श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
परिच्छेद ८५
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परिच्छेद ८५
पण्डित शशधर को उपदेश
(१)
काली ही ब्रह्म है। ब्रह्म और शक्ति अभेद
श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ अपने कमरे में जमीन पर बैठे हैं। पास ही शशधर पण्डित हैं। जमीन पर चटाई बिछी है, उस पर श्रीरामकृष्ण, पण्डित शशधर तथा कई भक्त बैठे हैं। कुछ लोग खाली जमीन पर ही बैठे हैं। सुरेन्द्र, बाबूराम, मास्टर, हरीश, लाटू, हाजरा, मणि मल्लिक आदि भक्त भी हैं। श्रीरामकृष्ण पण्डित पद्मलोचन की बात कह रहे हैं। पद्मलोचन बर्दवान महाराज के सभापण्डित थे। दिन का तीसरा पहर है, चार बजे का समय होगा।
आज सोमवार है, ३० जून, १८८४। छः दिन हो गये, जिस दिन रथयात्रा थी, उस दिन कलकत्ते में पण्डित शशधर के साथ श्रीरामकृष्ण की बातचीत हुई थी। आज पण्डितजी खुद आये हैं। साथ में श्रीयुत भूधर चट्टोपाध्याय और उनके बड़े भाई हैं। कलकत्ते में इन्हीं के मकान पर पण्डित शशधरजी रहते हैं।
पण्डितजी ज्ञानमार्गी हैं। श्रीरामकृष्ण उन्हें समझा रहे हैं – “नित्यता जिनकी है, लीला भी उन्हीं की है – जो अखण्ड सच्चिदानन्द हैं, उन्होंने लीला के लिए अनेक रूपों को धारण किया है।” भगवत्प्रसंग करते करते श्रीरामकृष्ण बेहोश होते जा रहे हैं। पण्डितजी से कह रहे हैं – “भैया, ब्रह्म सुमेरुवत् अटल और अचल हैं, परन्तु जिसमें न हिलने का भाव है उसमें हिलने का भाव भी है।”
श्रीरामकृष्ण प्रेम और आनन्द से मस्त हो गये हैं। सुन्दर कण्ठ से गाने लगे। एक के बाद दूसरा, इस तरह कई गाने गाये।
(गीतों का भाव) –
(१) कौन जानता है कि काली कैसी है? षड्दर्शन भी उनके दर्शन नहीं पाते ...।
(२) मेरी माँ किसी ऐसी-वैसी स्त्री की लड़की नहीं है। उसका नाम लेकर महेश्वर हलाहल पीकर भी बच गये। उसके कटाक्षमात्र से सृष्टि, स्थिति और प्रलय होते हैं। अनन्त ब्रह्माण्डों को वह अपने पेट में डाली हुई है। उसके चरणों की शरण लेकर देवता संकट
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से उद्धार पाते हैं। देवों के देव महादेव उसके पैरों के नीचे लोटते हैं।
(३) मेरी माँ में यह इतना ही गुण नहीं है कि वह शिव की सती है, नहीं, काल के काल भी उसे हाथ जोड़कर प्रणाम करते हैं। नग्न होकर वह शत्रुओं का संहार करती है। महाकाल के हृदय में उसका वास है। अच्छा मन! कहो तो सही, भला वह कैसी है जो अपने पति के हृदय में भी पाद-प्रहार करती है! रामप्रसाद कहते हैं! माता की लीलाएँ समस्त बन्धनों से परे हैं। मन! सावधानी के साथ प्रयत्न करते रहो, इससे तुम्हारी मति शुद्ध हो जायगी।
(४) यह मैं सुरापान नहीं कर रहा हूँ, काली का नाम लेकर मैं सुधापान करता हूँ। वह सुधा मुझे ऐसी मस्त कर देती है कि लोग मुझे मतवाला कहते हैं। गुरु के दिये हुए बीज को लेकर, उसमें प्रवृत्ति का मसाला डाल, ज्ञानरूपी कलवार जब शराब खींचता है, तब मेरा मतवाला मन उसका पान करता है। यन्त्रों से भरे हुए मूल मन्त्र का शोधन करके वह 'तारा-तारा' कहा करता है। रामप्रसाद कहता है, ऐसी सुरा के पीने से चतुर्वर्गों की प्राप्ति होती है।
(५) श्यामा-धन क्या कभी सब को थोड़े ही मिलता है? बड़ी आफत है - यह नादान मन समझाने पर भी नहीं समझता। उन सुरंजित चरणों में प्राणों को सौंप देना शिव के लिए भी असाध्य है, तो साधारण जनों की बात ही क्या!
