोने में खड़ी थी। एक ओर छिपी हुई थी। मैं बेहोश हो गयी। श्रीवास की धर्मपत्नी मुझे होश में लायी। एक दिन गौर नगरकीर्तन कर रहे थे; चाण्डाल, यवन आदि भी गौर के साथ थे। वे ‘हरि बोल’ ‘हरि बोल’ कहते हुए नदिया के बाजारों में से चले जा रहे थे। मैंने उनके साथ जाकर दो रक्तिम चरणों के दर्शन किए थे। एक दिन गंगातट पर घाट पर गौरांग प्रभु खड़े थे। मानो चन्द्र और सूर्य दोनों ही गौर के अंग में प्रकट हुए थे। गौर के रूप को देखकर शाक्त और शैव भूल गए। एकाएक मेरा घड़ा गिर पड़ा! दुष्ट ननदिया ने देख लिया था।”
बलराम के पिता वैष्णव हैं; सम्भव है इसीलिए अब श्रीरामकृष्ण गोपियों के दिव्य प्रेम का गाना गा रहे हैं।
(भावार्थ) - “सखि! श्याम को पा न सकी, तो फिर किस सुख से घर पर रहूँ? यदि श्याम मेरे सिर के केश होते तो हे सखि, मैं उसमें बकुल फूल पिरोकर यत्न के साथ वेणी बाँध लेती। श्याम यदि मेरे हाथ के कंगन होते, तो सदा बाँहों में लगे रहते। सखि, मैं कंगन हिलाकर, बाँह हिलाकर चली जाती। हे सखि! मैं श्यामरूपी कंगन को हाथ में पहनकर सड़कों पर से चली जाती। जिस समय श्याम अपनी बाँसुरी बजाता है, तो मैं यमुना में जल लेने आती हूँ। मैं भटकी हुई हरिणी की तरह इधर-उधर ताकती रहती हूँ।”
(२)
सर्वधर्म-समन्वय और श्रीरामकृष्ण
बलराम के पिता की उड़ीसा प्रान्त में भद्रक आदि कई स्थानों में जमींदारी है और
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वृन्दावन, पुरी, भद्रक आदि अनेक स्थानों में उनकी देवसेवा और अतिथिशालाएँ भी हैं। वे वृद्धावस्था में श्रीवृन्दावन में भगवान् श्यामसुन्दर के कुंज में उनकी सेवा में लगे रहते थे।
बलराम के पिताजी पुराने मत के वैष्णव हैं। अनेक वैष्णव भक्त, शाक्त, शैव और वेदान्तवादियों के साथ सहानुभूति नहीं रखते हैं; कोई कोई उनसे द्वेष भी करते हैं। परन्तु श्रीरामकृष्ण इस प्रकार की संकीर्णता पसन्द नहीं करते। उनका कहना है कि व्याकुलता रहने पर सभी पथों तथा सभी मतों से ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है। अनेक वैष्णव भक्त बाहर से तो जप-जाप, पूजा-पाठ आदि करते हैं, परन्तु भगवान् को प्राप्त करने के लिए उनमें व्याकुलता नही है। सम्भव है इसीलिए श्रीरामकृष्ण बलराम के पिताजी को उपदेश दे रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण (मास्टर के प्रति) – सोचा, क्यों एकांगी बनूँ? मैंने भी वृन्दावन में वैष्णव वैरागी का भेष ग्रहण किया था। उस भाव में तीन दिन रहा। फिर दक्षिणेश्वर में राम-मन्त्र लिया था। लम्बा तिलक, गले में कण्ठी; फिर थोड़े दिनों के बाद सब कुछ हटा दिया।
"एक आदमी के पास एक बर्तन था। लोग उसके पास कपड़ा रँगवाने के लिए जाते थे। बर्तन में एक रंग तैयार रहता। परन्तु जिसे जिस रंग की आवश्यकता होती, उस बर्तन में कपड़ा डुबाने से वह उसी रंग का हो जाता। यह देखकर एक व्यक्ति विस्मित होकर रंगवाले से कहता है कि तुम स्वयं जिस रंग से रंगे हो वही रंग मुझे दो!”
क्या इस उदाहरण द्वारा श्रीरामकृष्ण यही कह रहे हैं कि सभी धर्मों के लोग उनके पास आएँगे और आत्मज्ञान प्राप्त करेंगे?
श्रीरामकृष्ण फिर कह रहे हैं, "एक वृक्ष पर एक गिरगिट था! एक व्यक्ति ने देखा हरा, दूसरे ने देखा काला और तीसरे ने पीला, इस प्रकार अलग अलग व्यक्ति अलग अलग रंग देख गए। बाद में वे आपस में विवाद कर रहे हैं। एक कहता है, वह जन्तु हरे रंग का है। दूसरा कहता है, नहीं लाल रंग का, कोई कहता है पीला, और इस प्रकार आपस में सब झगड़ रहे हैं। उस समय वृक्ष के नीचे एक व्यक्ति बैठा था, सब मिलकर उसके पास गए। उसने कहा, 'मैं इस वृक्ष के नीचे रातदिन रहता हूँ, मैं जानता हूँ, यह बहुरुपिया है। क्षण क्षण में रंग बदलता है, और फिर कभी कभी इसके कोई रंग नहीं रहता।' "
क्या श्रीरामकृष्ण यही कह रहे हैं कि ईश्वर सगुण है, भिन्न भिन्न रूप धारण करता है और फिर निर्गुण है, कोई रूप नहीं, वाक्य मन से परे है? और वे स्वयं भक्तियोग, ज्ञानयोग आदि सभी पथों से ईश्वर के माधुर्य का रस पीते हैं?
