भारतकोश
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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परिच्छेद ६०

दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ

(१)

भक्तियोग, समाधितत्त्व, और महाप्रभु की अवस्थाएँ।
हठयोग और राजयोग

९ दिसम्बर १८८३, रविवार अगहन शुक्ला दशमी, दिन के दो बजे होंगे। श्रीरामकृष्ण अपने कमरे के उसी छोटे तख्त पर बैठे हुए भक्तों के साथ भगवच्चर्चा कर रहे हैं। अधर, मनोमोहन, ठनठनिया के शिवचन्द्र, राखाल, मास्टर, हरीश आदि कितने ही भक्त बैठे हुए हैं। हाजरा भी उस समय वहीं रहते थे। श्रीरामकृष्ण महाप्रभु की अवस्था का वर्णन कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण (भक्तों के प्रति) – चैतन्यदेव को तीन अवस्थाएँ होती थीं। बाह्यदशा, – तब, स्थूल और सूक्ष्म में उनका मन रहता था। अर्धबाह्यदशा, – तब कारण-शरीर में, कारणानन्द में चला जाता था। अन्तर्दशा, – तब महाकारण में मन लीन हो जाता था।

“वेदान्त के पंचकोष के साथ इसका यथार्थ मेल है। स्थूल-शरीर अर्थात् अन्नमय और प्राणमय कोष। सूक्ष्म-शरीर अर्थात् मनोमय और विज्ञानमय कोष। कारण – शरीर अर्थात् आनन्दमय कोष। महाकारण पंचकोषों से परे है। महाकारण में जब मन लीन होता था तब वे समाधि-मग्न हो जाते थे। इसी का नाम निर्विकल्प अथवा जड़-समाधि है।

“चैतन्यदेव को जब बाह्यदशा होती थी तब वे नामसंकीर्तन करते थे। अर्धबाह्यदशा में भक्तों के साथ नृत्य करते थे। अन्तर्दशा में समाधिस्थ हो जाते थे।

मास्टर (स्वगत) – क्या श्रीरामकृष्ण इस प्रकार अपनी स्वयं की अवस्थाओं की ओर ही संकेत कर रहे हैं? चैतन्यदेव की भी ऐसी ही अवस्थाएँ होती थीं!

श्रीरामकृष्ण – श्रीचैतन्य भक्ति के अवतार थे। वे जीवों को भक्ति की शिक्षा देने के लिए आए थे। उन पर भक्ति हुई तो सब कुछ हो गया। फिर हठयोग की कोई आवश्यकता नहीं।

एक भक्त – जी, हठयोग कैसा है?

श्रीरामकृष्ण – हठयोग में शरीर की ओर मन ज्यादा देना पड़ता है। अन्तर-प्रक्षालन