श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
| ३३८ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २६ नवम्बर, १८८३ |
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“मन दूध की तरह है। उस मन को अगर संसाररूपी जल में रखो तो दूध पानी से मिल जायगा; इसीलिए दूध को निर्जन में दही बनाकर उससे मक्खन निकाला जाता है। जब निर्जन में साधना करके मनरूपी दूध से ज्ञानभक्ति-रूपी मक्खन निकाला गया, तब वह मक्खन अनायास ही संसार-रूपी पानी में रखा जा सकता है। वह मक्खन कभी संसार-रूपी जल से मिल नहीं सकता – संसार जल पर निर्लिप्त होकर उतराता रहता है।”
(३)
श्रीयुत विजयकृष्ण गोस्वामी की निर्जन में साधना
श्रीयुत विजय अभी अभी गया से लौटे हैं। वहाँ बहुत दिनों तक निर्जन में रहकर वे साधुओं से मिलते रहे थे। इस समय उन्होंने भगवा धारण कर लिया है। उनकी अवस्था बड़ी ही सुन्दर है; जान पड़ता है, सदा ही अन्तर्मुख रहते हैं। श्रीरामकृष्णदेव के पास सिर झुकाए हुए हैं, जैसे मग्न होकर कुछ सोचते हों।
विजय को देखते ही श्रीरामकृष्णदेव ने कहा, “विजय, क्या तुमने घर ढूँढ लिया?
“देखो, दो साधु विचरण करते हुए एक शहर में आ पहुँचे। आश्चर्यचकित होकर उनमें से एक शहर, बाजार, दूकानें और इमारतें देख रहा था, इसी समय दूसरे से उसकी भेंट हो गयी। तब दूसरे साधु ने कहा, ‘तुम दंग होकर शहर देख रहे हो; तुम्हारा डेरा-डण्डा कहाँ है?’ पहले साधु ने कहा, ‘मैं पहले घर की खोज करके, डेरा-डण्डा रख, ताला लगाकर, निश्चिन्त होकर निकला हूँ, अब शहर का रंग-ढंग देख रहा हूँ।’ इसीलिए तुमसे मैं पूछ रहा हूँ, क्या तुमने घर ढूँढ लिया? (मास्टर आदि से) देखो, इतने दिनों तक विजय का फौआरा दबा हुआ था, अब खुल गया है।
निष्काम कर्म। संन्यासी के लिए वासनात्याग
(विजय से) – “देखो, शिवनाथ बड़ी उलझन में है। अखबार में लिखना पड़ता है, और भी बहुतसे काम उसे करने पड़ते हैं। विषयकर्म ही से अशान्ति होती है, कितनी चिन्ताएँ आ इकट्ठी होती हैं।
“श्रीमद्भागवत में है, अवधूत ने चौबीस गुरुओ में चील को भी एक गुरू बनाया था। एक जगह धीवर मछली मार रहे थे, एक चील झपटकर एक मछली ले गयी, परन्तु मछली को देखकर करीब एक हजार कौए उसके पीछे लग गए, और साथ ही काँव-काँव करके बड़ा हल्ला मचाना शुरू कर दिया। मछली को लेकर चील जिस तरफ जाती, कौए भी उसके पीछे पीछे उसी तरफ जाते। चील दक्षिण की ओर गयी, तब कौए भी उसी ओर गये। जब वह उत्तर की तरफ गयी, तब वे भी उसी ओर गये। इसी तरह पूर्व और पश्चिम
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की ओर भी चील चक्कर काटने लगी। अन्त में, घबराहट के मारे उसके चक्कर लगाते हुए मछली उससे छूटकर जमीन पर गीर पड़ी। तब वे कौए चील को छोड़ मछली की ओर उड़े। चील तब निश्चिन्त होकर एक पेड़ की डाल पर जा बैठी। बैठी हुयी सोचने लगी, ‘कुल बखेड़े की जड़ यही मछली थी; अब वह मेरे पास नहीं है इसीलिए मैं निश्चिन्त हूँ।’
“अवधूत ने चील से यह शिक्षा प्राप्त की कि जब तक मछली साथ रहेगी अर्थात् वासना रहेगी, तब तक कर्म भी रहेगा, और कर्म के कारण चिन्ता और अशान्ति भी रहेगी। वासना का त्याग होने से ही कर्मों का क्षय हो जाता है और शान्ति मिलती है।
“परन्तु निष्काम कर्म अच्छा है। उससे अशान्ति नहीं होती। पर निष्काम कर्म करना बड़ा कठिन है। मनुष्य सोचता है कि मैं निष्काम कर्म कर रहा हूँ परन्तु कहाँ से कामना निकल पड़ती है, यह समझ में नहीं आता। यदि पहले की साधना अधिक हो तो उसके बल से कोई कोई निष्काम कर्म कर सकते हैं। ईश्वरदर्शन के बाद निष्काम कर्म अनायास ही किए जा सकते हैं। ईश्वरदर्शन के बाद प्रायः कर्म छूट जाते हैं। दो-एक मनुष्य (नारदादि) लोकशिक्षा के लिए कर्म करते हैं।
संन्यासी को संचय न करना चाहिए।
प्रेम के फलस्वरूप कर्मत्याग
“अवधूत की एक आचार्या और थी – मधुमक्खी। मधुमक्खी बड़े परिश्रम से कितने ही दिनों में मधु-संचय करती है, परन्तु उस मधु का भोग वह स्वयं नहीं कर पाती। छत्ता कोई दूसरा ही आकर तोड़ ले जाता है। मधुमक्खी से अवधूत को यह शिक्षा मिली कि संचय न करना चाहिए। साधु-सन्तों को सोलहों आने ईश्वर पर अवलम्बित रहना चाहिए। उन्हें संचय न करना चाहिए।
“यह संसारियों के लिए नहीं है। संसारी को संसार का भरणपोषण करना पड़ता है। इसीलिए उन्हें संचय की आवश्यकता होती है। पक्षी और सन्त संचयी नहीं होते, परन्तु चिड़ियाँ बच्चे देने पर संचय करती हैं – चोंच में दबाकर बच्चे के लिए खाना ले आती हैं।
“देखो विजय, साधु के साथ अगर बोरिया-बधना रहे – कपड़े की पन्द्रह गिरहवाली गठरी रहे, तो उस पर विश्वास न करना। मैंने बटतल्ले में ऐसे साधु देखे थे। दो-तीन बैठे हुए थे, कोई दाल के कंकड़ चुन रहा था, कोई कपड़ा सी रहा था और कोई बड़े आदमी के घर के भण्डारे की गप्प लड़ा रहा था, ‘अरे उस बाबू ने लाखों रुपये खर्च किए, साधुओं को खूब खिलाया – पूड़ी, जलेबी, पेड़ा, बरफी, मालपुआ, बहुतसी चीजें तैयार करायीं’।” (सब हँसते हैं।)
विजय – जी हाँ, गया में इस तरह के साधु मुझे भी देखने को मिले हैं। गया के साधु लोटावाले होते हैं। (सब हँसते हैं।)
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३४० श्रीरामकृष्णवचनामृत २६ नवम्बर, १८८३
श्रीरामकृष्ण (विजय के प्रति) – ईश्वर पर जब प्रेम हो जाता है तब कर्म आप ही आप छूट जाते हैं। ईश्वर जिनसे कर्म कराते हैं, वे करते रहें। अब तुम्हारा समय हो गया है; अब सब छोड़कर तुम कहो, 'मन! तू देख और मैं देखूँ, कोई दूसरा न देखे'।
यह कहकर श्रीरामकृष्ण उस अतुलनीय कण्ठ से माधुरी बरसाते हुए गाने लगे –
(भावार्थ) – “आदरणीय श्यामा माँ को यत्नपूर्वक हृदय में धारण करो। मन! तू देख और मैं देखूँ; कोई दूसरा न देखने पाए। कामादि को धोखा देकर, मन! आ, निर्जन में उसे देखें, साथ रसना को भी रखेंगे ताकि वह 'माँ माँ' कहकर पुकारती रहे! कुमन्त्रणाएँ देनेवाली जितनी कुरुचियाँ हैं उन्हें पास भी न फटकने देना। ज्ञाननयन को पहरेदार रखो, वह सतर्क रहे।”
श्रीरामकृष्ण (विजय के प्रति) भगवान् की शरण में जाकर अब लज्जा, भय, यह सब छोड़ो। मैं अगर भगवत्कीर्तन में नाचूँ तो लोग मुझे क्या कहेंगे, यह सब भाव छोड़ो।
“लज्जा, घृणा और भय, इन तीनों में किसी के रहते ईश्वर नहीं मिलते। लज्जा, घृणा, भय, जाति-अभिमान, गुप्त रखने की इच्छा, ये सब पाश हैं। इन सब के चले जाने से जीव की मुक्ति होती है।
“पाशों में जो बँधा हुआ है वह जीव है और उनसे जो मुक्त है वह शिव है। भगवत्प्रेम दुर्लभ वस्तु है। पहले-पहल, पति के प्रति पत्नी की जैसी निष्ठा होती है वैसी ही यदि ईश्वर के प्रति हो तो ही भक्ति होती है। शुद्धा भक्ति का होना बड़ा कठिन है। भक्ति द्वारा, मन और प्राण ईश्वर में लय हो जाते हैं।
“इसके बाद भाव होता है। भाव में मनुष्य निर्वाक् हो जाता है। वायु स्थिर हो जाती है। कुम्भक आप ही आप होता है। जैसे बन्दूक दागते समय गोली चलानेवाला मनुष्य निर्वाक् हो जाता है और उसकी वायु स्थिर हो जाती है।
“प्रेम का होना बड़ी दूर की बात है। प्रेम चैतन्यदेव को हुआ था। ईश्वर पर जब प्रेम होता है, तब बाहर की चीजें भूल जाती हैं। संसार भूल जाता है। अपना शरीर जो इतना प्यारा है, वह भी भूल जाता है।”
यह कहकर श्रीरामकृष्णदेव फिर गाने लगे –
(भावार्थ) – “नहीं मालूम, कब वह दिन होगा जब हरिनाम कहते हुए मेरी आँखों से धारा बह चलेगी, संसार-वासना दूर हो जाएगी, शरीर पुलकित हो जाएगा!”