श्रीरामकृष्ण (बलराम के पिता के प्रति) – और अधिक पुस्तकें न पढ़ो, परन्तु भक्तिशास्त्र का अध्ययन करो, जैसे श्रीचैतन्यचरितामृत।
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राधाकृष्णलीला का अर्थ। रस और रसिक
“असल बात यह है कि उनसे प्रेम करना चाहिए, उनके माधुर्य का आस्वादन करना चाहिए। वे रस हैं और भक्त रसिक; भक्त उस रस का पान करते हैं। वे पद्म हैं और भक्त भौंरा, भक्त पद्म का मधु पीता है।
“भक्त जिस प्रकार भगवान् के बिना नहीं रह सकता, भगवान् भी भक्त के बिना नहीं रह सकते! उस समय भक्त रस बन जाता है और भगवान् बनते हैं रसिक; भक्त बनता है पद्म और भगवान् बनते हैं भौंरा! वे अपने माधुर्य का आस्वादन करने के लिए दो बने हैं, इसीलिए राधाकृष्ण-लीला हुई।
“तीर्थ, गले में माला, नियम, ये सब पहले-पहल करने पड़ते हैं। वस्तु की प्राप्ति हो जाने पर, भगवान् का दर्शन हो जाने पर बाहर का आडम्बर धीरे धीरे कम होता जाता है। उस समय उनका नाम लेकर रहना और स्मरण-मनन करना।
“सोलह रुपयों के पैसे अनेक होते हैं, परन्तु जब सोलह रुपये इकट्ठे किए जाते हैं, तो उतने अधिक नहीं दीखते। फिर उनके बदले में जब गिन्नी * बनायी तो कितना कम हो गया! फिर उसे बदलकर यदि छोटासा हीरा लाओ तो लोगों को पता तक नहीं लगता।
गले में माला, नियम आदि न रहने से वैष्णवगण आक्षेप करते हैं, क्या इसीलिए श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं कि ईश्वरदर्शन के बाद माला, दीक्षा आदि का बन्धन उतना नहीं रह जाता? वस्तु प्राप्त होने पर बाहर का काम कम हो जाता है।
श्रीरामकृष्ण (बलराम के पिता के प्रति) – “कर्तभजा सम्प्रदायवाले कहते हैं कि भक्त चार प्रकार के होते हैं। प्रवर्तक, साधक, सिद्ध और सिद्ध का सिद्ध। प्रवर्तक तिलक लगाते हैं, गले में माला धारण करते हैं और नियम पालन करते हैं। साधक – इनका उतना बाहरका आडम्बर नहीं रहता; उदाहरणार्थ, बाउल। सिद्ध – जिसका स्थिर विश्वास है कि ईश्वर हैं। सिद्ध के सिद्ध जैसे चैतन्यदेव, उन्होने ईश्वर का दर्शन किया है और सदा उनसे वार्तालाप करते हैं। सिद्ध के सिद्ध को ही वे लोग साईं कहते हैं। साईं के बाद और कुछ नहीं रह जाता।
“साधक भिन्न भिन्न प्रकार के होते हैं। सात्त्विक साधना गुप्त रूप से होती है। इस प्रकार का साधक साधन-भजन को छिपाता है। देखने से वह साधारण लोगों की तरह जान पड़ता है। मच्छरदानी के भीतर बैठा ध्यान करता है।
“राजसिक साधक बाहर का आडम्बर रखता है, गले में जपमाला, भेष, गेरुआ वस्त्र, रेशमी वस्त्र, सोने के दानेवाली जपमाला, मानो साइनबोर्ड लगाकर बैठना!”
वैष्णव भक्तों की वेदान्तमत पर अथवा शाक्तमत पर उतनी श्रद्धा नहीं है।
* उस समय एक गिन्नी का मूल्य सोलह रुपये था।
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श्रीरामकृष्ण बलराम के पिता को उस प्रकार के संकीर्ण भाव को त्यागने का उपदेश कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण (बलराम के पिता आदि के प्रति) – जो भी धर्म हों, जो भी मत हो, सभी उसी एक ईश्वर को पुकार रहे हैं। इसलिए किसी धर्म अथवा मत के प्रति अश्रद्धा या घृणा नहीं करनी चाहिए। वेद उन्हें ही कह रहे हैं, सच्चिदानन्द ब्रह्म, भागवत आदि पुराण उन्हें ही कह रहे हैं, सच्चिदानन्द कृष्ण, और तन्त्र कह रहे हैं, सच्चिदानन्द शिव। वही एक सच्चिदानन्द हैं।
“वैष्णवों के अनेक सम्प्रदाय हैं। वेद जिन्हें ब्रह्म कहते हैं, वैष्णवों का एक दल उन्हें अलख-निरंजन कहता है। अलख अर्थात् जिन्हें लक्ष्य नहीं किया जा सकता, इन्द्रियों द्वारा देखा नहीं जा सकता। वे कहते हैं, राधा व कृष्ण अलख के दो बुलबुले हैं।
“वेदान्तमत में अवतार नहीं है। वेदान्तवादी कहते हैं, राम, कृष्ण – ये सच्चिदानन्दरूपी समुद्र की दो लहरें हैं।
“एक के अतिरिक्त दो तो नहीं हैं, चाहे जिस नाम से कोई ईश्वर को पुकारे, यदि वह पुकार हार्दिक हो तो वह उसके पास अवश्य ही पहुँचेगी। व्याकुलता रहनी चाहिए।”
श्रीरामकृष्ण भाव में विभोर होकर भक्तों से ये सब बातें कह रहे हैं। अब प्रकृतिस्थ हुए हैं और कह रहे हैं, “तुम बलराम के पिता हो?”
सभी थोड़ी देर चुपचाप बैठे हैं, बलराम के वृद्ध पिता चुपचाप हरिनाम की माला जप रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण (मास्टर आदि के प्रति) – अच्छा, ये लोग इतना जप करते हैं, इतना तीर्थ करते हैं, फिर भी इनकी प्रगति क्यों नहीं होती? मानो अठारह मास का इनका एक वर्ष होता है।
“हरीश से कहा, ‘यदि व्याकुलता न रहे, तो फिर वाराणसी जाने की क्या आवश्यकता? व्याकुलता रहने पर यहीं पर वाराणसी है।’”
“इतना तीर्थ, इतना जप करते हैं, फिर भी कुछ क्यों नहीं होता? व्याकुलता नहीं है। व्याकुल होकर उन्हें पुकारने पर वे दर्शन देते हैं।”
“नाटक के प्रारम्भ में रंगभूमि पर बड़ी गड़बड़ी मची रहती है। उस समय श्रीकृष्ण का दर्शन नहीं होता। उसके बाद नारद ऋषि जिस समय व्याकुल होकर वृन्दावन में आकर वीणा बजाते हुए पुकारते हैं और कहते हैं, ‘प्राण हे, गोविन्द मम जीवन’ – उस समय कृष्ण और ठहर नहीं सकते, गोपालों के साथ सामने आ जाते हैं।”
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परिच्छेद ५७
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परिच्छेद ५७
दक्षिणेश्वर में कार्तिकी पूर्णिमा
(१)
श्रीरामकृष्ण की अद्भुत स्थिति - नित्य-लीलायोग
आज मंगलवार, १६ अक्टूबर १८८३ ई.। बलराम के पिता दूसरे भक्तों के साथ उपस्थित हैं। बलराम के पिता परम वैष्णव हैं। हाथ में हरिनाम की माला रहती है, सदा जप करते रहते हैं।
कट्टर वैष्णवगण अन्य सम्प्रदाय के लोगों को उतना पसन्द नहीं करते। बलराम के पिता बीच बीच में श्रीरामकृष्ण का दर्शन करते हैं, उनका उन वैष्णवों का-सा भाव नहीं है।
श्रीरामकृष्ण – जिनका उदार भाव है वे सभी देवताओं को मानते हैं, – कृष्ण, काली, शिव, राम आदि।
बलराम के पिता – हाँ, जिस प्रकार एक पति, अलग अलग पोशाक में।
श्रीरामकृष्ण – परन्तु निष्ठाभक्ति एक चीज है। गोपियाँ जब मथुरा में गयीं तो पगड़ी पहने हुए कृष्ण को देखकर उन्होंने घूँघट काढ़ लिया और कहा, 'यह कौन है! हमारे पीतवस्त्रधारी, मोहनचूड़ावाले श्रीकृष्ण कहाँ हैं?'
"हनुमान की भी निष्ठाभक्ति है। द्वापर युग में द्वारका में जब आए तो कृष्ण ने रुक्मिणी से कहा, 'हनुमान रामरूप न देखने से सन्तुष्ट न होगा।' इसलिए रामरूप में उन्हें दर्शन दिया!
