श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८ नवम्बर, १८८३ | परिच्छेद ५९ | ३५५
गृहस्थाश्रम में ईश्वरलाभ। उपाय
श्रीरामकृष्ण – गाना सुना? 'कालीनाम का घेरा लगा दो, इससे फसल नष्ट न होगी।' ईश्वर की शरण में जाओ, सब कुछ पाओगे। 'वह मुक्तकेशी माँ का बड़ा ही मजबूत घेरा है, उसके अन्दर यमराज पैर नहीं बढ़ा सकते।' बड़ा ही मजबूत घेरा है। उन्हें अगर प्राप्त कर सको तो फिर संसार असार न प्रतीत होगा। जिसने उन्हें जान लिया है, वह देखता है, जीव-जगत् सब वही बने हैं! बच्चों को खिलाओ तो यह जानकर कि गोपाल को खिला रहे हो। पिता और माता को ईश्वर और जगन्माता देखो और उनकी सेवा करो। उन्हें जानकर संसार में रहने से ब्याही हुई स्त्री से फिर सांसारिक सम्बन्ध नहीं रह जाता। दोनों ही भक्त हो जाते हैं, केवल ईश्वरीय बातचीत करते हैं, ईश्वरीय प्रसंग लेकर रहते हैं, तथा भक्तों की सेवा करते हैं। सर्वभूतों में वे हैं, अतएव दोनों उन्हीं की सेवा करते हैं।
पड़ोसी – महाराज, ऐसे स्त्री-पुरुष दीख क्यों नहीं पड़ते?
श्रीरामकृष्ण – दीख पड़ते हैं, परन्तु बहुत कम। विषयी मनुष्य उन्हें पहचान नहीं पाते। परन्तु ऐसा तभी होता है, जब दोनों ही भले हों। जब दोनों ही ईश्वरप्रेम-प्राप्त हों तभी ऐसा हो सकता है। इसके लिए परमात्मा की विशेष कृपा चाहिए। नहीं तो सदा ही अनमेल रहता है। एक को अलग हो जाना पड़ता है। अगर मेल न हुआ तो बड़ा कष्ट होता है। स्त्री दिनरात कोसती रहती है, 'बाबूजी ने क्यों यहाँ मेरा विवाह किया? न मुझे ही कुछ खाने को मिला, न बच्चों को ही; न मुझे ही कुछ पहनने को मिला, न बच्चों को ही मैं कुछ पहना सकी। एक गहना भी तो नहीं है! तुमने मुझे क्या सुख में रखा है! आँखें मूँदकर ईश्वर ईश्वर कर रहे हैं। यह सब पागलपन छोड़ो।'
भक्त – ये सब बाधाएँ तो हैं ही, ऊपर से कभी कभी यह भी होता है कि लड़के कहना ही नहीं मानते। इस पर और भी कितनी ही आपदाएँ हैं। महाराज, तो फिर उपाय क्या है?
श्रीरामकृष्ण – संसार में रहकर साधना करना बड़ा कठिन है। बड़ी बाधाएँ हैं। ये सब तुम्हें बतलाने की जरूरत नहीं है – रोग, शोक, दारिद्र, उस पर पत्नी से अनबन, लड़के आवारा, मूर्ख और गँवार।
“परन्तु उपाय है। कभी कभी एकान्त में जाकर उनसे प्रार्थना करनी पड़ती है, उन्हें पाने के लिए चेष्टा करनी पड़ती है।”
पड़ोसी – घर से निकल जाना होगा?
श्रीरामकृष्ण – एकदम नहीं। जब अवकाश हो तब निर्जन में जाकर एक-दो दिन रहो – परन्तु संसार से कोई सम्बन्ध न रहे, किसी विषयी मनुष्य के साथ किसी सांसारिक