(४)
भाव, कुम्भक तथा ईश्वरदर्शन
ऐसी बातचीत हो रही है, ठीक इस समय कुछ और निमन्त्रित ब्राह्मभक्त आकर उपस्थित हुए। उनमें कुछ तो पण्डित थे और कुछ उच्चपदाधिकारी राजकर्मचारी। उनमें
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एक श्री रजनीनाथ राय भी थे।
श्रीरामकृष्ण कहते हैं, “भाव के होने पर वायु स्थिर हो जाती है। अर्जुन ने जब लक्ष्यभेद किया, तब उनकी दृष्टि मछली की आँख पर ही थी – किसी दूसरी ओर नहीं। यहाँ तक कि आँख के सिवाय कोई दूसरा अंग उन्हें दीख ही नहीं पड़ा। ऐसी अवस्था में वायु स्थिर होती है, कुम्भक होता है।
“ईश्वरदर्शन का एक लक्षण यह है कि भीतर से महावायु घरघराती हुई सिर की ओर जाती है; तब समाधि होती है, भगवान् के दर्शन होते हैं।
कोरा पाण्डित्य मिथ्या है। ऐश्वर्य, वैभव, मान, पद सब मिथ्या है।
“जो पण्डित मात्र हैं किन्तु ईश्वर पर जिनकी भक्ति नहीं है उनकी बातें उलझनदार होती हैं। सामाध्यायी नाम के एक पण्डित ने कहा था, ‘ईश्वर नीरस है, तुम लोग अपनी भक्ति और प्रेम के द्वारा उसे सरस कर लो।’ जिन्हें वेदों ने ‘रसस्वरूप’ कहा है, उन्हें नीरस बतलाता है! इससे ज्ञात होता है कि वह मनुष्य नहीं जानता ईश्वर कौनसी वस्तु है; इसीलिए उसकी बातें इतनी उलझनदार हैं।
“एक ने कहा था, मेरे मामा के यहाँ घोड़ों की एक बड़ी गोशाला है! उसकी इस बात से समझना चाहिए कि घोड़ा एक भी नहीं है; क्योंकि घोड़े कभी गोशाला में नहीं रहते। (सब हँसते हैं।)
“किसी को ऐश्वर्य का – वैभव, सम्मान, पद आदि का – अहंकार होता है। यह सब दो दिन के लिए है। साथ कुछ भी न जाएगा। एक गीत में हैं –
(गीत का आशय) – ‘ऐ मन सोच ले, कोई किसी का नहीं है। तू इस संसार में वृथा ही मारा मारा फिरता है। मायाजाल में फँसकर दक्षिणाकाली को भूल न जाना। जिसके लिए तू इतना सोचता है, क्या वह तेरे साथ भी जाएगा? तेरी वही प्रेयसी, जब तू मर जाएगा तब तेरी लाश से अमंगल की शंका करके घर में पानी का छिड़काव करेगी। यह सोचना कि मुझे लोग मालिक जो कहते हैं, वह सिर्फ दो ही दिन के लिए है। जब कालाकाल के मालिक आ जाते हैं तब पहले के वही मालिक श्मशानघाट में फेंक दिये जाते हैं।’
“और धन का अहंकार भी न करना चाहिए। अगर कहो, मैं धनी हूँ। तो धनी भी एक-एक से बढ़कर हैं। सन्ध्या के बाद जब जुगनू उड़ता है, तब वह सोचता है, इस संसार को प्रकाश मैं दे रहा हूँ। परन्तु तारे ज्यों ही उगते हैं कि उसका अहंकार चला जाता है। तब तारे सोचने लगे, हमीं लोग संसार को प्रकाश देते हैं। कुछ देर बाद चन्द्रोदय हुआ। तब तारे लज्जा से म्लान हो गये। चन्द्रदेव सोचने लगे। मेरे ही आलोक से संसार हँस रहा है, संसार को प्रकाश मैं देता हूँ। देखते ही देखते सूर्य उगे, चन्द्र मलिन होकर ऐसे छिपे
३४२ श्रीरामकृष्णवचनामृत २६ नवम्बर, १८८३
कि फिर दीख भी न पड़े।
"धनी मनुष्य अगर यह सब सोचे तो धन का अहंकार न हो।"
उत्सव के कारण मणिलाल ने खान-पान का बहुत बड़ा आयोजन किया था। उन्होंने यत्नपूर्वक श्रीरामकृष्ण और समवेत भक्तमण्डली को भोजन कराया। जब सब लोग घर लौटे, तब रात बहुत हो गयी थी, परन्तु किसी को कोई कष्ट नहीं हुआ।
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केशव सेन के मकान पर
(१)
कमल-कुटीर के सामने - पश्यति तव पन्थानम्
कार्तिक की कृष्णा चतुर्दशी, २८ नवम्बर १८८३, दिन बुधवार है। आज एक भक्त* कमल-कुटीर (Lily Cottage) के पूर्ववाले रास्ते पर टहल रहे हैं; जैसे व्याकुल हो किसी की प्रतीक्षा कर रहे हों।
कमल-कुटीर के उत्तर की तरफ मंगलबाड़ी है। वहाँ बहुतसे ब्राह्मभक्त रहते हैं। कमल-कुटीर में केशव रहते हैं। उनकी पीड़ा बढ़ गयी है। कितने ही लोग कहते हैं, अब की बार शायद वे न बचेंगे।
श्रीरामकृष्ण केशव को बहुत प्यार करते हैं, आज इन्हें देखने के लिए आनेवाले हैं। वे दक्षिणेश्वर कालीमन्दिर से आ रहे हैं। इसीलिए भक्तलोग उनकी बाट जोह रहे हैं।
कमल-कुटीर सर्क्यूलर रोड के पश्चिम ओर है। इसीलिए भक्त महोदय रास्ते में ही टहल रहे हैं। वे दो बजे दिन से प्रतीक्षा कर रहे हैं। कितने ही लोग जाते हैं, वे उन्हें देख भर लेते हैं।
रास्ते के पूर्व ओर विक्टोरिया कालेज है। यहाँ केशव के समाज की बहुतसी ब्राह्म महिलाएँ ओर उनकी कन्याएँ पढ़ती हैं। रास्ते से कालेज का बहुतसा भाग दिखायी पड़ता है। कालेज के उत्तर की ओर एक बड़ा उद्यानगृह है, उसमें कोई अंग्रेज सज्जन रहते हैं। भक्त महोदय बड़ी देर से देख रहे हैं कि उनके यहाँ कोई विपत्ति आयी है। थोड़ी देर बाद काले कपड़े पहने कोचवान मृतदेह ले जानेवाली गाड़ी ले आए। करीब डेढ़-दो घण्टों से यह सब तैयारी चल रही है।
यह मर्त्यधाम छोड़कर कोई चला गया है इसीलिए यह तैयारी हो रही थी। भक्त सोच रहे हैं – कहाँ? देह को त्यागकर मनुष्य कहाँ जाता है?
