श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४८ श्रीरामकृष्णवचनामृत २८ नवम्बर, १८८३
(४)
ब्राह्मसमाज और ईश्वर का ऐश्वर्य-वर्णन।
त्रिगुणातीत भक्त
वार्तालाप करते हुए श्रीरामकृष्ण प्रकृतिस्थ हो गए हैं। केशव के साथ हँसते हुए बातचीत कर रहे हैं। कमरे भर के लोग एकाग्र चित्त से उनकी सब बातें सुनते और उन्हें देखते हैं। सभी निर्वाक् हैं कि 'तुम कैसे हो' आदि व्यावहारिक बातें तो होती ही नहीं, केवल भगवत्-प्रसंग छिड़ा हुआ है।
श्रीरामकृष्ण (केशव से) – ब्राह्मभक्त इतनी महिमा क्यों गाया करते हैं? 'हे ईश्वर, तुमने चन्द्र की सृष्टि की, सूर्य को पैदा किया, नक्षत्र बनाए' – इन सब बातों की क्या आवश्यकता है? बहुतसे लोग बगीचे की ही प्रशंसा करते हैं; पर मालिक से कितने लोग मिलना चाहते हैं? बगीचा बड़ा है या मालिक?
"शराब पी चुकने पर कलाल की दूकान में कितने मन शराब है, इसकी जाँच-पड़ताल से हमारा क्या काम? हमारा तो मतलब एक ही बोतल से निकल जाता है।
"नरेन्द्र को देखकर मैंने कभी नहीं पूछा, तेरे पिता का क्या नाम है? तेरे पिता की कितनी कोठियाँ हैं?
"कारण जानते हो? मनुष्य स्वयं ऐश्वर्य का आदर करता है, इसलिए वह समझता है कि ईश्वर भी उसका आदर करते हैं। सोचता है, उनके ऐश्वर्य की प्रशंसा करने पर वे प्रसन्न होंगे। शम्भु ने कहा था, 'अब तो इस समय यही आशीर्वाद दीजिये जिससे यह ऐश्वर्य उनके पादपद्मों में अर्पित करके मरूँ।' मैंने कहा, 'यह तुम्हारे लिए ही ऐश्वर्य है; उन्हें तुम क्या दे सकते हो! उनके लिए यह सब काठ और मिट्टी के बराबर है।'
"जब विष्णुघर के कुल गहने चुरा लिए गए तब मैं और मथुरबाबू, दोनों श्रीठाकुरजी को देखने के लिए गए। मथुरबाबू ने कहा, 'चलो महाराज, तुममें कोई शक्ति नहीं है। तुम्हारी देह से कुल गहने निकाल लिये गये और तुम कुछ न कर सके!' मैंने उससे कहा, 'यह तुम्हारी कैसी बात है! तुम जिसके सामने गहने गहने चिल्लाते हो, उनके लिए ये सब मिट्टी के ढेले हैं। लक्ष्मी जिनकी शक्ति हैं, क्या वे तुम्हारे चोरी गए इन कुछ रुपयों के लिए परेशान होंगे! ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए।'
"क्या ईश्वर ऐश्वर्य के भी वश है? वे तो भक्ति के वश हैं। जानते हो, वे क्या चाहते हैं? वे रुपया नहीं चाहते – भाव, प्रेम, भक्ति, विवेक, वैराग्य यह सब चाहते हैं।
"जिसका जैसा भाव होता है, वह ईश्वर को वैसा ही देखता है। जो तमोगुणी भक्त है, वह देखता है कि माँ बकरा खाती है वह बकरे की बलि भी देता है। रजोगुणी भक्त नाना प्रकार के व्यंजन और अन्न-पकवान चढ़ाता है। सतोगुणी भक्त की पूजा में आडम्बर