श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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२८ नवम्बर, १८८३ परिच्छेद ५९ ३५९
इस बुद्धि से क्या कोई उन्हें समझ सकता है? सेर भर के लोटे में क्या कभी चार सेर दूध रह सकता है? और बिना उनके समझाए क्या उन्हें कोई समझ सकता है? इसीलिए कहता हूँ उनकी शरण में जाओ - उनकी जो इच्छा हो, वे करें। वे इच्छामय हैं। मनुष्य की क्या शक्ति है?"
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