"कौन जाने भाई, मेरी यही एक स्थिति है। मैं केवल नित्य से लीला में उतर आता हूँ और फिर लीला से नित्य में चला जाता हूँ।
"नित्य में पहुँचने का नाम है ब्रह्मज्ञान। बड़ा कठिन है। विषयबुद्धि एकदम नष्ट हुए बिना कुछ नहीं होता। हिमालय के घर जब भगवती ने जन्म लिया तो पिता को अनेक रूपों में दर्शन दिया। हिमालय ने उनसे कहा, 'मैं ब्रह्मदर्शन की इच्छा करता हूँ।' तब भगवती ने कहा, 'पिताजी, यदि वैसी इच्छा हो तो सत्संग करना पड़ेगा। संसार से अलग होकर बीच बीच में निर्जन में साधुसंग कीजिए।'
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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“उस एक से ही अनेक हुए हैं – नित्य से ही लीला है। एक ऐसी अवस्था है जिसमें 'अनेक' का बोध नहीं रहता और न 'एक' का ही; क्योंकि 'एक' के रहते ही 'अनेक' आ जाता है। वे तो उपमाओं से रहित हैं – उन्हें उपमा देकर समझाने का उपाय नहीं है! अन्धकार और प्रकाश के मध्य में हैं। हम जिस प्रकाश को देखते हैं, ब्रह्म वह प्रकाश नहीं है – ब्रह्म यह जड़ आलोक नहीं है।*
“फिर जब वे मेरे मन की अवस्था को बदल देते हैं – जिस समय लीला में मन को उतार लाते हैं – तब देखता हूँ ईश्वर, माया, जीव, जगत् – वे सब कुछ बने हुए हैं।
ईश्वर ही कर्ता
“फिर कभी वे दिखाते हैं कि उन्होंने इस सब जीव-जगत् को बनाया है – जैसे मालिक और उसका बगीचा।
“वे कर्ता हैं और उन्हीं का यह सब जीव-जगत् है, इसी का नाम है ज्ञान। और 'मैं करनेवाला हूँ', 'मैं गुरु हूँ', 'मैं पिता हूँ', इसी का नाम है अज्ञान। फिर मेरे हैं ये सब घर-द्वार, परिवार, धन, जन आदि – इसी का नाम है अज्ञान।”
बलराम के पिता – जी हाँ।
श्रीरामकृष्ण – जब तक यह बुद्धि नहीं होती कि 'ईश्वर, तुम्हीं कर्ता हो' तब तक बारम्बार लौटकर आना ही होगा, बारम्बार जन्म लेना पड़ेगा। फिर जब यह ज्ञान हो जाएगा कि तुम्हीं कर्ता हो, तब जन्म नहीं होगा।
“जब तक 'तू ही, तू ही' न करोगे तब तक छुटकारा नहीं। आना-जाना, पुनर्जन्म होगा ही – मुक्ति न होगी। और 'मेरा मेरा' कहने से भी क्या होगा? बाबू का मुनीम कहता है, 'यह हमारा बगीचा है, हमारी खाट, हमारी कुर्सी है।' परन्तु बाबू जब उसे नौकरी से निकाल देते हैं तो अपनी आम की लकड़ी की छोटीसी सन्दूकची तक ले जाने का उसे अधिकार नहीं रहता।
“'मैं और मेरा' ने सत्य को छिपा रखा है – जानने नहीं देता!
अद्वैतज्ञान तथा चैतन्यदर्शन
“अद्वैत का ज्ञान हुए बिना चैतन्य का दर्शन नहीं होता। चैतन्य का दर्शन होने पर तब नित्यानन्द होता है। परमहंसस्थिति में यही नित्यानन्द है।
“वेदान्तमत में अवतार नहीं है। इस मत में चैतन्यदेव अद्वैत के एक बुलबुला हैं।
“चैतन्य का दर्शन कैसा? दियासलाई जलाने से अँधेरे कमरे में जिस प्रकार एकाएक रोशनी हो जाती है।
* ब्रह्म यह जड़ आलोक नहीं है – “तत् ज्योतिषां ज्योतिः।” “तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यत् आत्मविदो विदुः।” – मुण्डक उपनिषद्, २।२।९
| ३३० | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १६ अक्तूबर, १८८३ |
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भक्तिमत में अवतार मानते हैं। कर्ताभजा सम्प्रदाय की एक स्त्री मेरी स्थिति को देखकर कह गयी, 'बाबा, भीतर वस्तुप्राप्ति हुई है उतना नाचना-कूदना नहीं, अंगूर के फल को रूई पर यत्न से रखना होता है। पेट में बच्चा होने पर सास अपनी बहु का धीरे धीरे काम बन्द करा देती है। भगवान् के दर्शन का लक्षण है, धीरे धीरे कर्मत्याग होना। यह मनुष्य (श्रीरामकृष्ण) 'नर रत्न' है।'
“मेरे खाते समय वह कहती थी, 'बाबा, तुम खा रहे हो या किसी को खिला रहे हो?'
“इस 'अहं' ज्ञान ने ही आवरण बनाकर रखा है। नरेन्द्र ने कहा था, यह 'मैं' जितना जाएगा, 'उनका मैं' उतना ही आएगा। केदार कहता है, घड़े के भीतर जितनी ही अधिक मिट्टी रहेगी” अन्दर उतना ही जल कम रहेगा।
“कृष्ण ने अर्जुन से कहा था, 'भाई, अष्टसिद्धियों में से एक भी सिद्धि के रहते तक मुझे न पाओगे। उससे थोड़ीसी शक्ति अवश्य मिल जाती है, पर बस केवल इतना ही। गुटिकासिद्धि, झाड़-फूक, दवा देना इत्यादी से लोंगों का कुछ थोड़ा-बहुत उपकार भर हो जाता है, क्यों है न यही?
“इसीलिए माँ से मैंने केवल शुद्धा भक्ति माँगी थी! सिद्धि नहीं माँगी।”
बलराम के पिता, वेणी पाल, मास्टर, मणि मल्लिक आदि से यह बात कहते कहते श्रीरामकृष्ण समाधिमग्न हो गए। बाह्यज्ञानशून्य होकर चित्र की तरह बैठे हैं।
समाधि भंग हो जाने के बाद श्रीरामकृष्ण गाना गा रहे हैं –
(भावार्थ) – “सखि! जिसके लिए पागल बनी उसे कहाँ पा सकी?”
