श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५६ श्रीरामकृष्णवचनामृत २८ नवम्बर, १८८३
विषय की चर्चा न करनी पड़े। या तो निर्जन में रहो या सत्संग करो।
पड़ोसी – सत्संग के लिए साधु-महात्मा की पहचान कैसे हो?
श्रीरामकृष्ण – जिनका मन, जिनका जीवन, जिनकी अन्तरात्मा ईश्वर में लीन हो गयी है, वही महात्मा हैं। जिन्होंने कामिनी और कांचन का त्याग कर दिया है, वही महात्मा हैं। जो महात्मा हैं, वे स्त्रियों को संसार की दृष्टि से नहीं देखते। यदि स्त्रियों के पास वे कभी जाते हैं तो उन्हें मातृवत् देखते हैं और उनकी पूजा करते हैं। साधु-महात्मा सदा ईश्वर का ही चिन्तन करते हैं। ईश्वरीय प्रसंग के सिवाय और कोई बात उनके मुँह से नहीं निकलती। और सर्वभूतों में ईश्वर का ही वास है यह जानकर वे सब की सेवा करते हैं। संक्षेप में यही साधुओं के लक्षण हैं।
पड़ोसी – क्या बराबर एकान्त में रहना होगा?
श्रीरामकृष्ण – फुटपाथ के पेड़ तुमने देखे हैं? जब तक वे पौधे रहते हैं तब तक चारों ओर से उन्हें घेर रखना पड़ता है। नहीं तो बकरे और चौपाये उन्हें चर जाते हैं। जब पेड़ मोटे हो जाते हैं तब उन्हें घेरने की जरूरत नहीं रहती। तब हाथी बाँध देने पर भी पेड़ नहीं टूट सकता। तैयार पेड़ अगर बना ले सको तो फिर क्या चिन्ता है – क्या भय है? विवेक लाभ करने की चेष्टा पहले करो। तेल लगाकर कटहल काटो, उससे दूध नहीं चिपक सकता।
पड़ोसी – विवेक किसे कहते हैं?
श्रीरामकृष्ण – ईश्वर सत् है और सब असत् – इस विचार का नाम विवेक है। सत् का अर्थ नित्य, और असत् का अनित्य है। जिसे विवेक हो गया है वह जानता है, ईश्वर ही वस्तु हैं, और सब अवस्तु है। विवेक के उदय होने पर ईश्वर को जानने की इच्छा होती है। असत् को प्यार करने पर – जैसे देहसुख, लोकसम्मान, धन इन्हें प्यार करने पर – सत्स्वरूप ईश्वर को जानने की इच्छा नहीं होती। सत्-असत् विचार के आने पर ईश्वर की ढूँढ़-तलाश की ओर मन जाता है।
“सुनो यह एक गाना सुनो। –
(भावार्थ) – ‘“मन आ घूमने चलें। काली-कल्पतरु के नीचे, ऐ मन, चारों फल तुझे पड़े हुए मिलेंगे। प्रवृत्ति और निवृत्ति तेरी स्त्रियाँ हैं; उनमें से निवृत्ति को अपने साथ लेना। उसके आत्मज विवेक से तत्त्व की बातें पूछ लेना। शुचि-अशुचि को लेकर दिव्य घर में तू कब सोयेगा? उन दोनों सौतों में जब प्रीति होगी, तभी तू श्यामा माँ को पाएगा। तेरे पिता माता ये जो अहंकार और अविद्या हैं, इन्हें दूर कर देना। अगर कभी मोहगर्त में तू खिंचकर गिर जाय तो धैर्य का खूँटा पकड़े रहना। धर्माधर्मरूपी दोनों बकरों को एक तुच्छ खूँटे में बाँध रखना। अगर ये निषेध न मानें तो ज्ञान-खड्ग लेकर इनकी बलि दे देना। पहली पत्नी की सन्तान को दूर से समझा देना। अगर यह तेरे प्रबोध-वाक्यों पर