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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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पृष्ठ 373

३५० श्रीरामकृष्णवचनामृत २८ नवम्बर, १८८३

(केशव से) – 'उसकी इच्छा। माँ, सब तुम्हारी ही इच्छा है।'

“‘ऐ तारा, तुम इच्छामयी हो, सब तुम्हारी ही इच्छा है। माँ, कर्म तुम्हारे हैं, करती भी तुम्हीं हो, परन्तु मनुष्य कहते हैं, मैं करता हूँ।’

“सर्दी लगाने के उद्देश्य से माली बसरा-गुलाब को छाँटकर उसकी जड़ खोल देता है। सर्दी लगने से पेड़ अच्छी तरह उगता है। शायद इसीलिए वह तुम्हारी जड़ खोल रही है। (श्रीरामकृष्ण और केशव हँसते हैं।) जान पड़ता है, अगली बार एक बड़ी घटना होनेवाली है।

“जब कभी तुम बीमार पड़ जाते हो तब मुझे बड़ी घबराहट होती है। पहली बार भी जब तुम बीमार पड़े थे, तब रात के पिछले पहर मैं रोया करता था। कहता था, माँ, केशव को अगर कुछ हो गया तो फिर किससे बातचीत करूँगा! तब कलकत्ता आने पर मैंने सिद्धेश्वरी को नारियल और चीनी चढ़ायी थी। माँ के पास मनौती मानी थी जिससे बीमारी अच्छी हो जाए।”

केशव पर श्रीरामकृष्ण के इस अकृत्रिम स्नेह और उनके लिए उनकी व्याकुलता की बात को लोग निर्वाक् होकर सुन रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – परन्तु इस बार उतना नहीं हुआ। मैं सच कहूँगा। हाँ, दो-तीन दिन कुछ थोड़ा कलेजा मसोसा करता था।

केशव जिस पूर्ववाले द्वार से बैठकखाने में आए थे, उसी द्वार के पास केशव की पूजनीय माता खड़ी हैं। वहीं से उमानाथ जरा ऊँचे स्वर में श्रीरामकृष्ण से कह रहे हैं, “माँ आपको प्रणाम कर रही हैं।”

श्रीरामकृष्ण हँसने लगे। उमानाथ कहते हैं, “माँ कह रही हैं, ऐसा आशीर्वाद दीजिए जिससे केशव की बीमारी अच्छी हो जाय।” श्रीरामकृष्ण ने कहा, “माँ आनन्दमयी को पुकारो, दुःख वही दूर कर सकती हैं।” श्रीरामकृष्ण केशव से कहने लगे –

“घर के भीतर इतना न रहा करो। पुत्र-कन्याओं के बीच में रहने से और डूबोगे, ईश्वरीय चर्चा होने पर और अच्छे रहोगे।”

गम्भीर भाव से ये बातें कहकर श्रीरामकृष्ण फिर बालक की तरह हँसने लगे। केशव से कह रहे हैं, “देखूँ, तुम्हारा हाथ देखूँ।” बालक की तरह हाथ लेकर मानो तौल रहे हैं। अन्त में कहने लगे, “नहीं, तुम्हारा हाथ हलका है, खलों का हाथ भारी होता है।” (लोग हँसते हैं।)

उमानाथ दरवाजे से फिर कहने लगे, “माँ कह रही हैं – केशव को आशीर्वाद दीजिए।”

श्रीरामकृष्ण (गम्भीर स्वरों में) – मेरी क्या शक्ति है! वे ही आशीर्वाद देंगी। 'माँ, अपना काम तुम करती हो, लोग कहते हैं, मैं कर रहा हूँ।'