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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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२८ नवम्बर, १८८३ परिच्छेद ५९ ३५७

ध्यान न दे तो उसे ज्ञान-सिन्धु में डुबा देना। 'प्रसाद' कहता है, इस तरह का जब तू बन जाएगा, तभी तू काल के पास उत्तर दे सकेगा और ऐ प्यारे, तभी तू सच्चा मन बन सकेगा।'

“मन में निवृत्ति के आने पर विवेक होता है। विवेक के होने पर ही तत्त्व की बात हृदय में पैदा होती है। तभी कालीकल्पतरु के नीचे घूमने के लिए मन जाना चाहता है। उस पेड़ के नीचे जाने पर, ईश्वर के पास जाने पर, चारों फल – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – पड़े हुए मिलेंगे, अनायास मिल जाएँगे। उन्हें पा जाने पर, धर्म, अर्थ, काम जो कुछ संसारियों को चाहिए, वह भी मिलता है – अगर कोई चाहे।

पड़ोसी – तो फिर संसार को माया क्यों कहते हैं?

विशिष्टाद्वैतवाद और श्रीरामकृष्ण।

श्रीरामकृष्ण – जब तक ईश्वर नहीं मिलते तब तक 'नेति' 'नेति' करके त्याग करना पड़ता है। उन्हें जिन लोगों ने पा लिया है, वे जानते हैं कि वे ही सब कुछ हुए हैं। तब बोध हो जाता है – ईश्वर ही माया और जीव-जगत् हैं। जीव-जगत् भी वही हैं। अगर किसी बेल का खोपड़ा, गूदा और बीज अलग कर दिए जाए, और कोई कहे, देखो तो जरा बेल तौल में कितना था, तो क्या तुम खोपड़ा और बीज अलग करके सिर्फ गूदा तौल पर रखोगे या तौलते समय खोपड़ा और बीज भी साथ ले लोगे? एक साथ लेने पर ही तुम कह सकोगे, बेल तौल में कितना था। खोपड़ा मानो संसार है, और बीज मानो जीव। विचार के समय तुमने जीव और संसार को अनात्मा कहा था, अवस्तु कहा था। विचार करते समय गूदा ही सार, तथा खोपड़ा और बीज असार जान पड़े थे। विचार हो जाने पर, सब मिलकर एक जान पड़ता है। और यह प्रतीत होता है कि जिस सत्ता का गूदा है, उसी से बेल का खोपड़ा और बीज भी तैयार हुआ है। बेल को समझने चलो तो सब कुछ समझ में आ जाता है।

“अनुलोम और विलोम। मट्ठे ही का मक्खन है और मक्खन ही का मट्ठा। अगर मट्ठा तैयार हो गया हो तो मक्खन भी हो गया है। यदि मक्खन हो गया हो तो मट्ठा भी हो गया है। आत्मा अगर रहे तो अनात्मा भी है।

“जिनकी नित्यता है, लीला भी उन्हीं की है। जिनकी लीला है, उन्हीं की नित्यता भी है। जो ईश्वर के रूप से प्रकट होते हैं, वही जीव-जगत् भी हुए हैं। जिसने जान लिया है, वह देखता है कि वही सब कुछ हुए हैं – बाप, माँ, बच्चा, पड़ोसी, जीव-जन्तु, भला-बुरा, शुद्ध-अशुद्ध सब कुछ।”

पापबोध

पड़ोसी – तो पाप-पुण्य नहीं है?