उत्तर से दक्षिण की और कितनी ही गाड़ियाँ आ रही हैं। भक्त एक एक बार देख
* ग्रन्थकार स्वयं
३४४ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २८ नवम्बर, १८८३
रहे हैं - वे आ रहे हैं या नहीं।
शाम हो आयी, पाँच बज गए। इसी समय श्रीरामकृष्ण की गाड़ी भी आ पहुँची। साथ लाटू तथा दो-एक भक्त और भी हैं। राखाल भी आये हैं।
केशव के घर के आदमी आकर श्रीरामकृष्ण को अपने साथ ऊपर ले गए। बैठकखाने के दक्षिण ओरवाले बरामदे में एक पलंग रखा हुआ था। उसी पर श्रीरामकृष्ण को उन्होंने बैठाया।
(२)
समाधिस्थ श्रीरामकृष्ण। जगन्माता के साथ वार्तालाप
श्रीरामकृष्ण बड़ी देर से बैठे हुए हैं। आप केशव को देखने के लिए अधीर हो रहे हैं। केशव के शिष्यगण विनीत भाव से कह रहे हैं कि वे अभी थोड़ा विश्राम कर रहे हैं, थोड़ी ही देर में आनेवाले हैं।
केशव की पीड़ा इतनी बढ़ी हुई है कि दशा संकटापन्न हो रही है। इसीलिए उनकी शिष्यमण्डली और घरवाले इतनी सावधानी से काम कर रहे हैं। परन्तु श्रीरामकृष्ण केशव को देखने के लिए उत्तरोत्तर अधीर हो रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण (केशव के शिष्यों से) - क्यों जी, उनके आने की क्या आवश्यकता है? मैं ही क्यों न भीतर चला जाऊँ?
प्रसन्न (विनयपूर्वक) - अब वे थोड़ी ही देर में आते हैं।
श्रीरामकृष्ण - जाओ, तुम्हीं लोग ऐसा कर रहे हो। मैं भीतर जाता हूँ।
प्रसन्न - श्रीरामकृष्ण को बातों में बहलाने के इरादे से केशव की बातें कह रहे हैं।
प्रसन्न - उनकी अवस्था एक दूसरे ही प्रकार की हो गयी है। आपकी ही तरह माँ के साथ बातचीत करते हैं। माँ जो कुछ कहती हैं, उसे सुनकर कभी हँसते हैं और कभी रोते हैं।
केशव जगन्माता के साथ बातचीत करते हैं, हँसते हैं, रोते हैं, यह सुनते ही श्रीरामकृष्ण भावावेश में आ गए। देखते ही देखते समाधिस्थ हो गये।
श्रीरामकृष्ण समाधिस्थ हैं। जाड़े का समय है, हरी बनात का कुर्ता पहने हुए हैं। ऊपर से एक शाल डाले हुए हैं। उन्नत देह, दृष्टि स्थिर हो रही है। बिलकुल ही मग्न हैं। बड़ी देर तक यह अवस्था रही। समाधि छूटती ही नहीं।
सन्ध्या हो आयी। श्रीरामकृष्ण कुछ प्रकृतिस्थ हुए। पास के बैठकखाने में दीप जलाया जा चुका है। श्रीरामकृष्ण को उसी कमरे में बिठाने की चेष्टा की जा रही है।
बड़ी कठिनाई से लोग उन्हें बैठकखाने के कमरे में ले गए।
कमरे में बहुतसी चीजें हैं - कोच, टेबिल, कुर्सी, गैसबत्ती आदि। श्रीरामकृष्ण को
२८ नवम्बर, १८८३ | परिच्छेद ५९ | ३४५
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लोगों ने एक कोच पर ले जाकर बैठाया। कोच पर बैठते ही श्रीरामकृष्ण फिर बाह्यज्ञान-रहित भावाविष्ट हो गये। कोच पर दृष्टि डालकर आवेश में मानो कुछ कह रहे हैं, – "पहले इन सब चीजों की आवश्यकता थी, अब क्या आवश्यकता है?" (राखाल को देखकर) "राखाल, तू भी आया है?"
जगन्माता के साथ वार्तालाप
कहते ही कहते फिर न जाने क्या देख रहे हैं। कहते हैं – "यह लो, माँ आ गयीं। और अब बनारसी साड़ी पहनकर क्या दिखलाती हो! माँ, गोलमाल न करो, बैठो – बैठो भी।"
श्रीरामकृष्ण पर महाभाव का नशा चढ़ा हुआ है। कमरे में प्रकाश भर रहा है। ब्राह्मभक्त चारों ओर से घेरे हुए हैं। लाटू, राखाल, मास्टर आदि पास बैठे हुए हैं। श्रीरामकृष्ण भावावस्था में आप ही आप कह रहे हैं –
"देह और आत्मा। देह बनी है और बिगड़ भी जाएगी आत्मा अमर है। जैसे सुपारी – पकी सुपारी छिलके से अलग रहती है; कच्ची अवस्था में फल और छिलके को अलग अलग करना बड़ा कठिन है। उनके दर्शन करने पर, उन्हें प्राप्त करने पर देहबुद्धि दूर हो जाती है। तब समझ में आ जाता है कि आत्मा पृथक् है और देह भी।"
केशव कमरे में आ रहे हैं। पूर्व ओर के द्वार से आ रहे हैं। जिन लोगों ने उन्हें ब्राह्मसमाज-मन्दिर में अथवा टाउन-हाल में देखा था, वे उनकी अस्थि-चर्मावशिष्ट मूर्ति देखकर चकित हो गए। केशव खड़े नहीं हो सकते, दीवार के सहारे आगे बढ़ रहे हैं। बहुत कष्ट करके कोच के सामने आकर बैठे।
श्रीरामकृष्ण इतने ही में कोच से उतरकर नीचे बैठे। केशव श्रीरामकृष्ण के दर्शन पाकर भूमिष्ठ हो बड़ी देर तक उन्हें प्रणाम करते रहे। प्रणाम करके उठकर बैठ गए श्रीरामकृष्ण अब भी भावावेश में हैं। आप ही आप कुछ कह रहे हैं। श्रीरामकृष्ण माता के साथ बातचीत कर रहे हैं।
(३)
ब्रह्म और शक्ति अभेद। नरलीला। सिद्ध और साधक में भेद
अब केशव ने उच्च स्वर से कहा, "मैं आया – मैं आया।" यह कहकर उन्होंने श्रीरामकृष्ण का बायाँ हाथ पकड़ लिया और उसी हाथ पर अपना हाथ फेरने लगे। श्रीरामकृष्ण भावावेश में पूरे मतवाले हो गये हैं; आप ही आप कितनी ही बातें कर रहे हैं। भक्तगण निर्वाक् होकर सुन रहे हैं।
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| ३४६ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २८ नवम्बर, १८८३ |
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श्रीरामकृष्ण – जब तक उपाधि है, तभी तक अनेक का बोध हो सकता है, जैसे केशव, प्रसन्न, अमृत – ये सब। पूर्ण ज्ञान होने पर एकमात्र चैतन्य का ही बोध होता है।
“पूर्ण ज्ञान होने पर मनुष्य देखता है, वही एकमात्र चैतन्य यह जीव-प्रपंच, ये चौबीसों तत्त्व बने हैं।
“परन्तु शक्ति की विशेषता पायी जाती है। यह सच है कि सब कुछ वे ही बने हैं, परन्तु कहीं तो उनकी शक्ति का प्रकाश अधिक है और कहीं कम।
“विद्यासागर ने कहा था, क्या ईश्वर ने किसी को अधिक शक्ति और किसी को कम शक्ति दी है मैंने कहा, अगर ऐसा न होता तो एक आदमी पचास आदमियों को हराता कैसे – और तुम्हें ही फिर क्यों हम लोग देखने आते ?