श्रीरामकृष्ण का भावावेश घट रहा है। गाना बन्द हो गया। वे थोड़ी देर चुपचाप बैठे रहे। फिर अपनी छोटी खाट पर जाकर बैठे।
पण्डितजी गाना सुनकर मुग्ध हो गये। बड़े ही विनयस्वर में श्रीरामकृष्ण से कहा - क्या और गाना न होगा?
श्रीरामकृष्ण कुछ देर बाद फिर गाने लगे -
(१) श्यामा के चरणरूपी आकाश में मेरे मन की पतंग उड़ रही थी। पाप की हवा के झोंके से वह चक्कर खाकर गिर गयी...।
(२) अब मुझे एक अच्छा भाव मिल गया है। यह भाव मैंने एक अच्छे भावुक से सीखा है। जिस देश में रात नहीं है, उसी देश का एक आदमी मुझे मिला है। मैं दिन और रात को कुछ नहीं समझता, सन्ध्या को तो मैंने वन्ध्या बना डाला है।
(३) तुम्हारे अभय चरणों में मैंने प्राणों को समर्पण कर दिया है। अब मैंने यम की चिन्ता नहीं रखी, न मुझे अब उसका कोई भय ही है। अपनी शिर-शिखा में मैंने काली-नाम के महामन्त्र की ग्रन्थि लगा ली है। भव की हाट में देह बेचकर मैं श्रीदुर्गा नाम खरीद लाया हूँ।
'श्रीदुर्गा-नाम खरीद लाया हूँ,' इस वाक्य को सुनकर पण्डितजी की आँखों से आँसुओं की झड़ी लग गयी। श्रीरामकृष्ण फिर गा रहे हैं -
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(१) मैंने अपने हृदय में काली-नाम के कल्पतरू को रोपित कर लिया है। अब की बार जब यमराज आयेंगे, तब उन्हें हृदय खोलकर दिखाऊँगा, इसीलिए बैठा हुआ हूँ। देह के भीतर छः दुर्जन हैं, उन्हें मैंने घर से निकाल दिया है। रामप्रसाद कहते हैं, श्रीदुर्गा का नाम लेकर मैंने पहले ही से यात्रारम्भ कर दिया है।
(२) मन! अपने में ही रहना, किसी दूसरे के घर न जाना। जो कुछ तू चाहेगा, वह तुझे बैठे ही बैठे मिल जायगा। तू अपने अन्तःपुर में ही उसकी तलाश कर।
श्रीरामकृष्ण गाकर बतला रहे हैं कि मुक्ति की अपेक्षा भक्ति बड़ी है।
(गाना) “मुझे मुक्ति देते हुए कष्ट नहीं होता, परन्तु भक्ति देते बड़ी तकलीफ होती है। जिसे मेरी भक्ति मिलती है, वह सेवा का अधिकारी हो जाता है। फिर उसे कौन पा सकता है! वह त्रिलोकजयी हो जाता है। शुद्धा भक्ति एकमात्र वृन्दावन में है, गोपियों के सिवा किसी दूसरे को उसका ज्ञान नहीं। भक्ति ही के कारण, नन्द के यहाँ, उन्हें पिता मानकर, मैं उनकी बाधाओं को अपने सिर लेता हूँ।”
(२)
ज्ञानी और विज्ञानी। विचार कब तक?