अब आपने रामलाल से गाना गाने के लिए कहा। वे गा रहे हैं। पहले ही गौरांग का संन्यास –
(भावार्थ) – “केशवभारती की कुटिया में मैंने क्या देखा – असाधारण ज्योतिवाली श्रीगौरांग की मूर्ति, जिसकी दोनों आँखों से शत धाराओं से प्रेमवारि बह रहा है। गौर पागल हाथी की तरह प्रेम के आवेश में आकर नाचते हैं, गाते हैं; कभी भूमि पर लोटते हैं। आँसू बह रहे हैं। वे रोते हैं और हरिनाम उच्चारण करते हैं, उनका सिंह जैसा उच्च स्वर आकाश को भी भेद रहा है। फिर वे दाँतों में तिनका लेकर हाथ जोड़कर द्वार द्वार पर दास्यभाव द्वारा मुक्ति की प्रार्थना कर रहे हैं।”
चैतन्यदेव के इस 'पागल' प्रेमोन्माद-स्थिति के वर्णन के बाद श्रीरामकृष्ण के कहने पर रामलाल फिर गोपियों की उन्माद स्थिति का गाना गा रहे हैं –
(भावार्थ) – “रथचक्र को न पकड़ो, न पकड़ो, क्या रथ चक्र से चलता है? उस चक्र के चक्री हरि हैं, जिनके चक्र से जगत् चलता है।”
(भावार्थ) – “श्यामरूपी चन्द्र का दर्शन कर नवीन बादल की कहाँ गिनती है? हाथ में बंसरी और ओठों पर मुसकान लिये वह अपने रूप से जगत् को आलोकित कर रहा है।”
१६ अक्टूबर, १८८३ | परिच्छेद ५७ | ३३१
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| १६ अक्टूबर, १८८३ | परिच्छेद ५७ | ३३१ |
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(२)
अछूतों की समस्या – अस्पृश्य जाति की हरिनाम से शुद्धि
हरिभक्ति होने पर फिर जाति का विचार नहीं रहता। श्रीरामकृष्ण मणि मल्लिक से कह रहे हैं, “तुम तुलसीदास की वह बात कहो तो।”
मणि मल्लिक – चातक की प्यास से छाती फटी जाती है – गंगा, यमुना, सरयू आदि कितनी नदियाँ और तालाब हैं, परन्तु वह कोई भी जल नहीं पीता, केवल स्वाति नक्षत्र की वर्षा के जल के लिए ही मुँह खोले रहता है!
श्रीरामकृष्ण – अर्थात् उनके चरणकमलों में भक्ति ही सार है शेष सब मिथ्या।
मणि मल्लिक – तुलसीदास की एक और बात – स्पर्शमणि से लगते ही, अष्टधातु सोना बन जाती है। उसी प्रकार सभी जातियाँ – चमार, चाण्डाल तक हरिनाम लेने पर शुद्ध हो जाती हैं। और वैसे तो ‘बिना हरिनाम चार जात चमार!’
श्रीरामकृष्ण – जिस चमड़े की खाल छूनी भी नहीं चाहिए, उसी को पका लेने के बाद फिर देवमन्दिर में भी ले जाते हैं!
“ईश्वर के नाम से मनुष्य पवित्र होता है। इसीलिए नामसंकीर्तन का अभ्यास करना चाहिए। मैंने यदु मल्लिक की माँ से कहा था, ‘जब मृत्यु आएगी, तब यही संसार की चिन्ता होगी। परिवार, लड़के-लड़कियों की चिन्ता, मृत्युपत्र की चिन्ता – यही सब चिन्ताएँ आएँगी; भगवान् की चिन्ता न आयगी। उपाय है उनके नाम का जप करना, नाम-कीर्तन का अभ्यास करना। यदि अभ्यास रहा, तो मृत्यु के समय में उन्हीं का नाम मुँह में आयगा। बिल्ली के पकड़ने पर चिड़िया की ‘च्याँ, च्याँ’ बोली ही निकलेगी। उस समय वह ‘राम राम’ ‘हरे कृष्ण’ न बोलेगी।’
“मृत्युसमय के लिए तैयार होना अच्छा है। अन्तिम दिनों में निर्जन में जाकर केवल ईश्वर का चिन्तन तथा उनका नाम जपना। हाथी को नहलाकर यदि हाथीखाने में ले जाया जाए तो फिर वह अपनी देह में मिट्टी–कीचड़ नहीं लगा सकता।”
बलराम के पिता, मणि मल्लिक, वेणी पाल ये अब वृद्ध हो गए हैं; क्या इसीलिए श्रीरामकृष्ण उनके कल्याण के लिए ये सब उपदेश दे रहे हैं?
श्रीरामकृष्ण फिर भक्तों को सम्बोधित करके बातचीत कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – एकान्त में उनका चिन्तन और नामस्मरण करने के लिए क्यों कहता हूँ? संसार में रातदिन रहने पर अशान्ति होती है। देखो न, एक गज जमीन के लिए भाई
३३२ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १६ अक्टूबर, १८८३
भाई में मारकाट होती है।
“सिक्खों का कहना है कि जमीन, स्त्री और धन – इन्ही तीनों के लिए इतनी गड़बड़ तथा अशान्ति होती है।
“तुम लोग संसार में हो तो इसमें भय क्या है? राम ने जब संसार छोड़ने की बात कही, तो दशरथ चिन्तित होकर वशिष्ठ की शरण में गए। वशिष्ठ ने राम से कहा, 'राम, तुम क्यों संसार को छोड़ोगे? मेरे साथ विचार करो, क्या संसार ईश्वर से अलग है? क्या छोड़ोगे और क्या ग्रहण करोगे? उनके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। वे ईश्वर, माया, जीव, जगत् सभी रूप में प्रकट हो रहे हैं।' ”
बलराम के पिता – बड़ा कठिन है।
श्रीरामकृष्ण – साधना के समय यह संसार धोखे की टट्टी है, फिर ज्ञान प्राप्त करने के बाद, उनके दर्शन के बाद, वही संसार – ‘आनन्द की कुटिया’ है।
अवतार-पुरुष में ईश्वर का दर्शन। अवतार चैतन्यदेव
“वैष्णव-ग्रन्थ में कहा है, 'विश्वास से कृष्ण मिलते हैं, वे तर्क से बहुत दूर हैं।' केवल विश्वास!
“कृष्णकिशोर का क्या ही विश्वास है! वृन्दावन में कुएँ से एक नीच जाति के पुरुष ने जल निकाला; कृष्णकिशोर ने उससे कहा, 'तू बोल शिव;' उसके शिवनाम लेते ही उसने जल पी लिया। वह कहता था, 'ईश्वर का नाम लिया है, फिर भी धन आदि खर्च करके प्रायश्चित्त करना होगा? कैसी विडम्बना है!'
“कृष्णकिशोर यह देखकर आश्चर्यचकित हो गया कि लोग अपने शारीरिक रोगों से छुटकारा पाने के लिए भगवान् को तुलसीदल चढ़ा रहे हैं।
“साधुदर्शन की बात पर हलधारी ने कहा था, 'और क्या देखने जाऊँ – पंचभूतों का पिंजरा!' कृष्णकिशोर ने क्रुद्ध होकर कहा, 'ऐसी बात हलधारी ने कही है!' क्या वह नहीं जानता कि साधुओं की देह चिन्मय होती है!'
“कालीबाड़ी के घाट पर हमसे कहा था, 'तुम लोग आशीर्वाद दो कि राम राम कहते मेरे दिन कट जाएँ!'
“मैं कृष्णकिशोर के मकान पर जब जाता था, तब मुझे देखते ही वह नाचने लगता था!”
