श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २८ नवम्बर, १८८३ | परिच्छेद ५९ | ३५३ |
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जब वह धातु हटा ली जाती है, तब वे अपनी सच्ची अवस्था को प्राप्त होते हैं - तब उनकी साँस फिर चलने लगती है।'
भक्तगण कितनी ही बातों का विचार कर रहे हैं 'क्या संसार छोड़ देना होगा? पढ़ाई-लिखाई करने की जब अब क्या आवश्यकता है? यदि विवाह ही न किया जाय तो फिर नौकरी क्यों करनी पड़ेगी? क्या माता-पिता को छोड़ देना होगा? मैंने तो विवाह कर लिया है, मेरे सन्तान भी हो चुकी है; मुझे तो परिवार का पालन-पोषण करना होगा; मेरा क्या हाल होगा? मेरी भी इच्छा होती है कि मैं दिनरात ईश्वर के प्रेम में मग्न रहूँ! श्रीरामकृष्ण को देख मुझे लगता है कि मैं क्या कर रहा हूँ! ये तो दिनरात तेल की धार के सदृश निरन्तर ईश्वरचिन्तन कर रहे हैं, और मैं दिनरात विषयचिन्ता करता हुआ घूम रहा हूँ। एकमात्र इनके दर्शन ही मेघ से घिरे हुए आकाश में बीच बीच में चमक जानेवाली विद्युत्-ज्योति के समान हैं। अब इस जीवन समस्या को कैसे सुलझाया जाय?
'इन्होंने तो स्वयं कर दिखाया! फिर अब भी सन्देह क्यों?
'क्या संसार सचमुच बालू की भीत की तरह क्षणभंगुर है? मैं इसे छोड़ क्यों नहीं पा रहा हूँ? शायद मुझमे शक्ति कम है। यदि ईश्वर पर वैसा तीव्र प्रेम हो जाय तो फिर कोई हिसाब नहीं रह जाता। जब गंगा में बाढ़ आकर पानी वेग से बहने लगता है तब कौन रोक सकता है? जिस प्रेम का उदय होने के कारण श्रीगौरांग कौपीन धारण कर संन्यासी बन गये, जिस प्रेम के कारण ईसा मसीह अन्य सब चिन्ताएँ भूलकर वनवासी हुए शरीर छोड़ दिया, जिस प्रेम के कारण राजवैभव त्यागकर बुद्धदेव वैरागी बने उस प्रेम का एक बिन्दु भी यदि प्राप्त हो जाय तो यह अनित्य संसार कहाँ पड़ा रह जाय!
'अच्छा, जो दुर्बल हैं, जिनमें प्रेम उदित नहीं हुआ, जो संसारी जीव हैं, जिनके पैर माया की जंजीर से बँधे हुए हैं, उनका क्या उपाय हो? जो हो, मैं इन प्रेममय वैरागी महापुरुष का संग न छोड़ूँगा। देखूँ, ये क्या कहते हैं!'
भक्तगण इसी प्रकार की कल्पनाएँ कर रहे थे। श्रीरामकृष्ण जयगोपाल के बैठकखाने में भक्तों के साथ बैठे हुए हैं, सामने जयगोपाल उनके आत्मीय तथा पड़ोसी आदि हैं। एक पड़ोसी वार्तालाप करने के लिए पहले ही से तैयार थे। वही अग्रणी होकर कुछ पूछने लगे। जयगोपाल के भाई वैकुण्ठ भी हैं।
गृहस्थाश्रम तथा श्रीरामकृष्ण
वैकुण्ठ – हम संसारी मनुष्य हैं, हमारे लिए कुछ कहिए।
श्रीरामकृष्ण – ईश्वर को जानकर, एक हाथ उनके पैरों पर रखकर दूसरे हाथ से संसार का काम करो।