पण्डितजी ने वेद और शास्त्रों का अध्ययन किया है। सदा ज्ञान की चर्चा में रहते हैं। श्रीरामकृष्ण छोटी खाट पर बैठे हुए उन्हें देख रहे हैं और कहानियों के रूप में अनेक प्रकार के उपदेश दे रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (पण्डितजी से) – वेदादि बहुत से शास्त्र हैं, परन्तु साधना किये बिना – तपस्या किये बिना – कोई ईश्वर को पा नहीं सकता। उनके दर्शन न तो षड्दर्शनों में होते हैं और न आगम, निगम और न तन्त्रसार में ही।
“शास्त्रों में जो कुछ लिखा है, उसे समझकर उसी के अनुसार काम करना चाहिए। किसी ने एक चिट्ठी खो दी थी। उसने चिट्ठी कहाँ रख दी यह उसे याद न रही। तब वह दिया लेकर खोजने लगा। दो तीन लोगों ने मिलकर खोजा, तब वह चिट्ठी मिली। उसमें लिखा था, पाँच सेर सन्देश और एक धोती भेजना। पढ़कर उसने फिर उस चिट्ठी को फेंक दिया। तब फिर चिट्ठी की कोई जरूरत न थी। पाँच सेर सन्देश और एक धोती के भेजने ही से मतलब था।
“पढ़ने की अपेक्षा सुनना अच्छा है, सुनने से देखना अच्छा है। श्रीगुरु-मुख से या साधु के मुख से सुनने पर धारणा अच्छी होती है, क्योंकि फिर शास्त्रों के असार-भाग के सोचने की आवश्यकता नहीं रहती। हनुमान ने कहा था, ‘भाई, मैं तिथि और नक्षत्र यह सब कुछ नहीं जानता, मैं तो बस श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण करता रहता हूँ।’
“सुनने की अपेक्षा देखना और अच्छा है। देखने पर सब सन्देह मिट जाते हैं।
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शास्त्रों में तो बहुत सी बातें हैं, परन्तु यदि ईश्वर के दर्शन न हुए – उनके चरणकमलों में भक्ति न हुई – चित्त शुद्ध न हुआ तो सब वृथा है। पंचांग में लिखा है, वर्षा बीस बिस्वे की होगी, परन्तु पंचांग दबाने से कहीं एक बूँद भी पानी नहीं गिरता। एक बूँद गिरे, सो भी नहीं।
“शास्त्रादि लेकर विचार कब तक के लिए हैं? – जब तक ईश्वर के दर्शन न हों। भौंरा कब तक गुँजार करता है? – जब तक वह फूल पर बैठता नहीं। फूल पर बैठकर जब वह मधु पीने लगता है, तब फिर गुनगुनाता नहीं।
“परन्तु एक बात है, ईश्वर के दर्शनों के बाद भी बातचीत हो सकती है; वह बात ईश्वर के ही आनन्द की बात होगी – जैसे मतवाले का ‘जय देवी’ बोलना, और भौंरा फूल पर बैठकर जैसे अर्धस्फुट शब्दों में गुंजार करता है।
“ज्ञानी ‘नेति-नेति’ विचार करता है। इस तरह विचार करते हुए जहाँ उसे आनन्द की प्राप्ति होती है, वही ब्रह्म है।
“ज्ञानी का स्वभाव कैसा है, जानते हो? ज्ञानी कानून के अनुसार चलता है।
“मुझे चानक ले गये थे। वहाँ मैंने कई साधुओं को देखा। उनमें कोई कोई कपड़ा सी रहे थे। (सब हँसते हैं।) मेरे जाने पर वह सब अलग रख दिया। फिर पैर पर पैर चढ़ाकर मुझसे बातचीत करने लगे। (सब हँसते हैं।)
“परन्तु ईश्वर की बात बिना पूछे ज्ञानी उस सम्बन्ध में खुद कुछ नहीं बोलते। पहले वे पूछेंगे, इस समय कैसे हो? – घरवाले अब कैसे हैं?
“परन्तु विज्ञानी का स्वभाव और ही है। उसके स्वभाव में ढिलाई रहती है। कभी देखा, धोती कहीं, खुली हुई है। कभी बगल में दबी है – बच्चे की तरह।
“ईश्वर हैं, यह जिसने जान लिया है, वह ज्ञानी है। लकड़ी में अवश्य ही आग है, यह जिसने जाना है, वह ज्ञानी है; परन्तु लकड़ी जलाकर भोजन पकाना, भरपेट खाना, यह जिसे आता है वह विज्ञानी है।
“विज्ञानी के आठों पाश खुल जाते हैं। उनमें कामक्रोधादि का आकार मात्र रह जाता है।”
पण्डितजी – “भिद्यते हृदयग्रन्थिश्च्छिद्यन्ते सर्व संशयाः।”
श्रीरामकृष्ण – हाँ, एक जहाज समुद्र में जा रहा था। एकाएक उसके कल-पुर्जे, लोहा-लक्कड़ खुलने लगे। पास ही एक चुम्बक का पहाड़ था। इसीलिए लोहा सब अलग होकर निकला जा रहा था। मैं कृष्णकिशोर के घर जाता था। एक दिन गया तो उसने कहा, तुम पान क्यों खाते हो? मैंने कहा, ‘मेरी इच्छा। मैं पान खाऊँगा, शीशे में मुँह देखूँगा, हजार औरतों के बीच में नंगा होकर नाचूँगा।’ कृष्णकिशोर की स्त्री उसे डाँटने लगी। कहा, ‘तुम किसे यह सब कह रहे हो? – रामकृष्ण को?’