“श्रीरामचन्द्र ने लक्ष्मण से कहा था, 'भाई, जहाँ पर ऊर्जित भक्ति देखोगे, जानो कि वहीं पर मैं हूँ।'
१६ अक्टूबर, १८८३ | परिच्छेद ५७ | ३३३
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“जैसे चैतन्यदेव; प्रेम से हँसते हैं, रोते हैं, नाचते हैं, गाते हैं। चैतन्यदेव अवतार हैं - उनके रूप में ईश्वर अवतीर्ण हुए हैं।
श्रीरामकृष्ण गाना गा रहे हैं -
(भावार्थ) - “भावनिधि श्रीगौरांग का भाव तो होगा ही रे' वे भावविभोर होकर हँसते हैं, रोते हैं, नाचते हैं, गाते हैं' सिसक-सिसककर रोते हैं।”
(३)
चित्तशुद्धि के बाद ईश्वरदर्शन
बलराम के पिता, मणि मल्लिक, वेणी पाल आदि बिदा ले रहे हैं।
सायंकाल के बाद कंसारीपाड़ा की हरिसभा के भक्तगण आए हैं। उनके साथ श्रीरामकृष्ण मतवाले हाथी की तरह नृत्य कर रहे हैं। नृत्य के बाद भावविभोर होकर कह रहे हैं, “मैं कुछ दूर अपने आप ही जाऊँगा।”
किशोरी भावावस्था में चरणसेवा करने जा रहे हैं। श्रीरामकृष्ण ने किसी को छूने नहीं दिया।
सन्ध्या के बाद ईशान आए हैं। श्रीरामकृष्ण बैठे हैं - भावविभोर। थोड़ी देर बाद ईशान के साथ बात कर रहे हैं, ईशान की इच्छा है, गायत्री का पुरश्चरण करेंगे।
श्रीरामकृष्ण (ईशान के प्रति) - तुम्हारे मन में जो है, वैसा ही करो, मन में और सन्देह तो नहीं रहा?
ईशान - मैंने एक प्रकार प्रायश्चित्त की तरह संकल्प किया था।
श्रीरामकृष्ण - इस पथ में (तन्त्रमार्ग में) क्या यह नहीं होता? जो ब्रह्म है, वही शक्ति काली है। 'काली ही ब्रह्म है यह मर्म जानकर मैंने धर्माधर्म सब छोड़ दिया है।'
ईशान - चण्डी-स्तोत्र में है, ब्रह्म ही आद्याशक्ति हैं। ब्रह्म और शक्ति अभिन्न हैं।
श्रीरामकृष्ण - यह मुँह से कहने से ही नहीं होगा। जब धारणा होगी तब ठीक होगा।
“साधना के बाद चित्तशुद्धि होने पर यथार्थ ज्ञान होगा कि वे ही कर्ता हैं। वे ही मन-प्राण-बुद्धिरूप हैं। मैं केवल यन्त्ररूप हूँ' 'तुम कीचड़ में हाथी को फँसा देते हो, लंगड़े से पहाड़ लँघवाते हो!'
“चित्तशुद्धि होने पर समझ में आएगा, पुरश्चरण आदि कर्म वे ही करवाते हैं। 'उनका काम वे ही करते हैं; लोग कहते हैं, मैं करता हूँ।'
“उनके दर्शन होने पर सभी सन्देह मिट जाते हैं। उस समय अनुकूल हवा बहती है। अनुकूल हवा बहने पर जिस प्रकार नाव का माँझी पाल उठाकर पतवार पकड़कर बैठा रहता है और तम्बाकू पीता है, उसी प्रकार भक्त निश्चिन्त हो जाता है।”
३३४ श्रीरामकृष्णवचनामृत १६ अक्टूबर, १८८३
ईशान के चले जाने पर श्रीरामकृष्ण मास्टर के साथ एकान्त में बात कर रहे हैं; पूछ रहे हैं, “नरेन्द्र, राखाल, अधर, हाजरा, ये लोग तुम्हें कैसे लगते हैं, सरल हैं या नहीं? और मैं तुम्हें कैसा लगता हूँ?” मास्टर कह रहे हैं, “आप सरल हैं, फिर गम्भीर भी! आपको समझना बहुत कठिन है!” श्रीरामकृष्ण हँस रहे हैं।
<div align="center">□ □ □</div>· परिच्छेद ५८
· परिच्छेद ५८
सिंदुरियापाटी में ब्राह्मभक्तों के प्रति उपदेश
(१)
समाधि में
कार्तिक की कृष्णा एकादशी है, सोमवार, २६ नवम्बर १८८३ ई.। श्री मणिलाल मल्लिक के मकान में सिन्दूरिया-पट्टी ब्राह्मसमाज का अधिवेशन हुआ करता है। मकान चितपुर रास्ते पर है। समाज का अधिवेशन राजपथ के पास ही दुमँजले के सभागृह में हुआ करता है। आज समाज की वार्षिकी है; इसीलिए मणिलाल महोत्सव मना रहे हैं।
उपासनागृह आज आनन्दपूर्ण है, बाहर और भीतर हरे हरे पल्लवों, नाना प्रकार के फूलों और पुष्पमालाओ से सुशोभित हो रहा है। कमरे में भक्तगण बैठे हुए उपासना कब शुरू होगी इसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। कमरे के भीतर सब को जगह नहीं मिल पायी है, कई लोग पश्चिम ओरवाले छत पर टहल रहे हैं या जगह जगह पर रखी सुन्दर कुर्सियों पर बैठे हैं। बीच बीच में गृहस्वामी तथा उनके स्वजन आकर मधुर शब्दों से अभ्यागत भक्तों का स्वागत कर रहे हैं। शाम के पहले से ही ब्राह्मभक्तगण आने लगे हैं। उन्हें आज एक विशेष उत्साह है - वहाँ आज श्रीरामकृष्णदेव का शुभागमन होगा। केशव, विजय, शिवनाथ आदि ब्राह्मसमाज के भक्त नेताओं को श्रीरामकृष्णदेव बहुत प्यार करते थे। यही कारण है कि ब्राह्मभक्तों के वे इतने प्यारे हो गए थे। वे भगवत्प्रेम में मस्त रहते है; उनका प्रेम, उनका प्रांजल विश्वास, ईश्वर के साथ बालक की तरह उनकी बातचीत, ईश्वर के लिए उनका व्याकुल होकर रोना, माता मानकर स्त्री-जाति की पूजा, उनका विषयप्रसंग-वर्जन, तैलधारावत् सदा ही ईश्वर-प्रसंग करते रहना, उनका सर्वधर्म-समन्वय और अन्य धर्मों के प्रति लेशमात्र भी द्वेषभाव का न रहना, भगवद्भक्तों के लिए उनका रोना, इन सब कारणों से ब्राह्मभक्तों का चित्त उनकी ओर आकर्षित हो चुका था; इसीलिए आज कितने ही भक्त बहुत दूर से उनके दर्शन के लिए आए हुए हैं।
शिवनाथ और सत्यभाषण
उपासना के पूर्व श्रीरामकृष्ण विजयकृष्ण गोस्वामी और दूसरे ब्राह्मभक्तों के साथ
| ३३६ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २६ नवम्बर, १८८३ |
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प्रसन्नतापूर्वक वार्तालाप कर रहे हैं। समाजगृह में दीप जल चुका है, अब शीघ्र ही उपासना शुरू होगी।
श्रीरामकृष्ण बोले, "क्योंजी, क्या शिवनाथ न आएगा?" एक ब्राह्मभक्त ने कहा, "जी नहीं, आज उनको कई काम हैं आ न सकेंगे।"
