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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

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पृष्ठ 370
२८ नवम्बर, १८८३परिच्छेद ५९३४७

“हाजरा का दोष नहीं है। साधक अवस्था में सम्पूर्ण मन ‘नेति’ ‘नेति’ करके उन्हें दे देना पड़ता है। सिद्ध-अवस्था की बात दूसरी है। उन्हें प्राप्त कर लेने पर अनुलोम और विलोम एक से प्रतीत होते हैं। मट्ठा अलग करने पर जब मक्खन मिलता है तब जान पड़ता है कि मट्ठे का ही मक्खन है और मक्खन का ही मट्ठा। तब ठीक ठीक समझ में आता है कि सब कुछ वे ही हुए हैं। कहीं उनका अधिक प्रकाश है, कहीं कम।

“भावसमुद्र उमड़ने पर स्थल में भी एक बाँस पानी हो जाता है। पहले नदी से होकर समुद्र में जाते समय बहुत-कुछ चक्कर लगाकर जाना पड़ता है, ओर जब बाढ़ आती है तब सूखी जमीन पर भी एक बाँस पानी हो जाता है। तब नाव सीधे चलाकर लोग जगह पर पहुँच जाते हैं। फिर चक्कर मारकर नहीं जाना पड़ता। इसी तरह धान कट जाने पर मेंड़ से चक्कर काटकर नहीं आना पड़ता। सीधे एक रास्ते से निकल जाओ।

“उन्हें प्राप्त कर लेने पर फिर सभी वस्तुओं में उनके दर्शन होते हैं। मनुष्य के भीतर उनका अधिक प्रकाश है। मनुष्यों में सतोगुणी भक्तों में उनका और अधिक प्रकाश रहता है – जिनमें कामिनी और कांचन के भोग की बिलकुल ही इच्छा नहीं रहती। (सब स्तब्ध हैं।) समाधिस्थ मनुष्य जब उतरता है तब भला वह कहाँ ठहरे? – किस पर अपना मन रमाये? कामिनी और कांचन का त्याग करनेवाले सतोगुणी शुद्ध भक्तों की आवश्यकता उन्हें इसीलिए होती है। नहीं तो फिर वे क्या लेकर रहें?

“जो ब्रह्म हैं, वे ही आद्याशक्ति भी हैं। जब वे निष्क्रिय हैं, तब उन्हें ब्रह्म कहते हैं, पुरुष कहते हैं। जब सृष्टि, स्थिति, प्रलय ये सब करते हैं, तब उन्हें शक्ति कहते हैं, प्रकृति कहते हैं। पुरुष और प्रकृति। जो पुरुष हैं, वे ही प्रकृति भी हैं। आनन्दमय और आनन्दमयी।

“जिसे पुरुष-ज्ञान है, उसे स्त्री-ज्ञान भी है। जिसे पिता का बोध है, उसे माता का भी बोध है। (केशव हँसते हैं।)

“जिसे अँधेरे का ज्ञान है, उसे उजाले का भी ज्ञान है। जिसे रात का ज्ञान है, उसे दिन का भी ज्ञान है। जिसे सुख का ज्ञान है, उसे दुःख का भी। यह बात समझे”?

केशव (सहास्य) – जी हाँ, समझा।

श्रीरामकृष्ण – माँ! कौनसी माँ! जगत् की माँ – जिन्होंने जगत् की सृष्टि की; जो उसका पालन कर रही हैं; जो अपनी सन्तानों की सदा रक्षा करती हैं; और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष – जो जो कुछ चाहता है, उसे वही देती हैं। जो उनकी यथार्थ सन्तान है, वह उन्हें छोड़कर नहीं रह सकती। उसकी माता ही सब कुछ जानती हैं। वह तो बस खाता है, खेलता है, और घूमता है। इसके सिवाय वह और कुछ नहीं जानता।

केशव – जी हाँ।

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