“वे जिस आधार में अपनी लीला का विकास दिखलाते हैं, वहाँ शक्ति की विशेषता रहती है।
“जमींदार सब जगह पर रहते हैं। परन्तु उन्हें लोग किसी खास बैठकखाने में अक्सर बैठते हुए देखते हैं। ईश्वर का बैठकखाना भक्तों का हृदय है। वहाँ अपनी लीला दिखाना उन्हें अधिक पसन्द है। वहाँ उनकी विशेष शक्ति अवतीर्ण होती है।
“इसका लक्षण क्या है? जहाँ कार्य की अधिकता है वहाँ शक्ति का विशेष प्रकाश है।
“यह आद्याशक्ति और परब्रह्म दोनों अभेद हैं। एक को छोड़ दूसरे का चिन्तन नहीं किया जा सकता। जैसे ज्योति और मणि। मणि को छोड़ मणि की ज्योति के बारे में सोचा नहीं जा सकता और न ज्योति को अलग करके मणि के बारे में ही सोचा जा सकता है। जैसे सर्प और उसकी वक्रगति। न सर्प को छोड़ उसकी तिर्यग्-गति सोची जा सकती है और न तिर्यग्-गति को छोड़ सर्प को।
सिद्ध और साधक मे भेद
“आद्याशक्ति ने ही इस जीव-प्रपंच, इस चतुर्विंशति तत्त्व का स्वरूप धारण किया है – अनुलोम और विलोम। राखाल, नरेन्द्र तथा और और लड़कों के लिए क्यों मैं इतना सोच विचार किया करता हूँ? हाजरा ने कहा, तुम उन लोगों के लिए इतना सोचते क्यों हो, ईश्वर-चिन्तन फिर कब करोगे (केशव तथा दूसरों का मुसकराना)
“तब मुझे बड़ी चिन्ता हुई। मैंने कहा, माँ यह क्या हुआ! हाजरा कहता है, उन लोगों के लिए क्यों सोचते रहते हो? फिर मैंने भोलानाथ से पूछा। उसने कहा, इसका उदाहरण महाभारत में है। समाधिस्थ मनुष्य समाधि से उतरकर ठहरे कहाँ? वह इसीलिये सतोगुणी मनुष्यों को लेकर रहता है। महाभारत का यह उदाहरण जब मिला तब जी में जी आया। (सब हँसते हैं।)
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२८ नवम्बर, १८८३ | परिच्छेद ५९ | ३४७
| २८ नवम्बर, १८८३ | परिच्छेद ५९ | ३४७ |
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“हाजरा का दोष नहीं है। साधक अवस्था में सम्पूर्ण मन ‘नेति’ ‘नेति’ करके उन्हें दे देना पड़ता है। सिद्ध-अवस्था की बात दूसरी है। उन्हें प्राप्त कर लेने पर अनुलोम और विलोम एक से प्रतीत होते हैं। मट्ठा अलग करने पर जब मक्खन मिलता है तब जान पड़ता है कि मट्ठे का ही मक्खन है और मक्खन का ही मट्ठा। तब ठीक ठीक समझ में आता है कि सब कुछ वे ही हुए हैं। कहीं उनका अधिक प्रकाश है, कहीं कम।
“भावसमुद्र उमड़ने पर स्थल में भी एक बाँस पानी हो जाता है। पहले नदी से होकर समुद्र में जाते समय बहुत-कुछ चक्कर लगाकर जाना पड़ता है, ओर जब बाढ़ आती है तब सूखी जमीन पर भी एक बाँस पानी हो जाता है। तब नाव सीधे चलाकर लोग जगह पर पहुँच जाते हैं। फिर चक्कर मारकर नहीं जाना पड़ता। इसी तरह धान कट जाने पर मेंड़ से चक्कर काटकर नहीं आना पड़ता। सीधे एक रास्ते से निकल जाओ।
“उन्हें प्राप्त कर लेने पर फिर सभी वस्तुओं में उनके दर्शन होते हैं। मनुष्य के भीतर उनका अधिक प्रकाश है। मनुष्यों में सतोगुणी भक्तों में उनका और अधिक प्रकाश रहता है – जिनमें कामिनी और कांचन के भोग की बिलकुल ही इच्छा नहीं रहती। (सब स्तब्ध हैं।) समाधिस्थ मनुष्य जब उतरता है तब भला वह कहाँ ठहरे? – किस पर अपना मन रमाये? कामिनी और कांचन का त्याग करनेवाले सतोगुणी शुद्ध भक्तों की आवश्यकता उन्हें इसीलिए होती है। नहीं तो फिर वे क्या लेकर रहें?
“जो ब्रह्म हैं, वे ही आद्याशक्ति भी हैं। जब वे निष्क्रिय हैं, तब उन्हें ब्रह्म कहते हैं, पुरुष कहते हैं। जब सृष्टि, स्थिति, प्रलय ये सब करते हैं, तब उन्हें शक्ति कहते हैं, प्रकृति कहते हैं। पुरुष और प्रकृति। जो पुरुष हैं, वे ही प्रकृति भी हैं। आनन्दमय और आनन्दमयी।
“जिसे पुरुष-ज्ञान है, उसे स्त्री-ज्ञान भी है। जिसे पिता का बोध है, उसे माता का भी बोध है। (केशव हँसते हैं।)
“जिसे अँधेरे का ज्ञान है, उसे उजाले का भी ज्ञान है। जिसे रात का ज्ञान है, उसे दिन का भी ज्ञान है। जिसे सुख का ज्ञान है, उसे दुःख का भी। यह बात समझे”?
केशव (सहास्य) – जी हाँ, समझा।
श्रीरामकृष्ण – माँ! कौनसी माँ! जगत् की माँ – जिन्होंने जगत् की सृष्टि की; जो उसका पालन कर रही हैं; जो अपनी सन्तानों की सदा रक्षा करती हैं; और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष – जो जो कुछ चाहता है, उसे वही देती हैं। जो उनकी यथार्थ सन्तान है, वह उन्हें छोड़कर नहीं रह सकती। उसकी माता ही सब कुछ जानती हैं। वह तो बस खाता है, खेलता है, और घूमता है। इसके सिवाय वह और कुछ नहीं जानता।
केशव – जी हाँ।
३४८ श्रीरामकृष्णवचनामृत २८ नवम्बर, १८८३
(४)
ब्राह्मसमाज और ईश्वर का ऐश्वर्य-वर्णन।
त्रिगुणातीत भक्त
वार्तालाप करते हुए श्रीरामकृष्ण प्रकृतिस्थ हो गए हैं। केशव के साथ हँसते हुए बातचीत कर रहे हैं। कमरे भर के लोग एकाग्र चित्त से उनकी सब बातें सुनते और उन्हें देखते हैं। सभी निर्वाक् हैं कि 'तुम कैसे हो' आदि व्यावहारिक बातें तो होती ही नहीं, केवल भगवत्-प्रसंग छिड़ा हुआ है।
श्रीरामकृष्ण (केशव से) – ब्राह्मभक्त इतनी महिमा क्यों गाया करते हैं? 'हे ईश्वर, तुमने चन्द्र की सृष्टि की, सूर्य को पैदा किया, नक्षत्र बनाए' – इन सब बातों की क्या आवश्यकता है? बहुतसे लोग बगीचे की ही प्रशंसा करते हैं; पर मालिक से कितने लोग मिलना चाहते हैं? बगीचा बड़ा है या मालिक?
"शराब पी चुकने पर कलाल की दूकान में कितने मन शराब है, इसकी जाँच-पड़ताल से हमारा क्या काम? हमारा तो मतलब एक ही बोतल से निकल जाता है।
"नरेन्द्र को देखकर मैंने कभी नहीं पूछा, तेरे पिता का क्या नाम है? तेरे पिता की कितनी कोठियाँ हैं?
