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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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३५२ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २८ नवम्बर, १८८३

“दयानन्द बंगला भाषा को कहते थे – 'गौड़ाण्ड भाषा।'

“ये (केशव) शायद होम और देवता नहीं मानते थे। इसीलिए वे कहते थे, 'ईश्वर ने इतनी चीजें तो तैयार कीं, और देवता नहीं तैयार कर सके?'”

श्रीरामकृष्ण केशव के शिष्यों से केशव की प्रशंसा कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – केशव ही हीनबुद्धि नहीं है। इन्होंने बहुतों से कहा है, 'जो कुछ सन्देह हो, वहाँ * जाकर पूछ लो।' मेरा भी यही स्वभाव है। मैं कहता हूँ, ये कोटि गुण और बढ़ें। मैं मान लेकर क्या करूँगा?

“ये बड़े आदमी हैं। जो लोग धन चाहते हैं, वे भी इन्हें मानते हैं ओर साधु भी मानते हैं।”

श्रीरामकृष्ण कुछ मिष्टान्न ग्रहण करके अब गाड़ी पर चढ़नेवाले हैं। ब्राह्मभक्त उन्हें चढ़ाने के लिए जा रहे हैं।

जीने से उतरते समय श्रीरामकृष्ण ने देखा, नीचे उजाला नहीं है। तब अमृत आदि भक्तों से उन्होंने कहा, “इन सब स्थानों में अच्छा प्रकाश चाहिए, नहीं तो गरीबी आ घेरती है। ऐसा अब फिर कभी न हो।”

श्रीरामकृष्ण एक-दो भक्तों को साथ लेकर उसी रात को कालीमन्दिर की ओर चल पड़े।

(७)

जयगोपाल सेन के घर में शुभागमन।

केशव को देखकर दक्षिणेश्वर लौटते समय रात में सात बजे के बाद श्रीरामकृष्ण माथाघासगली में श्रीजयगोपाल के घर पर आए।

भक्तगण न जाने क्या विचार कर रहे हैं। वे सोच रहे हैं, 'श्रीरामकृष्ण दिनरात ईश्वरप्रेम मे मस्त रहते हैं। विवाह तो किया है, परन्तु धर्मपत्नी से सांसारिक कोई सम्बन्ध नहीं रखते; बल्कि उन पर भक्ति रखते हैं, उनकी पूजा करते हैं, उनके साथ केवल ईश्वरीय प्रसंग किया करते हैं; सदा भगवद्गीत गाते, परमात्मा की पूजा करते तथा ध्यान करते हैं; किसी से कोई मायिक सम्बन्ध रखते ही नहीं। उनके लिए ईश्वर ही यथार्थ वस्तु हैं और शेष सब असार पदार्थ। रुपया, धातुद्रव्य, लोटा, कटोरा यह कुछ छू भी नहीं सकते। स्त्रियों को भी नहीं छू सकते। अगर कभी छू लेते हैं तो जहाँ छू जाता है वहाँ सींगी मछली के काँटे के चुभ जाने के समान पीड़ा होने लगती है। रुपया या सोना अगर हाथ पर रख दिया जाता है तो कलाई मुरक जाती है, अवस्था विकृत हो जाती है, साँस रुक जाती है।


* श्रीरामकृष्ण के पास