श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
पृष्ठ 360, कुल 711 में से
संदर्भ में पढ़ें| २६ नवम्बर, १८८३ | परिच्छेद ५८ | ३३७ |
|---|
देखा, सभा के सभी मनुष्य आँखें बन्द किए हुए हैं। तब श्रीरामकृष्णदेव 'ब्रह्म' 'ब्रह्म' कहकर एकाएक खड़े हो गए। उपासना के बाद ब्राह्मभक्त-मण्डली मृदंग और करताल लेकर संकीर्तन करने लगी। प्रेम और आनंद में मग्न होकर श्रीरामकृष्ण भी उनके साथ मिल गए और नृत्य करने लगे। सब लोग मुग्ध होकर वह नृत्य देख रहे हैं। विजय और दूसरे भक्त भी उन्हें घेरकर नाच रहे हैं। कितने लोग तो यह दृश्य देखकर ही कीर्तन का आनन्द लेते हुए संसार को भूल गए – नामामृत पीकर थोड़ी देर के लिए विषय का आनन्द भूल गए – विषयसुख का स्वाद कटु जान पड़ने लगा।
कीर्तन हो जाने पर सब ने आसन ग्रहण किया। श्रीरामकृष्ण क्या कहते हैं, यह सुनने के लिए सब लोग उन्हें घेरकर बैठे।
(२)
गृहस्थों के प्रति उपदेश
ब्राह्मभक्त-मण्डली को सम्बोधित करके श्रीरामकृष्ण ने कहा – “निर्लिप्त होकर संसार में रहना कठिन है। प्रताप ने कहा था, ‘महाराज, हमारा वह मत है जो राजर्षि जनक का था; जनक निर्लिप्त होकर संसार में रहते थे, वैसा ही हम लोग भी करेंगे।' मैंने कहा, ‘सोचने ही से क्या कोई जनक हो सकता है? राजर्षि जनक को कितनी तपस्या करने के बाद ज्ञानलाभ हुआ था! नतमस्तक और ऊर्ध्वपद होकर उग्र तपस्या में कितना काल व्यतीत करने के बाद वे संसार में लौटे थे!'
“परन्तु क्या संसारियों के लिए उपाय नहीं है? – हाँ, अवश्य है। कुछ दिन एकान्त में साधना करनी पड़ती है, तब भक्ति होती है, तब ज्ञान होता है, इसके बाद जाकर संसार में रहो, फिर कोई दोष नहीं। जब निर्जन में साधना करोगे, उस समय संसार से बिलकुल अलग रहो; तब स्त्री, पुत्र, कन्या, माता, पिता, भाई, बहन, आत्मीय, कुटुम्ब कोई भी पास न रहे; निर्जन में साधना करते समय सोचो, हमारे कोई नहीं हैं, ईश्वर ही हमारे सर्वस्व हैं। और रो-रोकर उनके पास ज्ञान और भक्ति की प्रार्थना करो।
“यदि कहो, कितने दिन संसार छोड़कर निर्जन में रहें? तो इसके लिए यदि एक दिन भी इस तरह रह सको तो वह अच्छा; तीन दिन रहो तो और अच्छा है; अथवा बारह दिन, महीनेभर तीन महीने, सालभर – जो जितने दिन रह सके। ज्ञान-भक्ति प्राप्त करके संसार में रहने से फिर अधिक भय नहीं रहता।
“हाथों में तेल लगाकर कटहल काटने से फिर हाथों में उसका दूध नहीं चिपकता। छुई-छुऔवल खेलो तो पार छू लेने से फिर डर नहीं रहता। एक बार पारस पत्थर को छूकर सोना बन जाओ, फिर हजार वर्ष तक मिट्टी के नीचे गड़े रहने पर भी जब मिट्टी से निकाले जाओगे, तो सोना का सोना ही रहोगे।