"कारण जानते हो? मनुष्य स्वयं ऐश्वर्य का आदर करता है, इसलिए वह समझता है कि ईश्वर भी उसका आदर करते हैं। सोचता है, उनके ऐश्वर्य की प्रशंसा करने पर वे प्रसन्न होंगे। शम्भु ने कहा था, 'अब तो इस समय यही आशीर्वाद दीजिये जिससे यह ऐश्वर्य उनके पादपद्मों में अर्पित करके मरूँ।' मैंने कहा, 'यह तुम्हारे लिए ही ऐश्वर्य है; उन्हें तुम क्या दे सकते हो! उनके लिए यह सब काठ और मिट्टी के बराबर है।'
"जब विष्णुघर के कुल गहने चुरा लिए गए तब मैं और मथुरबाबू, दोनों श्रीठाकुरजी को देखने के लिए गए। मथुरबाबू ने कहा, 'चलो महाराज, तुममें कोई शक्ति नहीं है। तुम्हारी देह से कुल गहने निकाल लिये गये और तुम कुछ न कर सके!' मैंने उससे कहा, 'यह तुम्हारी कैसी बात है! तुम जिसके सामने गहने गहने चिल्लाते हो, उनके लिए ये सब मिट्टी के ढेले हैं। लक्ष्मी जिनकी शक्ति हैं, क्या वे तुम्हारे चोरी गए इन कुछ रुपयों के लिए परेशान होंगे! ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए।'
"क्या ईश्वर ऐश्वर्य के भी वश है? वे तो भक्ति के वश हैं। जानते हो, वे क्या चाहते हैं? वे रुपया नहीं चाहते – भाव, प्रेम, भक्ति, विवेक, वैराग्य यह सब चाहते हैं।
"जिसका जैसा भाव होता है, वह ईश्वर को वैसा ही देखता है। जो तमोगुणी भक्त है, वह देखता है कि माँ बकरा खाती है वह बकरे की बलि भी देता है। रजोगुणी भक्त नाना प्रकार के व्यंजन और अन्न-पकवान चढ़ाता है। सतोगुणी भक्त की पूजा में आडम्बर
२८ नवम्बर, १८८३ | परिच्छेद ५९ | ३४९
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नहीं होता। उसकी पूजा लोग समझ भी नहीं पाते। फूल नहीं मिलते तो वह बिल्वपत्र और गंगाजल से ही पूजा कर लेता है। थोड़ेसे चावलों या दो बताशों का ही भोग लगा देता है। कभी कभी खीर पकाकर ही ठाकुरजी को निवेदित कर देता है।
“एक और है – त्रिगुणातीत भक्त। उसका स्वभाव बालकों जैसा होता है। ईश्वर का नाम लेना ही उसकी पूजा है। वह बस उनका नाम ही जपता रहता है।”
(५)
केशव के साथ वार्तालाप। ईश्वर के अस्पताल में आत्मा की रोगचिकित्सा
श्रीरामकृष्ण (केशव के प्रति सहास्य) – तुम्हें बीमारी हुई इसका अर्थ है। शरीर के भीतर कितने ही भावों का उदयास्त हो चुका है; इसीलिए ऐसा हुआ है। जब भाव होता है तब कुछ समझ में नहीं आता, बहुत दिनों के बाद शरीर पर झोंका लगता है। मैंने देखा है, बड़ा जहाज जब गंगा से चला जाता है, तब कुछ भी मालूम नहीं होता, परन्तु थोड़ी ही देर बाद देखा कि किनारों पर लहरें जोरों से थपेड़े जमा रही हैं, और पानी में उथल-पुथल मच जाती है। कभी कभी तो किनारों का कुछ अंश भी धँसकर पानी में गिर जाता है।
“किसी कुटिया में घुसकर हाथी उसे हिला-डुलाकर तहस-नहस कर देता है। भावरूपी हाथी जब देहरूपी कमरे में घुसता है, तो उसे डाँवाडोल कर देता है।
“इससे क्या होता है, जानते हो? आग लगने पर कुछ चीजों को वह जलाकर खाक कर देती है; एक महा ऊधम मचा देती है। ज्ञानाग्नि पहले काम, क्रोध आदि रिपुओं को जलाती है, फिर अहंबुद्धि को। इसके बाद एक बहुत बड़ी उथल-पुथल मचा देती है।
“तुम सोचते हो कि बस, सब मामला तय है। परन्तु जब तक रोग की कुछ कसर रहेगी, तब तक वे तुम्हें नहीं छोड़ सकते। अगर तुम अस्पताल में नाम लिखाओं तो फिर तुम्हें चले आने का अधिकार नहीं है। जब तक रोग में कोई त्रुटि पायी जाएगी, तब तक डाक्टर साहब तुम्हें आने नहीं देंगे। तुमने नाम क्यों लिखाया?” (सब हँसते हैं।)
केशव अस्पताल की बात सुनकर बार बार हँस रहे हैं। हँसी रोक नहीं सकते; रह-रहकर फिर हँसे रहे हैं। श्रीरामकृष्ण पुनः वार्तालाप करने लगे।
श्रीरामकृष्ण (केशव से) – हदू कहता था, न तो मैंने ऐसा भाव देखा है, और न ऐसा रोग! उस समय मैं बहुत बीमार था। क्षण क्षण में दस्त होते थे और बहुत अधिक मात्रा में। सिर पर जान पड़ता था दो लाख चीटियाँ काट रही हैं। परन्तु ईश्वरीय प्रसंग दिनरात जारी रहता था! नाटागढ़ का राम कविराज देखने के लिए आया। उसने देखा कि मैं बैठा हुआ विचार कर रहा हूँ। तब उसने कहा, 'क्या यह पागल है? दो हाड़ लेकर विचार कर रहा है!’
३५० श्रीरामकृष्णवचनामृत २८ नवम्बर, १८८३
(केशव से) – 'उसकी इच्छा। माँ, सब तुम्हारी ही इच्छा है।'
“‘ऐ तारा, तुम इच्छामयी हो, सब तुम्हारी ही इच्छा है। माँ, कर्म तुम्हारे हैं, करती भी तुम्हीं हो, परन्तु मनुष्य कहते हैं, मैं करता हूँ।’
“सर्दी लगाने के उद्देश्य से माली बसरा-गुलाब को छाँटकर उसकी जड़ खोल देता है। सर्दी लगने से पेड़ अच्छी तरह उगता है। शायद इसीलिए वह तुम्हारी जड़ खोल रही है। (श्रीरामकृष्ण और केशव हँसते हैं।) जान पड़ता है, अगली बार एक बड़ी घटना होनेवाली है।
“जब कभी तुम बीमार पड़ जाते हो तब मुझे बड़ी घबराहट होती है। पहली बार भी जब तुम बीमार पड़े थे, तब रात के पिछले पहर मैं रोया करता था। कहता था, माँ, केशव को अगर कुछ हो गया तो फिर किससे बातचीत करूँगा! तब कलकत्ता आने पर मैंने सिद्धेश्वरी को नारियल और चीनी चढ़ायी थी। माँ के पास मनौती मानी थी जिससे बीमारी अच्छी हो जाए।”
केशव पर श्रीरामकृष्ण के इस अकृत्रिम स्नेह और उनके लिए उनकी व्याकुलता की बात को लोग निर्वाक् होकर सुन रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – परन्तु इस बार उतना नहीं हुआ। मैं सच कहूँगा। हाँ, दो-तीन दिन कुछ थोड़ा कलेजा मसोसा करता था।
केशव जिस पूर्ववाले द्वार से बैठकखाने में आए थे, उसी द्वार के पास केशव की पूजनीय माता खड़ी हैं। वहीं से उमानाथ जरा ऊँचे स्वर में श्रीरामकृष्ण से कह रहे हैं, “माँ आपको प्रणाम कर रही हैं।”
श्रीरामकृष्ण हँसने लगे। उमानाथ कहते हैं, “माँ कह रही हैं, ऐसा आशीर्वाद दीजिए जिससे केशव की बीमारी अच्छी हो जाय।” श्रीरामकृष्ण ने कहा, “माँ आनन्दमयी को पुकारो, दुःख वही दूर कर सकती हैं।” श्रीरामकृष्ण केशव से कहने लगे –
“घर के भीतर इतना न रहा करो। पुत्र-कन्याओं के बीच में रहने से और डूबोगे, ईश्वरीय चर्चा होने पर और अच्छे रहोगे।”
