श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३३८ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २६ नवम्बर, १८८३ |
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“मन दूध की तरह है। उस मन को अगर संसाररूपी जल में रखो तो दूध पानी से मिल जायगा; इसीलिए दूध को निर्जन में दही बनाकर उससे मक्खन निकाला जाता है। जब निर्जन में साधना करके मनरूपी दूध से ज्ञानभक्ति-रूपी मक्खन निकाला गया, तब वह मक्खन अनायास ही संसार-रूपी पानी में रखा जा सकता है। वह मक्खन कभी संसार-रूपी जल से मिल नहीं सकता – संसार जल पर निर्लिप्त होकर उतराता रहता है।”
(३)
श्रीयुत विजयकृष्ण गोस्वामी की निर्जन में साधना
श्रीयुत विजय अभी अभी गया से लौटे हैं। वहाँ बहुत दिनों तक निर्जन में रहकर वे साधुओं से मिलते रहे थे। इस समय उन्होंने भगवा धारण कर लिया है। उनकी अवस्था बड़ी ही सुन्दर है; जान पड़ता है, सदा ही अन्तर्मुख रहते हैं। श्रीरामकृष्णदेव के पास सिर झुकाए हुए हैं, जैसे मग्न होकर कुछ सोचते हों।
विजय को देखते ही श्रीरामकृष्णदेव ने कहा, “विजय, क्या तुमने घर ढूँढ लिया?
“देखो, दो साधु विचरण करते हुए एक शहर में आ पहुँचे। आश्चर्यचकित होकर उनमें से एक शहर, बाजार, दूकानें और इमारतें देख रहा था, इसी समय दूसरे से उसकी भेंट हो गयी। तब दूसरे साधु ने कहा, ‘तुम दंग होकर शहर देख रहे हो; तुम्हारा डेरा-डण्डा कहाँ है?’ पहले साधु ने कहा, ‘मैं पहले घर की खोज करके, डेरा-डण्डा रख, ताला लगाकर, निश्चिन्त होकर निकला हूँ, अब शहर का रंग-ढंग देख रहा हूँ।’ इसीलिए तुमसे मैं पूछ रहा हूँ, क्या तुमने घर ढूँढ लिया? (मास्टर आदि से) देखो, इतने दिनों तक विजय का फौआरा दबा हुआ था, अब खुल गया है।
निष्काम कर्म। संन्यासी के लिए वासनात्याग
(विजय से) – “देखो, शिवनाथ बड़ी उलझन में है। अखबार में लिखना पड़ता है, और भी बहुतसे काम उसे करने पड़ते हैं। विषयकर्म ही से अशान्ति होती है, कितनी चिन्ताएँ आ इकट्ठी होती हैं।
“श्रीमद्भागवत में है, अवधूत ने चौबीस गुरुओ में चील को भी एक गुरू बनाया था। एक जगह धीवर मछली मार रहे थे, एक चील झपटकर एक मछली ले गयी, परन्तु मछली को देखकर करीब एक हजार कौए उसके पीछे लग गए, और साथ ही काँव-काँव करके बड़ा हल्ला मचाना शुरू कर दिया। मछली को लेकर चील जिस तरफ जाती, कौए भी उसके पीछे पीछे उसी तरफ जाते। चील दक्षिण की ओर गयी, तब कौए भी उसी ओर गये। जब वह उत्तर की तरफ गयी, तब वे भी उसी ओर गये। इसी तरह पूर्व और पश्चिम