श्रीरामकृष्ण - शिवनाथ को देखने से मुझे बड़ा आनन्द होता है। मानो भक्तिरस में डूबा हुआ है। और जिसे बहुत लोग मानते-जानते हैं उसमें ईश्वर की कुछ शक्ति अवश्य रहती है। परन्तु शिवनाथ में एक बहुत बड़ा दोष है - उसकी बात का कोई निश्चय नहीं रहता। मुझसे उसने कहा था, एक बार वहाँ (दक्षिणेश्वर) जाएँगे, परन्तु फिर नहीं आया और न कोई खबर ही भेजी; यह अच्छा नहीं है। एक यह भी कहा है कि सत्य बोलना कलिकाल की तपस्या है। दृढ़ता के साथ सत्य को पकड़े रहने से ईश्वरलाभ होता है। सत्य की दृढ़ता के न रहने से क्रमशः सब नष्ट हो जाता है। यही सोचकर मैं अगर कभी कह डालता हूँ, मुझे शौच को जाना है, फिर शौच को जाने की आवश्यकता न भी रहे, तो भी एक बार गड़वा लेकर झाऊतल्ले की ओर जाता हूँ। यही भय लगा रहता है कि कहीं सत्य की दृढ़ता न खो जाए। इस अवस्था के बाद हाथ में फूल लेकर माँ से मैंने कहा था, 'माँ, यह लो तुम अपना ज्ञान, यह लो अपना अज्ञान, मुझे शुद्धा भक्ति दो माँ; यह लो अपना भला, यह लो अपना बुरा, मुझे शुद्धा भक्ति दो माँ; यह लो अपना पुण्य, यह लो अपना पाप, मुझे शुद्धा भक्ति दो।' जब यह सब मैंने कहा था, तब यह बात नहीं कह सका कि माँ, यह लो अपना सत्य, यह लो अपना असत्य। माँ को सब कुछ तो दे सका, परन्तु सत्य न दे सका।
ब्राह्मसमाज की पद्धति के अनुसार उपासना होने लगी। आचार्यजी वेदी पर बैठ गए। उद्बोधन-मन्त्र के बाद आचार्यजी परब्रह्म को लक्ष्य करके वेदोक्त महामन्त्रों का उच्चारण करने लगे। ब्राह्मभक्तगण स्वर मिलाकर प्राचीन आर्यऋषियों के मुख से निकले हुए, उनकी पवित्र रसनाओं द्वारा उच्चारित नामों का कीर्तन करने लगे; कहने लगे -
"सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म, आनन्दरूपममृतं यद्विभाति, शान्तम् शिवमद्वैतम् शुद्धम-पापविद्धम्।"
प्रणवसंयुक्त यह ध्वनि भक्तों के हृदयाकाश में प्रतिध्वनित होने लगी। अनेकों के अन्तस्तल में वासना का निर्वाण-सा हो गया। चित्त बहुत-कुछ स्थिर और ध्यानोन्मुख होने लगा। सब की आँखें मुँदी हुई हैं - थोड़ी देर के लिए सब कोई वेदोक्त सगुण ब्रह्म का चिन्तन करने लगे।
श्रीरामकृष्णदेव भावमग्न हैं। निःस्पन्द, स्थिरदृष्टि, निर्वाक्, चित्रपुत्तलिका की तरह बैठे हुए हैं। आत्मापक्षी न जाने कहाँ आनन्दपूर्वक विहार कर रहा है, शरीर शून्य मन्दिर-सा पड़ा हुआ है।
समाधि के कुछ समय बाद श्रीरामकृष्णदेव आँखें खोलकर चारों ओर देख रहे हैं।
२६ नवम्बर, १८८३ | परिच्छेद ५८ | ३३७
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देखा, सभा के सभी मनुष्य आँखें बन्द किए हुए हैं। तब श्रीरामकृष्णदेव 'ब्रह्म' 'ब्रह्म' कहकर एकाएक खड़े हो गए। उपासना के बाद ब्राह्मभक्त-मण्डली मृदंग और करताल लेकर संकीर्तन करने लगी। प्रेम और आनंद में मग्न होकर श्रीरामकृष्ण भी उनके साथ मिल गए और नृत्य करने लगे। सब लोग मुग्ध होकर वह नृत्य देख रहे हैं। विजय और दूसरे भक्त भी उन्हें घेरकर नाच रहे हैं। कितने लोग तो यह दृश्य देखकर ही कीर्तन का आनन्द लेते हुए संसार को भूल गए – नामामृत पीकर थोड़ी देर के लिए विषय का आनन्द भूल गए – विषयसुख का स्वाद कटु जान पड़ने लगा।
कीर्तन हो जाने पर सब ने आसन ग्रहण किया। श्रीरामकृष्ण क्या कहते हैं, यह सुनने के लिए सब लोग उन्हें घेरकर बैठे।
(२)
गृहस्थों के प्रति उपदेश
ब्राह्मभक्त-मण्डली को सम्बोधित करके श्रीरामकृष्ण ने कहा – “निर्लिप्त होकर संसार में रहना कठिन है। प्रताप ने कहा था, ‘महाराज, हमारा वह मत है जो राजर्षि जनक का था; जनक निर्लिप्त होकर संसार में रहते थे, वैसा ही हम लोग भी करेंगे।' मैंने कहा, ‘सोचने ही से क्या कोई जनक हो सकता है? राजर्षि जनक को कितनी तपस्या करने के बाद ज्ञानलाभ हुआ था! नतमस्तक और ऊर्ध्वपद होकर उग्र तपस्या में कितना काल व्यतीत करने के बाद वे संसार में लौटे थे!'
“परन्तु क्या संसारियों के लिए उपाय नहीं है? – हाँ, अवश्य है। कुछ दिन एकान्त में साधना करनी पड़ती है, तब भक्ति होती है, तब ज्ञान होता है, इसके बाद जाकर संसार में रहो, फिर कोई दोष नहीं। जब निर्जन में साधना करोगे, उस समय संसार से बिलकुल अलग रहो; तब स्त्री, पुत्र, कन्या, माता, पिता, भाई, बहन, आत्मीय, कुटुम्ब कोई भी पास न रहे; निर्जन में साधना करते समय सोचो, हमारे कोई नहीं हैं, ईश्वर ही हमारे सर्वस्व हैं। और रो-रोकर उनके पास ज्ञान और भक्ति की प्रार्थना करो।
“यदि कहो, कितने दिन संसार छोड़कर निर्जन में रहें? तो इसके लिए यदि एक दिन भी इस तरह रह सको तो वह अच्छा; तीन दिन रहो तो और अच्छा है; अथवा बारह दिन, महीनेभर तीन महीने, सालभर – जो जितने दिन रह सके। ज्ञान-भक्ति प्राप्त करके संसार में रहने से फिर अधिक भय नहीं रहता।
“हाथों में तेल लगाकर कटहल काटने से फिर हाथों में उसका दूध नहीं चिपकता। छुई-छुऔवल खेलो तो पार छू लेने से फिर डर नहीं रहता। एक बार पारस पत्थर को छूकर सोना बन जाओ, फिर हजार वर्ष तक मिट्टी के नीचे गड़े रहने पर भी जब मिट्टी से निकाले जाओगे, तो सोना का सोना ही रहोगे।
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“मन दूध की तरह है। उस मन को अगर संसाररूपी जल में रखो तो दूध पानी से मिल जायगा; इसीलिए दूध को निर्जन में दही बनाकर उससे मक्खन निकाला जाता है। जब निर्जन में साधना करके मनरूपी दूध से ज्ञानभक्ति-रूपी मक्खन निकाला गया, तब वह मक्खन अनायास ही संसार-रूपी पानी में रखा जा सकता है। वह मक्खन कभी संसार-रूपी जल से मिल नहीं सकता – संसार जल पर निर्लिप्त होकर उतराता रहता है।”
(३)
श्रीयुत विजयकृष्ण गोस्वामी की निर्जन में साधना
श्रीयुत विजय अभी अभी गया से लौटे हैं। वहाँ बहुत दिनों तक निर्जन में रहकर वे साधुओं से मिलते रहे थे। इस समय उन्होंने भगवा धारण कर लिया है। उनकी अवस्था बड़ी ही सुन्दर है; जान पड़ता है, सदा ही अन्तर्मुख रहते हैं। श्रीरामकृष्णदेव के पास सिर झुकाए हुए हैं, जैसे मग्न होकर कुछ सोचते हों।
विजय को देखते ही श्रीरामकृष्णदेव ने कहा, “विजय, क्या तुमने घर ढूँढ लिया?
“देखो, दो साधु विचरण करते हुए एक शहर में आ पहुँचे। आश्चर्यचकित होकर उनमें से एक शहर, बाजार, दूकानें और इमारतें देख रहा था, इसी समय दूसरे से उसकी भेंट हो गयी। तब दूसरे साधु ने कहा, ‘तुम दंग होकर शहर देख रहे हो; तुम्हारा डेरा-डण्डा कहाँ है?’ पहले साधु ने कहा, ‘मैं पहले घर की खोज करके, डेरा-डण्डा रख, ताला लगाकर, निश्चिन्त होकर निकला हूँ, अब शहर का रंग-ढंग देख रहा हूँ।’ इसीलिए तुमसे मैं पूछ रहा हूँ, क्या तुमने घर ढूँढ लिया? (मास्टर आदि से) देखो, इतने दिनों तक विजय का फौआरा दबा हुआ था, अब खुल गया है।
निष्काम कर्म। संन्यासी के लिए वासनात्याग
(विजय से) – “देखो, शिवनाथ बड़ी उलझन में है। अखबार में लिखना पड़ता है, और भी बहुतसे काम उसे करने पड़ते हैं। विषयकर्म ही से अशान्ति होती है, कितनी चिन्ताएँ आ इकट्ठी होती हैं।
“श्रीमद्भागवत में है, अवधूत ने चौबीस गुरुओ में चील को भी एक गुरू बनाया था। एक जगह धीवर मछली मार रहे थे, एक चील झपटकर एक मछली ले गयी, परन्तु मछली को देखकर करीब एक हजार कौए उसके पीछे लग गए, और साथ ही काँव-काँव करके बड़ा हल्ला मचाना शुरू कर दिया। मछली को लेकर चील जिस तरफ जाती, कौए भी उसके पीछे पीछे उसी तरफ जाते। चील दक्षिण की ओर गयी, तब कौए भी उसी ओर गये। जब वह उत्तर की तरफ गयी, तब वे भी उसी ओर गये। इसी तरह पूर्व और पश्चिम
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की ओर भी चील चक्कर काटने लगी। अन्त में, घबराहट के मारे उसके चक्कर लगाते हुए मछली उससे छूटकर जमीन पर गीर पड़ी। तब वे कौए चील को छोड़ मछली की ओर उड़े। चील तब निश्चिन्त होकर एक पेड़ की डाल पर जा बैठी। बैठी हुयी सोचने लगी, ‘कुल बखेड़े की जड़ यही मछली थी; अब वह मेरे पास नहीं है इसीलिए मैं निश्चिन्त हूँ।’
“अवधूत ने चील से यह शिक्षा प्राप्त की कि जब तक मछली साथ रहेगी अर्थात् वासना रहेगी, तब तक कर्म भी रहेगा, और कर्म के कारण चिन्ता और अशान्ति भी रहेगी। वासना का त्याग होने से ही कर्मों का क्षय हो जाता है और शान्ति मिलती है।
“परन्तु निष्काम कर्म अच्छा है। उससे अशान्ति नहीं होती। पर निष्काम कर्म करना बड़ा कठिन है। मनुष्य सोचता है कि मैं निष्काम कर्म कर रहा हूँ परन्तु कहाँ से कामना निकल पड़ती है, यह समझ में नहीं आता। यदि पहले की साधना अधिक हो तो उसके बल से कोई कोई निष्काम कर्म कर सकते हैं। ईश्वरदर्शन के बाद निष्काम कर्म अनायास ही किए जा सकते हैं। ईश्वरदर्शन के बाद प्रायः कर्म छूट जाते हैं। दो-एक मनुष्य (नारदादि) लोकशिक्षा के लिए कर्म करते हैं।
संन्यासी को संचय न करना चाहिए।
प्रेम के फलस्वरूप कर्मत्याग
“अवधूत की एक आचार्या और थी – मधुमक्खी। मधुमक्खी बड़े परिश्रम से कितने ही दिनों में मधु-संचय करती है, परन्तु उस मधु का भोग वह स्वयं नहीं कर पाती। छत्ता कोई दूसरा ही आकर तोड़ ले जाता है। मधुमक्खी से अवधूत को यह शिक्षा मिली कि संचय न करना चाहिए। साधु-सन्तों को सोलहों आने ईश्वर पर अवलम्बित रहना चाहिए। उन्हें संचय न करना चाहिए।
“यह संसारियों के लिए नहीं है। संसारी को संसार का भरणपोषण करना पड़ता है। इसीलिए उन्हें संचय की आवश्यकता होती है। पक्षी और सन्त संचयी नहीं होते, परन्तु चिड़ियाँ बच्चे देने पर संचय करती हैं – चोंच में दबाकर बच्चे के लिए खाना ले आती हैं।
“देखो विजय, साधु के साथ अगर बोरिया-बधना रहे – कपड़े की पन्द्रह गिरहवाली गठरी रहे, तो उस पर विश्वास न करना। मैंने बटतल्ले में ऐसे साधु देखे थे। दो-तीन बैठे हुए थे, कोई दाल के कंकड़ चुन रहा था, कोई कपड़ा सी रहा था और कोई बड़े आदमी के घर के भण्डारे की गप्प लड़ा रहा था, ‘अरे उस बाबू ने लाखों रुपये खर्च किए, साधुओं को खूब खिलाया – पूड़ी, जलेबी, पेड़ा, बरफी, मालपुआ, बहुतसी चीजें तैयार करायीं’।” (सब हँसते हैं।)
विजय – जी हाँ, गया में इस तरह के साधु मुझे भी देखने को मिले हैं। गया के साधु लोटावाले होते हैं। (सब हँसते हैं।)
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३४० श्रीरामकृष्णवचनामृत २६ नवम्बर, १८८३
श्रीरामकृष्ण (विजय के प्रति) – ईश्वर पर जब प्रेम हो जाता है तब कर्म आप ही आप छूट जाते हैं। ईश्वर जिनसे कर्म कराते हैं, वे करते रहें। अब तुम्हारा समय हो गया है; अब सब छोड़कर तुम कहो, 'मन! तू देख और मैं देखूँ, कोई दूसरा न देखे'।
यह कहकर श्रीरामकृष्ण उस अतुलनीय कण्ठ से माधुरी बरसाते हुए गाने लगे –
