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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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३५८ श्रीरामकृष्णवचनामृत – १ २८ नवम्बर, १८८३

श्रीरामकृष्ण – है भी और नहीं भी है। वे यदि अहंतत्व रख देते हैं तो भेदबुद्धि भी रख देते हैं, पाप-पुण्य का ज्ञान भी रख देते हैं। वे एक-दो मनुष्यों का अहंकार बिलकुल पोंछ डालते हैं – वे पाप-पुण्य, भले-बुरे के परे चले जाते हैं। ईश्वरदर्शन जब तक नहीं होता तब तक भेदबुद्धि और भले-बुरे का ज्ञान रहता ही है, तुम मुँह से कह सकते हो, 'हमारे लिए पाप और पुण्य बराबर हैं, वे जैसा कराते हैं वैसा ही करता हूँ', परन्तु हृदय से यही जानते हो कि यह सब एक कहावत मात्र है; बुरा काम करने से छाती धड़कने लगेगी। ईश्वरदर्शन के बाद भी अगर उनकी इच्छा होती है तो वे 'दास मैं' रख देते हैं। उस अवस्था में भक्त कहता हैं, मैं दास हूँ, तुम प्रभु हो। ईश्वरीय प्रसंग, ईश्वरीय कर्म, ये सब उस भक्त को रुचिकर होते हैं; ईश्वर-विमुख मनुष्य उसे अच्छा नहीं लगता; उसको ईश्वरीय कर्मों के सिवा दूसरे कार्य नहीं सुहाते। इतने ही से बात सिद्ध हो जाती है कि ऐसे भक्तों में भी वे भेदबुद्धि रख छोड़ते हैं।

पड़ोसी – महाराज, आप कहते हैं ईश्वर को जानकर संसार करो। क्या उन्हें कोई जान सकता है?

श्रीरामकृष्ण – उन्हें इन्द्रियों द्वारा अथवा इस मन के द्वारा कोई जान नहीं सकता। जिस मन में विषय-वासना नहीं उस शुद्ध मन के द्वारा ही मनुष्य उन्हें जान सकता है।

पड़ोसी – ईश्वर को कौन जान सकता है?

श्रीरामकृष्ण – ठीक-ठीक उन्हें कौन जान सकता है? हमारे लिए जितना जानने की जरूरत है, उतना होने ही से हो गया। हमें कुएँभर पानी की क्या जरूरत है? हमारे लिए तो लोटाभर पानी पर्याप्त है। एक चींटी चीनी के पहाड़ के पास गयी थी। सब पहाड़ लेकर भला क्या करेगी? उसके छकने के लिए तो दो-एक दाने ही बहुत हैं।

पड़ोसी – हमें जैसा विकार है, इससे लोटाभर पानी से क्या होता है? इच्छा होती है, ईश्वर को सोलहों आने समझ लें।

संसारविकार की दवा – 'मामेकं शरणं व्रज'

श्रीरामकृष्ण – यह ठीक है; परन्तु विकार की दवा भी तो है।

पड़ोसी – महाराज, वह कौनसी दवा है?

श्रीरामकृष्ण – साधुओं का संग, उनका नामगुण-कीर्तन, उनसे सर्वदा प्रार्थना करना। मैंने कहा था – माँ, मैं ज्ञान नहीं चाहता; यह लो अपना ज्ञान और यह लो अपना अज्ञान; माँ, मुझे अपने चरणकमलों में केवल शुद्धा भक्ति दो। मैं और कुछ नहीं चाहता।

"जैसा रोग होता है, उसकी दवा भी वैसी ही होती है। गीता में उन्होंने कहा है, 'हे अर्जुन, तुम मेरी शरण लो, तुम्हें मैं सब तरह के पापों से मुक्त कर दूँगा।' उनकी शरण में जाओ; वे सुबुद्धि देंगे, वे सब भार ले लेंगे। तब सब तरह के विकार दूर हट जाएंगे।

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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