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"इस अवस्था के आने पर कामक्रोधादि दग्ध हो जाते हैं। शरीर में कुछ फर्क नहीं होता, वह दूसरे आदमियों के जैसा दिखायी देता है; पर भीतर पोल और निर्मल हो जाता है।"
भक्त – ईश्वर-दर्शन के बाद भी क्या शरीर रहता है?
श्रीरामकृष्ण – किसी किसी का कुछ कर्मों के लिए रह जाता है – लोक-शिक्षा के लिए। गंगा नहाने से पाप धुल जाता है और मुक्ति हो जाती है, परन्तु आँख का अन्धापन नहीं जाता; परन्तु इतना होता है कि पापों के लिए जिन कुछ जन्मों तक कर्मफल का भोग करना होता है, वे जन्म फिर नहीं होते। जिस चक्कर को वह लग चुका है, बस उसे ही वह पूरा कर जायेगा। बचे हुए के लिए फिर उसे चक्कर न लगाना होगा। कामक्रोधादि सब दग्ध हो जाते हैं; शरीर सिर्फ कुछ कर्मों के लिए रह जाता है।
पण्डितजी – उसे ही संस्कार कहते हैं।
श्रीरामकृष्ण – विज्ञानी सदा ही ईश्वर के दर्शन किया करता है। इसीलिए तो उसका इतना ढीला स्वभाव होता है। वह आँखें खोलकर भी ईश्वर के दर्शन करता है। कभी वह नित्य से लीला में आ जाता है और कभी लीला से नित्य में चला जाता है।
पण्डितजी – यह मैं नहीं समझा।
श्रीरामकृष्ण – 'नेति नेति' का विचार करके वह उसी नित्य और अखण्ड सच्चिदानन्द में पहुँच जाता है। वह इस तरह विचार करता है – वे न जीव हैं, न संसार हैं, न चौबीसों तत्त्व हैं। नित्य में पहुँचकर फिर वह देखता है, यह सब वे हीं हुए हैं – जीव, जगत् और चौबीसों तत्त्व – यह सब।
"दूध का दही जमाकर, फिर उसे मथकर मक्खन निकाला जाता है। परन्तु मक्खन के निकल आने पर वह देखता है, जिस मट्ठे का मक्खन है, उसी मक्खन का मट्ठा भी है। छाल का ही गूदा है और गूदे की ही छाला।"
पण्डितजी – (भूधर से सहास्य) – समझे? समझना बहुत मुश्किल है।
श्रीरामकृष्ण – मक्खन हुआ, तो मट्ठा भी हुआ है। मक्खन को सोचने लगे, तो साथ साथ मट्ठे को भी सोचता पड़ता है, क्योंकि मट्ठा न रहा तो मक्खन हो नहीं सकता। अतएव, नित्य को मानो तो लीला भी माननी होगी। अनुलोम और विलोम। साकार और निराकार के दर्शन कर लेने के बाद यह अवस्था है। साकार चिन्मय रूप है और निराकार अखण्ड सच्चिदानन्द।
"वे ही सब कुछ हुए हैं। इसीलिए विज्ञानी इस संसार को 'आनन्द की कुटिया' देखता है। और ज्ञानी के लिए यह संसार 'धोखे की टट्टी' है। रामप्रसाद ने 'धोखे की टट्टी' कहा है, इसीलिए किसी ने उत्तर दिया – 'यह संसार आनन्द की कुटिया है। मैं
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दही खाता हूँ और मजा लूटता हूँ। अरे वैद्य, तुझे बुद्धि भी नहीं है? तू इतने उथले में है? जरा जनक राजा को तो देख, वे कितने तेजस्वी थे, दोनों ओर वे संभालकर चलते थे, तभी तो दूध का कटोरा साफ कर देते थे!’ (सब हँसते हैं।)