(भावार्थ) – “आदरणीय श्यामा माँ को यत्नपूर्वक हृदय में धारण करो। मन! तू देख और मैं देखूँ; कोई दूसरा न देखने पाए। कामादि को धोखा देकर, मन! आ, निर्जन में उसे देखें, साथ रसना को भी रखेंगे ताकि वह 'माँ माँ' कहकर पुकारती रहे! कुमन्त्रणाएँ देनेवाली जितनी कुरुचियाँ हैं उन्हें पास भी न फटकने देना। ज्ञाननयन को पहरेदार रखो, वह सतर्क रहे।”
श्रीरामकृष्ण (विजय के प्रति) भगवान् की शरण में जाकर अब लज्जा, भय, यह सब छोड़ो। मैं अगर भगवत्कीर्तन में नाचूँ तो लोग मुझे क्या कहेंगे, यह सब भाव छोड़ो।
“लज्जा, घृणा और भय, इन तीनों में किसी के रहते ईश्वर नहीं मिलते। लज्जा, घृणा, भय, जाति-अभिमान, गुप्त रखने की इच्छा, ये सब पाश हैं। इन सब के चले जाने से जीव की मुक्ति होती है।
“पाशों में जो बँधा हुआ है वह जीव है और उनसे जो मुक्त है वह शिव है। भगवत्प्रेम दुर्लभ वस्तु है। पहले-पहल, पति के प्रति पत्नी की जैसी निष्ठा होती है वैसी ही यदि ईश्वर के प्रति हो तो ही भक्ति होती है। शुद्धा भक्ति का होना बड़ा कठिन है। भक्ति द्वारा, मन और प्राण ईश्वर में लय हो जाते हैं।
“इसके बाद भाव होता है। भाव में मनुष्य निर्वाक् हो जाता है। वायु स्थिर हो जाती है। कुम्भक आप ही आप होता है। जैसे बन्दूक दागते समय गोली चलानेवाला मनुष्य निर्वाक् हो जाता है और उसकी वायु स्थिर हो जाती है।
“प्रेम का होना बड़ी दूर की बात है। प्रेम चैतन्यदेव को हुआ था। ईश्वर पर जब प्रेम होता है, तब बाहर की चीजें भूल जाती हैं। संसार भूल जाता है। अपना शरीर जो इतना प्यारा है, वह भी भूल जाता है।”
यह कहकर श्रीरामकृष्णदेव फिर गाने लगे –
(भावार्थ) – “नहीं मालूम, कब वह दिन होगा जब हरिनाम कहते हुए मेरी आँखों से धारा बह चलेगी, संसार-वासना दूर हो जाएगी, शरीर पुलकित हो जाएगा!”
(४)
भाव, कुम्भक तथा ईश्वरदर्शन
ऐसी बातचीत हो रही है, ठीक इस समय कुछ और निमन्त्रित ब्राह्मभक्त आकर उपस्थित हुए। उनमें कुछ तो पण्डित थे और कुछ उच्चपदाधिकारी राजकर्मचारी। उनमें
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२६ नवम्बर, १८८३ परिच्छेद ५८ ३४१
२६ नवम्बर, १८८३ परिच्छेद ५८ ३४१
एक श्री रजनीनाथ राय भी थे।
श्रीरामकृष्ण कहते हैं, “भाव के होने पर वायु स्थिर हो जाती है। अर्जुन ने जब लक्ष्यभेद किया, तब उनकी दृष्टि मछली की आँख पर ही थी – किसी दूसरी ओर नहीं। यहाँ तक कि आँख के सिवाय कोई दूसरा अंग उन्हें दीख ही नहीं पड़ा। ऐसी अवस्था में वायु स्थिर होती है, कुम्भक होता है।
“ईश्वरदर्शन का एक लक्षण यह है कि भीतर से महावायु घरघराती हुई सिर की ओर जाती है; तब समाधि होती है, भगवान् के दर्शन होते हैं।
कोरा पाण्डित्य मिथ्या है। ऐश्वर्य, वैभव, मान, पद सब मिथ्या है।
“जो पण्डित मात्र हैं किन्तु ईश्वर पर जिनकी भक्ति नहीं है उनकी बातें उलझनदार होती हैं। सामाध्यायी नाम के एक पण्डित ने कहा था, ‘ईश्वर नीरस है, तुम लोग अपनी भक्ति और प्रेम के द्वारा उसे सरस कर लो।’ जिन्हें वेदों ने ‘रसस्वरूप’ कहा है, उन्हें नीरस बतलाता है! इससे ज्ञात होता है कि वह मनुष्य नहीं जानता ईश्वर कौनसी वस्तु है; इसीलिए उसकी बातें इतनी उलझनदार हैं।
“एक ने कहा था, मेरे मामा के यहाँ घोड़ों की एक बड़ी गोशाला है! उसकी इस बात से समझना चाहिए कि घोड़ा एक भी नहीं है; क्योंकि घोड़े कभी गोशाला में नहीं रहते। (सब हँसते हैं।)
“किसी को ऐश्वर्य का – वैभव, सम्मान, पद आदि का – अहंकार होता है। यह सब दो दिन के लिए है। साथ कुछ भी न जाएगा। एक गीत में हैं –
(गीत का आशय) – ‘ऐ मन सोच ले, कोई किसी का नहीं है। तू इस संसार में वृथा ही मारा मारा फिरता है। मायाजाल में फँसकर दक्षिणाकाली को भूल न जाना। जिसके लिए तू इतना सोचता है, क्या वह तेरे साथ भी जाएगा? तेरी वही प्रेयसी, जब तू मर जाएगा तब तेरी लाश से अमंगल की शंका करके घर में पानी का छिड़काव करेगी। यह सोचना कि मुझे लोग मालिक जो कहते हैं, वह सिर्फ दो ही दिन के लिए है। जब कालाकाल के मालिक आ जाते हैं तब पहले के वही मालिक श्मशानघाट में फेंक दिये जाते हैं।’
“और धन का अहंकार भी न करना चाहिए। अगर कहो, मैं धनी हूँ। तो धनी भी एक-एक से बढ़कर हैं। सन्ध्या के बाद जब जुगनू उड़ता है, तब वह सोचता है, इस संसार को प्रकाश मैं दे रहा हूँ। परन्तु तारे ज्यों ही उगते हैं कि उसका अहंकार चला जाता है। तब तारे सोचने लगे, हमीं लोग संसार को प्रकाश देते हैं। कुछ देर बाद चन्द्रोदय हुआ। तब तारे लज्जा से म्लान हो गये। चन्द्रदेव सोचने लगे। मेरे ही आलोक से संसार हँस रहा है, संसार को प्रकाश मैं देता हूँ। देखते ही देखते सूर्य उगे, चन्द्र मलिन होकर ऐसे छिपे