गम्भीर भाव से ये बातें कहकर श्रीरामकृष्ण फिर बालक की तरह हँसने लगे। केशव से कह रहे हैं, “देखूँ, तुम्हारा हाथ देखूँ।” बालक की तरह हाथ लेकर मानो तौल रहे हैं। अन्त में कहने लगे, “नहीं, तुम्हारा हाथ हलका है, खलों का हाथ भारी होता है।” (लोग हँसते हैं।)
उमानाथ दरवाजे से फिर कहने लगे, “माँ कह रही हैं – केशव को आशीर्वाद दीजिए।”
श्रीरामकृष्ण (गम्भीर स्वरों में) – मेरी क्या शक्ति है! वे ही आशीर्वाद देंगी। 'माँ, अपना काम तुम करती हो, लोग कहते हैं, मैं कर रहा हूँ।'
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"ईश्वर दो बार हँसते हैं। एक बार उस समय हँसते हैं जब दो भाई जमीन बाँटते हैं, और रस्सी से नापकर कहते हैं, 'इस ओर की मेरी है और उस ओर की तुम्हारी।' ईश्वर यह सोचकर हँसते हैं कि संसार तो है मेरा और ये लोग थोड़ीसी मिट्टी लेकर इस ओर की मेरी, उस ओर की तुम्हारी कर रहे हैं।
"फिर ईश्वर एक बार और हँसते हैं। बच्चे की बीमारी बढ़ी हुई है। उसकी माँ रो रही है। वैद्य आकर कह रहा है, 'डरने की क्या बात है, माँ! मैं अच्छा कर दूँगा।' वैद्य नहीं जानता कि ईश्वर यदि मारना चाहें तो किसकी शक्ति है जो अच्छा कर सके?" (सब सन्न हो रहे)
ठीक इसी समय केशव बड़ी देर तक खाँसते रहे। वह खाँसी रुकती ही न थी। खाँसने की आवाज से सब को कष्ट हो रहा है। बड़ी देर तक बहुत कुछ कष्ट झेलते रहने के बाद खाँसी कुछ बन्द हुई। केशव से अब और नहीं रहा जाता। श्रीरामकृष्ण को उन्होंने भूमिष्ठ हो प्रणाम किया। प्रणाम करके बड़े कष्ट से दीवार टेक-टेककर उसी द्वार से अपने कमरे में फिर चले गये।
(६)
ब्राह्मसमाज और वेदोल्लिखित देवता। गुरुपन नीच बुद्धि
श्रीरामकृष्ण कुछ मिष्ठान्न ग्रहण करके जाएंगे। केशव के बड़े लड़के उनके पास आकर बैठे।
अमृत ने कहा, "यह केशव का बड़ा लड़का है। आप आशीर्वाद दीजिये। यह क्या! सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दीजिए।"
श्रीरामकृष्ण ने कहा, "मुझे आशीर्वाद न देना चाहिए।" यह कहकर मुसकराते हुए बच्चे की देह पर हाथ फेरने लगे।
अमृत (हँसते हुए) - अच्छा, तो देह पर हाथ फेरिये। (सब हँसते हैं।)
श्रीरामकृष्ण अमृत आदि ब्राह्मभक्तों से केशव की बातचीत करने लगे।
श्रीरामकृष्ण (अमृत आदि से) - बीमारी अच्छी हो - ये सब बातें मैं नहीं कह सकता। यह शक्ति मैं माँ से चाहता भी नहीं। मैं माँ ये यही कहता हूँ, माँ, मुझे शुद्ध भक्ति दो।
'ये (केशव) क्या कुछ कम आदमी हैं? जो लोग रुपये चाहते हैं, वे भी इन्हें मानते हैं और साधु भी। दयानन्द को देखा, वे बगीचे में ठहरे हुए थे। 'केशव सेन - केशव सेन' कहकर छटपटा रहे थे कि कब केशव आए। उस दिन शायद केशव के वहाँ आने की बात थी।
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“दयानन्द बंगला भाषा को कहते थे – 'गौड़ाण्ड भाषा।'
“ये (केशव) शायद होम और देवता नहीं मानते थे। इसीलिए वे कहते थे, 'ईश्वर ने इतनी चीजें तो तैयार कीं, और देवता नहीं तैयार कर सके?'”
श्रीरामकृष्ण केशव के शिष्यों से केशव की प्रशंसा कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – केशव ही हीनबुद्धि नहीं है। इन्होंने बहुतों से कहा है, 'जो कुछ सन्देह हो, वहाँ * जाकर पूछ लो।' मेरा भी यही स्वभाव है। मैं कहता हूँ, ये कोटि गुण और बढ़ें। मैं मान लेकर क्या करूँगा?
“ये बड़े आदमी हैं। जो लोग धन चाहते हैं, वे भी इन्हें मानते हैं ओर साधु भी मानते हैं।”
श्रीरामकृष्ण कुछ मिष्टान्न ग्रहण करके अब गाड़ी पर चढ़नेवाले हैं। ब्राह्मभक्त उन्हें चढ़ाने के लिए जा रहे हैं।
जीने से उतरते समय श्रीरामकृष्ण ने देखा, नीचे उजाला नहीं है। तब अमृत आदि भक्तों से उन्होंने कहा, “इन सब स्थानों में अच्छा प्रकाश चाहिए, नहीं तो गरीबी आ घेरती है। ऐसा अब फिर कभी न हो।”
श्रीरामकृष्ण एक-दो भक्तों को साथ लेकर उसी रात को कालीमन्दिर की ओर चल पड़े।
(७)
जयगोपाल सेन के घर में शुभागमन।
केशव को देखकर दक्षिणेश्वर लौटते समय रात में सात बजे के बाद श्रीरामकृष्ण माथाघासगली में श्रीजयगोपाल के घर पर आए।
भक्तगण न जाने क्या विचार कर रहे हैं। वे सोच रहे हैं, 'श्रीरामकृष्ण दिनरात ईश्वरप्रेम मे मस्त रहते हैं। विवाह तो किया है, परन्तु धर्मपत्नी से सांसारिक कोई सम्बन्ध नहीं रखते; बल्कि उन पर भक्ति रखते हैं, उनकी पूजा करते हैं, उनके साथ केवल ईश्वरीय प्रसंग किया करते हैं; सदा भगवद्गीत गाते, परमात्मा की पूजा करते तथा ध्यान करते हैं; किसी से कोई मायिक सम्बन्ध रखते ही नहीं। उनके लिए ईश्वर ही यथार्थ वस्तु हैं और शेष सब असार पदार्थ। रुपया, धातुद्रव्य, लोटा, कटोरा यह कुछ छू भी नहीं सकते। स्त्रियों को भी नहीं छू सकते। अगर कभी छू लेते हैं तो जहाँ छू जाता है वहाँ सींगी मछली के काँटे के चुभ जाने के समान पीड़ा होने लगती है। रुपया या सोना अगर हाथ पर रख दिया जाता है तो कलाई मुरक जाती है, अवस्था विकृत हो जाती है, साँस रुक जाती है।
* श्रीरामकृष्ण के पास
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जब वह धातु हटा ली जाती है, तब वे अपनी सच्ची अवस्था को प्राप्त होते हैं - तब उनकी साँस फिर चलने लगती है।'
भक्तगण कितनी ही बातों का विचार कर रहे हैं 'क्या संसार छोड़ देना होगा? पढ़ाई-लिखाई करने की जब अब क्या आवश्यकता है? यदि विवाह ही न किया जाय तो फिर नौकरी क्यों करनी पड़ेगी? क्या माता-पिता को छोड़ देना होगा? मैंने तो विवाह कर लिया है, मेरे सन्तान भी हो चुकी है; मुझे तो परिवार का पालन-पोषण करना होगा; मेरा क्या हाल होगा? मेरी भी इच्छा होती है कि मैं दिनरात ईश्वर के प्रेम में मग्न रहूँ! श्रीरामकृष्ण को देख मुझे लगता है कि मैं क्या कर रहा हूँ! ये तो दिनरात तेल की धार के सदृश निरन्तर ईश्वरचिन्तन कर रहे हैं, और मैं दिनरात विषयचिन्ता करता हुआ घूम रहा हूँ। एकमात्र इनके दर्शन ही मेघ से घिरे हुए आकाश में बीच बीच में चमक जानेवाली विद्युत्-ज्योति के समान हैं। अब इस जीवन समस्या को कैसे सुलझाया जाय?