“विज्ञानी को विशेष रूप से ईश्वर का आनन्द मिला है। किसी ने दूध की बात-ही-बात सुनी है, किसी ने दूध देखा भर है और किसी ने दूध पिया है। विज्ञानी ने दूध पिया है, पीकर स्वाद लिया है और हृष्ट-पुष्ट भी हुआ है।”
श्रीरामकृष्ण कुछ देर के लिए चुप हो गये। पण्डितजी से उन्होंने तम्बाकू पीने के लिए कहा। पण्डितजी दक्षिण-पूर्ववाले लम्बे बरामदे में तम्बाकू पीने चले गये।
(३)
ज्ञान और विज्ञान। गोपीभाव
पण्डितजी लौटकर फिर से भक्तों के साथ जमीन पर बैठ गये। श्रीरामकृष्ण छोटी खटिया पर बैठकर फिर वार्तालाप करने लगे।
श्रीरामकृष्ण – (पण्डितजी से) – यह बात तुमसे कहता हूँ। आनन्द तीन प्रकार के होते हैं – विषयानन्द, भजनानन्द और ब्रह्मानन्द। जिसमें लोग सदा ही लिप्त रहते हैं – जो कामिनी और कांचन का आनन्द है, उसे विषयानन्द कहते हैं। ईश्वर के नाम और गुणों का गान करने से जो आनन्द मिलता है, उसका नाम है भजनानन्द और ईश्वर के दर्शन में जो आनन्द है, उसका नाम है ब्रह्मानन्द। ब्रह्मानन्द को प्राप्त करके ऋषि स्वेच्छा-विहारी हो जाते थे।
“चैतन्यदेव की तीन तरह की अवस्थाएँ होती थीं – अन्तर्दशा, अर्धबाह्यदशा और बाह्यदशा। अन्तर्दशा में वे ईश्वर का दर्शन करके समाधिस्थ हो जाया करते थे – जड़-समाधि की अवस्था हो जाती थी। अर्धबाह्यदशा में बाहर का कुछ होश रहता था। बाह्यदशा में नाम और गुणों का कीर्तन करते थे।
हाजरा – (पण्डितजी से) – अब तो आपके सब सन्देह मिट गये न?
श्रीरामकृष्ण – (पण्डितजी से) – समाधि किसे कहते हैं? – जहाँ मन का लय हो जाता है। ज्ञानी को जड़-समाधि होती है – फिर ‘अहं’ नहीं रह जाता। भक्तियोग की समाधि को चेतन-समाधि कहते हैं। इसमें सेव्य और सेवक का ‘मैं’ रहता है – रस-रसिक का ‘मैं’ – स्वाद के विषय और स्वाद लेनेवाले का ‘मैं’। ईश्वर सेव्य हैं और भक्त सेवक; ईश्वर रस-स्वरूप हैं और भक्त रसिक। ईश्वर स्वाद के विषय हैं और भक्त स्वाद लेनेवाले। वह चीनी नहीं बन जाता, चीनी खाना पसन्द करता है।
पण्डितजी – वे अगर सम्पूर्ण ‘मैं’ का लय कर दें तो क्या हो? अगर चीनी बना लें तो?
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श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – तुम अपने मन की बात खोलकर कहो। 'माँ कौशल्ये, एक बार खोलकर कहो!' (सब हँसते हैं।) तो क्या नारद, सनक, सनातन, सनन्द, सनत्कुमार शास्त्रों में नहीं हैं?
पण्डितजी – जी हाँ, शास्त्रों में हैं।
श्रीरामकृष्ण – उन लोगों ने ज्ञानी होकर भक्त का 'मैं' रख छोड़ा था। तुमने भागवत नहीं पढ़ा?
