श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८ नवम्बर, १८८३ | परिच्छेद ५९ | ३५१
"ईश्वर दो बार हँसते हैं। एक बार उस समय हँसते हैं जब दो भाई जमीन बाँटते हैं, और रस्सी से नापकर कहते हैं, 'इस ओर की मेरी है और उस ओर की तुम्हारी।' ईश्वर यह सोचकर हँसते हैं कि संसार तो है मेरा और ये लोग थोड़ीसी मिट्टी लेकर इस ओर की मेरी, उस ओर की तुम्हारी कर रहे हैं।
"फिर ईश्वर एक बार और हँसते हैं। बच्चे की बीमारी बढ़ी हुई है। उसकी माँ रो रही है। वैद्य आकर कह रहा है, 'डरने की क्या बात है, माँ! मैं अच्छा कर दूँगा।' वैद्य नहीं जानता कि ईश्वर यदि मारना चाहें तो किसकी शक्ति है जो अच्छा कर सके?" (सब सन्न हो रहे)
ठीक इसी समय केशव बड़ी देर तक खाँसते रहे। वह खाँसी रुकती ही न थी। खाँसने की आवाज से सब को कष्ट हो रहा है। बड़ी देर तक बहुत कुछ कष्ट झेलते रहने के बाद खाँसी कुछ बन्द हुई। केशव से अब और नहीं रहा जाता। श्रीरामकृष्ण को उन्होंने भूमिष्ठ हो प्रणाम किया। प्रणाम करके बड़े कष्ट से दीवार टेक-टेककर उसी द्वार से अपने कमरे में फिर चले गये।
(६)
ब्राह्मसमाज और वेदोल्लिखित देवता। गुरुपन नीच बुद्धि
श्रीरामकृष्ण कुछ मिष्ठान्न ग्रहण करके जाएंगे। केशव के बड़े लड़के उनके पास आकर बैठे।
अमृत ने कहा, "यह केशव का बड़ा लड़का है। आप आशीर्वाद दीजिये। यह क्या! सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दीजिए।"
श्रीरामकृष्ण ने कहा, "मुझे आशीर्वाद न देना चाहिए।" यह कहकर मुसकराते हुए बच्चे की देह पर हाथ फेरने लगे।
अमृत (हँसते हुए) - अच्छा, तो देह पर हाथ फेरिये। (सब हँसते हैं।)
श्रीरामकृष्ण अमृत आदि ब्राह्मभक्तों से केशव की बातचीत करने लगे।
श्रीरामकृष्ण (अमृत आदि से) - बीमारी अच्छी हो - ये सब बातें मैं नहीं कह सकता। यह शक्ति मैं माँ से चाहता भी नहीं। मैं माँ ये यही कहता हूँ, माँ, मुझे शुद्ध भक्ति दो।
'ये (केशव) क्या कुछ कम आदमी हैं? जो लोग रुपये चाहते हैं, वे भी इन्हें मानते हैं और साधु भी। दयानन्द को देखा, वे बगीचे में ठहरे हुए थे। 'केशव सेन - केशव सेन' कहकर छटपटा रहे थे कि कब केशव आए। उस दिन शायद केशव के वहाँ आने की बात थी।