'इन्होंने तो स्वयं कर दिखाया! फिर अब भी सन्देह क्यों?
'क्या संसार सचमुच बालू की भीत की तरह क्षणभंगुर है? मैं इसे छोड़ क्यों नहीं पा रहा हूँ? शायद मुझमे शक्ति कम है। यदि ईश्वर पर वैसा तीव्र प्रेम हो जाय तो फिर कोई हिसाब नहीं रह जाता। जब गंगा में बाढ़ आकर पानी वेग से बहने लगता है तब कौन रोक सकता है? जिस प्रेम का उदय होने के कारण श्रीगौरांग कौपीन धारण कर संन्यासी बन गये, जिस प्रेम के कारण ईसा मसीह अन्य सब चिन्ताएँ भूलकर वनवासी हुए शरीर छोड़ दिया, जिस प्रेम के कारण राजवैभव त्यागकर बुद्धदेव वैरागी बने उस प्रेम का एक बिन्दु भी यदि प्राप्त हो जाय तो यह अनित्य संसार कहाँ पड़ा रह जाय!
'अच्छा, जो दुर्बल हैं, जिनमें प्रेम उदित नहीं हुआ, जो संसारी जीव हैं, जिनके पैर माया की जंजीर से बँधे हुए हैं, उनका क्या उपाय हो? जो हो, मैं इन प्रेममय वैरागी महापुरुष का संग न छोड़ूँगा। देखूँ, ये क्या कहते हैं!'
भक्तगण इसी प्रकार की कल्पनाएँ कर रहे थे। श्रीरामकृष्ण जयगोपाल के बैठकखाने में भक्तों के साथ बैठे हुए हैं, सामने जयगोपाल उनके आत्मीय तथा पड़ोसी आदि हैं। एक पड़ोसी वार्तालाप करने के लिए पहले ही से तैयार थे। वही अग्रणी होकर कुछ पूछने लगे। जयगोपाल के भाई वैकुण्ठ भी हैं।
गृहस्थाश्रम तथा श्रीरामकृष्ण
वैकुण्ठ – हम संसारी मनुष्य हैं, हमारे लिए कुछ कहिए।
श्रीरामकृष्ण – ईश्वर को जानकर, एक हाथ उनके पैरों पर रखकर दूसरे हाथ से संसार का काम करो।
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वैकुण्ठ – महाराज, संसार क्या मिथ्या है?
श्रीरामकृष्ण – जब तक उनका ज्ञान नहीं होता, तब तक मिथ्या है। तब मनुष्य उन्हें भूलकर 'मेरा मेरा' कहता रहता है – माया में फँसकर, कामिनी-कांचन में मुग्ध होकर और भी डूब जाता है। माया में मनुष्य ऐसा अज्ञानी हो जाता है कि भागने का रास्ता रहने पर भी नहीं भाग सकता। एक गाना है –
(भावार्थ) – “ 'महामाया की कैसी विचित्र माया है! कैसे भ्रम में उन्होंने डाल रखा है! उनकी माया में ब्रह्मा और विष्णु भी अचेत हो रहे हैं, तो जीव बेचारा भला क्या जान सकता है? मछली जाल में पकड़ी जाती है, परन्तु आने-जाने की राह रहने पर भी वह उससे भाग नहीं सकती। रेशम के कीड़े रेशम की गोटियाँ बनाते हैं; वे चाहें तो उसे काटकर उससे निकल सकते हैं, परन्तु महामाया के प्रभाव से वे इस तरह बद्ध हैं कि अपनी बनायी हुई गोटियों में ही अपनी जान दे देते हैं।'
“तुम लोग तो स्वयं भी देख रहे हो कि संसार अनित्य है। देखो न, कितने आदमी आए और गए। कितने पैदा हुए और कितनों ने देह छोड़ी। संसार अभी अभी तो है और थोड़ी ही देर में नहीं! अनित्य! जिन्हें लेकर इतना 'मेरा' 'मेरा' कर रहे हो, आँखें बन्द करते ही कहीं कुछ नहीं है। है कोई नहीं, फिर भी नाती की बाँह पकड़े बैठे हैं – उसके लिए वाराणसी नहीं जा सकते! कहते हैं – मेरे लाल का क्या होगा? आने जाने की राह है, फिर भी मछली भाग नहीं सकती। रेशम के कीड़े अपनी बनायी गोटियों में ही अपनी जान दे देते हैं। इस प्रकार का संसार मिथ्या है, अनित्य है।”
पड़ोसी – महाराज, एक हाथ ईश्वर में और दूसरा संसार में क्यों रखें? अगर संसार अनित्य है, तो एक हाथ भी संसार में क्यों रखें?
श्रीरामकृष्ण – उन्हें जानकर संसार में रहने से संसार अनित्य नहीं रह जाता। एक गाना सुनो।
(गीत का मर्म) – “ऐ मन, तू खेती का काम नहीं जानता। ऐसी मनुष्यदेहरूपी जमीन पड़ी ही रह गयी! अगर तू काश्तकारी करता तो इसमें सोना फल सकता था। पहले तू उसमें कालीनाम का घेरा लगा दे, इस तरह फसल नष्ट न हो सकेगी। वह मुक्तकेशी का बड़ा ही दृढ़ घेरा है, उसके पास यम की भी हिम्मत नहीं जो कदम बढ़ा सके। आज या शताब्दी भर के बाद यह जमीन बेदखल हो जाएगी, क्या यह तू नहीं जानता? अतएव अब तू लगन लगाकर उसे जोतकर फसल क्यों नहीं तैयार कर लेता? गुरुप्रदत्त बीज डालकर भक्तिवारि से खेत सींचता जा। अगर तू अकेला यह काम न कर सके तो 'रामप्रसाद' को भी अपने साथ ले ले।”
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गृहस्थाश्रम में ईश्वरलाभ। उपाय
श्रीरामकृष्ण – गाना सुना? 'कालीनाम का घेरा लगा दो, इससे फसल नष्ट न होगी।' ईश्वर की शरण में जाओ, सब कुछ पाओगे। 'वह मुक्तकेशी माँ का बड़ा ही मजबूत घेरा है, उसके अन्दर यमराज पैर नहीं बढ़ा सकते।' बड़ा ही मजबूत घेरा है। उन्हें अगर प्राप्त कर सको तो फिर संसार असार न प्रतीत होगा। जिसने उन्हें जान लिया है, वह देखता है, जीव-जगत् सब वही बने हैं! बच्चों को खिलाओ तो यह जानकर कि गोपाल को खिला रहे हो। पिता और माता को ईश्वर और जगन्माता देखो और उनकी सेवा करो। उन्हें जानकर संसार में रहने से ब्याही हुई स्त्री से फिर सांसारिक सम्बन्ध नहीं रह जाता। दोनों ही भक्त हो जाते हैं, केवल ईश्वरीय बातचीत करते हैं, ईश्वरीय प्रसंग लेकर रहते हैं, तथा भक्तों की सेवा करते हैं। सर्वभूतों में वे हैं, अतएव दोनों उन्हीं की सेवा करते हैं।
पड़ोसी – महाराज, ऐसे स्त्री-पुरुष दीख क्यों नहीं पड़ते?
श्रीरामकृष्ण – दीख पड़ते हैं, परन्तु बहुत कम। विषयी मनुष्य उन्हें पहचान नहीं पाते। परन्तु ऐसा तभी होता है, जब दोनों ही भले हों। जब दोनों ही ईश्वरप्रेम-प्राप्त हों तभी ऐसा हो सकता है। इसके लिए परमात्मा की विशेष कृपा चाहिए। नहीं तो सदा ही अनमेल रहता है। एक को अलग हो जाना पड़ता है। अगर मेल न हुआ तो बड़ा कष्ट होता है। स्त्री दिनरात कोसती रहती है, 'बाबूजी ने क्यों यहाँ मेरा विवाह किया? न मुझे ही कुछ खाने को मिला, न बच्चों को ही; न मुझे ही कुछ पहनने को मिला, न बच्चों को ही मैं कुछ पहना सकी। एक गहना भी तो नहीं है! तुमने मुझे क्या सुख में रखा है! आँखें मूँदकर ईश्वर ईश्वर कर रहे हैं। यह सब पागलपन छोड़ो।'
भक्त – ये सब बाधाएँ तो हैं ही, ऊपर से कभी कभी यह भी होता है कि लड़के कहना ही नहीं मानते। इस पर और भी कितनी ही आपदाएँ हैं। महाराज, तो फिर उपाय क्या है?
