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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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३४६श्रीरामकृष्णवचनामृत२८ नवम्बर, १८८३

श्रीरामकृष्ण – जब तक उपाधि है, तभी तक अनेक का बोध हो सकता है, जैसे केशव, प्रसन्न, अमृत – ये सब। पूर्ण ज्ञान होने पर एकमात्र चैतन्य का ही बोध होता है।

“पूर्ण ज्ञान होने पर मनुष्य देखता है, वही एकमात्र चैतन्य यह जीव-प्रपंच, ये चौबीसों तत्त्व बने हैं।

“परन्तु शक्ति की विशेषता पायी जाती है। यह सच है कि सब कुछ वे ही बने हैं, परन्तु कहीं तो उनकी शक्ति का प्रकाश अधिक है और कहीं कम।

“विद्यासागर ने कहा था, क्या ईश्वर ने किसी को अधिक शक्ति और किसी को कम शक्ति दी है मैंने कहा, अगर ऐसा न होता तो एक आदमी पचास आदमियों को हराता कैसे – और तुम्हें ही फिर क्यों हम लोग देखने आते ?

“वे जिस आधार में अपनी लीला का विकास दिखलाते हैं, वहाँ शक्ति की विशेषता रहती है।

“जमींदार सब जगह पर रहते हैं। परन्तु उन्हें लोग किसी खास बैठकखाने में अक्सर बैठते हुए देखते हैं। ईश्वर का बैठकखाना भक्तों का हृदय है। वहाँ अपनी लीला दिखाना उन्हें अधिक पसन्द है। वहाँ उनकी विशेष शक्ति अवतीर्ण होती है।

“इसका लक्षण क्या है? जहाँ कार्य की अधिकता है वहाँ शक्ति का विशेष प्रकाश है।

“यह आद्याशक्ति और परब्रह्म दोनों अभेद हैं। एक को छोड़ दूसरे का चिन्तन नहीं किया जा सकता। जैसे ज्योति और मणि। मणि को छोड़ मणि की ज्योति के बारे में सोचा नहीं जा सकता और न ज्योति को अलग करके मणि के बारे में ही सोचा जा सकता है। जैसे सर्प और उसकी वक्रगति। न सर्प को छोड़ उसकी तिर्यग्-गति सोची जा सकती है और न तिर्यग्-गति को छोड़ सर्प को।

सिद्ध और साधक मे भेद

“आद्याशक्ति ने ही इस जीव-प्रपंच, इस चतुर्विंशति तत्त्व का स्वरूप धारण किया है – अनुलोम और विलोम। राखाल, नरेन्द्र तथा और और लड़कों के लिए क्यों मैं इतना सोच विचार किया करता हूँ? हाजरा ने कहा, तुम उन लोगों के लिए इतना सोचते क्यों हो, ईश्वर-चिन्तन फिर कब करोगे (केशव तथा दूसरों का मुसकराना)

“तब मुझे बड़ी चिन्ता हुई। मैंने कहा, माँ यह क्या हुआ! हाजरा कहता है, उन लोगों के लिए क्यों सोचते रहते हो? फिर मैंने भोलानाथ से पूछा। उसने कहा, इसका उदाहरण महाभारत में है। समाधिस्थ मनुष्य समाधि से उतरकर ठहरे कहाँ? वह इसीलिये सतोगुणी मनुष्यों को लेकर रहता है। महाभारत का यह उदाहरण जब मिला तब जी में जी आया। (सब हँसते हैं।)

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar