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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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पृष्ठ 377
३५४श्रीरामकृष्णवचनामृत२८ नवम्बर, १८८३

वैकुण्ठ – महाराज, संसार क्या मिथ्या है?

श्रीरामकृष्ण – जब तक उनका ज्ञान नहीं होता, तब तक मिथ्या है। तब मनुष्य उन्हें भूलकर 'मेरा मेरा' कहता रहता है – माया में फँसकर, कामिनी-कांचन में मुग्ध होकर और भी डूब जाता है। माया में मनुष्य ऐसा अज्ञानी हो जाता है कि भागने का रास्ता रहने पर भी नहीं भाग सकता। एक गाना है –

(भावार्थ) – “ 'महामाया की कैसी विचित्र माया है! कैसे भ्रम में उन्होंने डाल रखा है! उनकी माया में ब्रह्मा और विष्णु भी अचेत हो रहे हैं, तो जीव बेचारा भला क्या जान सकता है? मछली जाल में पकड़ी जाती है, परन्तु आने-जाने की राह रहने पर भी वह उससे भाग नहीं सकती। रेशम के कीड़े रेशम की गोटियाँ बनाते हैं; वे चाहें तो उसे काटकर उससे निकल सकते हैं, परन्तु महामाया के प्रभाव से वे इस तरह बद्ध हैं कि अपनी बनायी हुई गोटियों में ही अपनी जान दे देते हैं।'

“तुम लोग तो स्वयं भी देख रहे हो कि संसार अनित्य है। देखो न, कितने आदमी आए और गए। कितने पैदा हुए और कितनों ने देह छोड़ी। संसार अभी अभी तो है और थोड़ी ही देर में नहीं! अनित्य! जिन्हें लेकर इतना 'मेरा' 'मेरा' कर रहे हो, आँखें बन्द करते ही कहीं कुछ नहीं है। है कोई नहीं, फिर भी नाती की बाँह पकड़े बैठे हैं – उसके लिए वाराणसी नहीं जा सकते! कहते हैं – मेरे लाल का क्या होगा? आने जाने की राह है, फिर भी मछली भाग नहीं सकती। रेशम के कीड़े अपनी बनायी गोटियों में ही अपनी जान दे देते हैं। इस प्रकार का संसार मिथ्या है, अनित्य है।”

पड़ोसी – महाराज, एक हाथ ईश्वर में और दूसरा संसार में क्यों रखें? अगर संसार अनित्य है, तो एक हाथ भी संसार में क्यों रखें?

श्रीरामकृष्ण – उन्हें जानकर संसार में रहने से संसार अनित्य नहीं रह जाता। एक गाना सुनो।

(गीत का मर्म) – “ऐ मन, तू खेती का काम नहीं जानता। ऐसी मनुष्यदेहरूपी जमीन पड़ी ही रह गयी! अगर तू काश्तकारी करता तो इसमें सोना फल सकता था। पहले तू उसमें कालीनाम का घेरा लगा दे, इस तरह फसल नष्ट न हो सकेगी। वह मुक्तकेशी का बड़ा ही दृढ़ घेरा है, उसके पास यम की भी हिम्मत नहीं जो कदम बढ़ा सके। आज या शताब्दी भर के बाद यह जमीन बेदखल हो जाएगी, क्या यह तू नहीं जानता? अतएव अब तू लगन लगाकर उसे जोतकर फसल क्यों नहीं तैयार कर लेता? गुरुप्रदत्त बीज डालकर भक्तिवारि से खेत सींचता जा। अगर तू अकेला यह काम न कर सके तो 'रामप्रसाद' को भी अपने साथ ले ले।”