श्रीरामकृष्ण – संसार में रहकर साधना करना बड़ा कठिन है। बड़ी बाधाएँ हैं। ये सब तुम्हें बतलाने की जरूरत नहीं है – रोग, शोक, दारिद्र, उस पर पत्नी से अनबन, लड़के आवारा, मूर्ख और गँवार।
“परन्तु उपाय है। कभी कभी एकान्त में जाकर उनसे प्रार्थना करनी पड़ती है, उन्हें पाने के लिए चेष्टा करनी पड़ती है।”
पड़ोसी – घर से निकल जाना होगा?
श्रीरामकृष्ण – एकदम नहीं। जब अवकाश हो तब निर्जन में जाकर एक-दो दिन रहो – परन्तु संसार से कोई सम्बन्ध न रहे, किसी विषयी मनुष्य के साथ किसी सांसारिक
३५६ श्रीरामकृष्णवचनामृत २८ नवम्बर, १८८३
विषय की चर्चा न करनी पड़े। या तो निर्जन में रहो या सत्संग करो।
पड़ोसी – सत्संग के लिए साधु-महात्मा की पहचान कैसे हो?
श्रीरामकृष्ण – जिनका मन, जिनका जीवन, जिनकी अन्तरात्मा ईश्वर में लीन हो गयी है, वही महात्मा हैं। जिन्होंने कामिनी और कांचन का त्याग कर दिया है, वही महात्मा हैं। जो महात्मा हैं, वे स्त्रियों को संसार की दृष्टि से नहीं देखते। यदि स्त्रियों के पास वे कभी जाते हैं तो उन्हें मातृवत् देखते हैं और उनकी पूजा करते हैं। साधु-महात्मा सदा ईश्वर का ही चिन्तन करते हैं। ईश्वरीय प्रसंग के सिवाय और कोई बात उनके मुँह से नहीं निकलती। और सर्वभूतों में ईश्वर का ही वास है यह जानकर वे सब की सेवा करते हैं। संक्षेप में यही साधुओं के लक्षण हैं।
पड़ोसी – क्या बराबर एकान्त में रहना होगा?
श्रीरामकृष्ण – फुटपाथ के पेड़ तुमने देखे हैं? जब तक वे पौधे रहते हैं तब तक चारों ओर से उन्हें घेर रखना पड़ता है। नहीं तो बकरे और चौपाये उन्हें चर जाते हैं। जब पेड़ मोटे हो जाते हैं तब उन्हें घेरने की जरूरत नहीं रहती। तब हाथी बाँध देने पर भी पेड़ नहीं टूट सकता। तैयार पेड़ अगर बना ले सको तो फिर क्या चिन्ता है – क्या भय है? विवेक लाभ करने की चेष्टा पहले करो। तेल लगाकर कटहल काटो, उससे दूध नहीं चिपक सकता।
पड़ोसी – विवेक किसे कहते हैं?
श्रीरामकृष्ण – ईश्वर सत् है और सब असत् – इस विचार का नाम विवेक है। सत् का अर्थ नित्य, और असत् का अनित्य है। जिसे विवेक हो गया है वह जानता है, ईश्वर ही वस्तु हैं, और सब अवस्तु है। विवेक के उदय होने पर ईश्वर को जानने की इच्छा होती है। असत् को प्यार करने पर – जैसे देहसुख, लोकसम्मान, धन इन्हें प्यार करने पर – सत्स्वरूप ईश्वर को जानने की इच्छा नहीं होती। सत्-असत् विचार के आने पर ईश्वर की ढूँढ़-तलाश की ओर मन जाता है।
“सुनो यह एक गाना सुनो। –
(भावार्थ) – ‘“मन आ घूमने चलें। काली-कल्पतरु के नीचे, ऐ मन, चारों फल तुझे पड़े हुए मिलेंगे। प्रवृत्ति और निवृत्ति तेरी स्त्रियाँ हैं; उनमें से निवृत्ति को अपने साथ लेना। उसके आत्मज विवेक से तत्त्व की बातें पूछ लेना। शुचि-अशुचि को लेकर दिव्य घर में तू कब सोयेगा? उन दोनों सौतों में जब प्रीति होगी, तभी तू श्यामा माँ को पाएगा। तेरे पिता माता ये जो अहंकार और अविद्या हैं, इन्हें दूर कर देना। अगर कभी मोहगर्त में तू खिंचकर गिर जाय तो धैर्य का खूँटा पकड़े रहना। धर्माधर्मरूपी दोनों बकरों को एक तुच्छ खूँटे में बाँध रखना। अगर ये निषेध न मानें तो ज्ञान-खड्ग लेकर इनकी बलि दे देना। पहली पत्नी की सन्तान को दूर से समझा देना। अगर यह तेरे प्रबोध-वाक्यों पर
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२८ नवम्बर, १८८३ परिच्छेद ५९ ३५७
ध्यान न दे तो उसे ज्ञान-सिन्धु में डुबा देना। 'प्रसाद' कहता है, इस तरह का जब तू बन जाएगा, तभी तू काल के पास उत्तर दे सकेगा और ऐ प्यारे, तभी तू सच्चा मन बन सकेगा।'
“मन में निवृत्ति के आने पर विवेक होता है। विवेक के होने पर ही तत्त्व की बात हृदय में पैदा होती है। तभी कालीकल्पतरु के नीचे घूमने के लिए मन जाना चाहता है। उस पेड़ के नीचे जाने पर, ईश्वर के पास जाने पर, चारों फल – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – पड़े हुए मिलेंगे, अनायास मिल जाएँगे। उन्हें पा जाने पर, धर्म, अर्थ, काम जो कुछ संसारियों को चाहिए, वह भी मिलता है – अगर कोई चाहे।
पड़ोसी – तो फिर संसार को माया क्यों कहते हैं?
विशिष्टाद्वैतवाद और श्रीरामकृष्ण।
श्रीरामकृष्ण – जब तक ईश्वर नहीं मिलते तब तक 'नेति' 'नेति' करके त्याग करना पड़ता है। उन्हें जिन लोगों ने पा लिया है, वे जानते हैं कि वे ही सब कुछ हुए हैं। तब बोध हो जाता है – ईश्वर ही माया और जीव-जगत् हैं। जीव-जगत् भी वही हैं। अगर किसी बेल का खोपड़ा, गूदा और बीज अलग कर दिए जाए, और कोई कहे, देखो तो जरा बेल तौल में कितना था, तो क्या तुम खोपड़ा और बीज अलग करके सिर्फ गूदा तौल पर रखोगे या तौलते समय खोपड़ा और बीज भी साथ ले लोगे? एक साथ लेने पर ही तुम कह सकोगे, बेल तौल में कितना था। खोपड़ा मानो संसार है, और बीज मानो जीव। विचार के समय तुमने जीव और संसार को अनात्मा कहा था, अवस्तु कहा था। विचार करते समय गूदा ही सार, तथा खोपड़ा और बीज असार जान पड़े थे। विचार हो जाने पर, सब मिलकर एक जान पड़ता है। और यह प्रतीत होता है कि जिस सत्ता का गूदा है, उसी से बेल का खोपड़ा और बीज भी तैयार हुआ है। बेल को समझने चलो तो सब कुछ समझ में आ जाता है।
“अनुलोम और विलोम। मट्ठे ही का मक्खन है और मक्खन ही का मट्ठा। अगर मट्ठा तैयार हो गया हो तो मक्खन भी हो गया है। यदि मक्खन हो गया हो तो मट्ठा भी हो गया है। आत्मा अगर रहे तो अनात्मा भी है।
“जिनकी नित्यता है, लीला भी उन्हीं की है। जिनकी लीला है, उन्हीं की नित्यता भी है। जो ईश्वर के रूप से प्रकट होते हैं, वही जीव-जगत् भी हुए हैं। जिसने जान लिया है, वह देखता है कि वही सब कुछ हुए हैं – बाप, माँ, बच्चा, पड़ोसी, जीव-जन्तु, भला-बुरा, शुद्ध-अशुद्ध सब कुछ।”
पापबोध
पड़ोसी – तो पाप-पुण्य नहीं है?