पण्डितजी – कुछ पढ़ा है, सब नहीं।
श्रीरामकृष्ण – प्रार्थना करो। वे दयामय हैं। क्या वे भक्त की बात न सुनेंगे? वे कल्पतरु हैं। उनके पास पहुँचकर जो जो प्रार्थना करेगा, वह वही पायेगा।
पण्डितजी – मैंने यह सब इतना नहीं सोचा। अब सब समझ रहा हूँ।
श्रीरामकृष्ण – ब्रह्मज्ञान के बाद भी ईश्वर कुछ 'मैं' रख देते हैं। वह 'मैं' भक्त का 'मैं' है – विद्या का 'मैं'। उससे इस अनन्त लीला का स्वाद मिलता है। मूसल सब घिस गया था, थोड़ा-सा रह गया था। बेत के वन में गिरकर उसने कुल का कुल नष्ट कर दिया – यदुवंश का इसी तरह ध्वंस हुआ। उसी तरह विज्ञानी भक्त का 'मैं' – विद्या का 'मैं' रखते हैं – लोक-शिक्षण के लिए।
"ऋषि डरपोक थे। उनका यह भाव था कि किसी तरह पार हो जायँ, फिर कौन आता है? सड़ी लकड़ी किसी तरह खुद तो बह जाती है; परन्तु उसपर अगर एक पक्षी भी बैठ जाय तो वह डूब जाती है। नारदादि बहादुर लकड़ी हैं, खुद भी बहते जाते हैं और कितने ही जीवों को भी साथ ले जाते हैं। स्टीम बोट (जहाज) खुद भी पार हो जाता है और दूसरों को भी पार कर देता है।
"नारदादि आचार्य विज्ञानी हैं – दूसरे ऋषियों की अपेक्षा साहसी हैं। जैसे पक्का खिलाड़ी, जैसा चाहता है, वैसे ही पांसे पड़ते हैं – प्रत्येक बार बिलकुल ठीक! पाँच कहो, पाँच पड़े, छः कहो छः – नारदादि ऐसे खिलाड़ी हैं। वह अपनी शान में, रह रहकर, मूँछों पर ताव देता रहता है।
"जो सिर्फ ज्ञानी हैं, उन्हें डर लगा रहता है। जैसें शतरंज खेलते समय कच्चे खिलाड़ी सोचते हैं, किसी तरह गोटी उठ जाय तो जी बचे। विज्ञानी को किसी बात का डर नहीं है। उसने साकार और निराकार दोनों को देखा है। ईश्वर के साथ उसने बातचीत की है – ईश्वर का आनन्द पाया है – उनका स्मरण करते हुए अगर उसका मन अखण्ड सच्चिदानन्द में लीन हो जाता है, तो भी उसे आनन्द है, और अगर मन लीन न हो तो लीला में रखकर भी आनन्द पाता है।
"जो केवल ज्ञानी है, वह एक ही प्रकार के बहाव में पड़ा रहता है। बस यही सोचता रहता है कि यह नहीं, यह नहीं – यह सब स्वप्नवत् है! मैंने दोनों हाथ ऊपर उठा दिये
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हैं, इसलिए मैं सब कुछ लेता हूँ। सुनो, मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ।
“एक स्त्री अपनी एक पहचानवाली स्त्री से मिलने गयी जो जुलाहिन थी। यह जुलाहिन उस समय सूत कात रही थी – कितने ही तरह के रेशम के सूत। अपनी साथिन को देखकर उसे बड़ी खुशी हुई। उसने कहा आओ तुम्हारा स्वागत है, मुझे बड़ा आनन्द हुआ है, तुम जरा बैठो, मैं जाकर तुम्हारे लिए कुछ मिठाई ले आऊँ। और यह कहकर वह बाहर चली गयी। इधर तरह तरह के रंगीन रेशम के सूत देखकर उस स्त्री को लालच हो आया और उसने झट कुछ सूत बगल में छिपा लिया। कुछ समय बाद जुलाहिन मिठाई लेकर वापस आयी और बड़े उत्साह से उस स्त्री को खिलाने लगी, परन्तु थोड़ी ही देर में जब उसकी नजर अपने सूत पर पड़ी तो वह समझ गयी कि इस स्त्री ने मेरा कुछ सूत दबा लिया है। निदान उसने सूत वसूल करने का एक उपाय सोच निकाला।
“उसने कहा, 'सखी! आज तो बहुत दिनों के बाद तुमसे मुलाकात हुई है। आज बड़े आनन्द का दिन है। मेरी बड़ी इच्छा है, आओ हम दोनों आज नाचें।' दूसरी स्त्री ने कहा, 'आनन्द की बात तो कुछ न पूछो। तुम्हारी इच्छा है, तो ठीक ही है।' खैर दोनों स्त्रियाँ नाचने लगीं। पर जुलाहिन ने देखा कि वह स्त्री दोनों हाथ ऊपर उठाकर नहीं नाच रही है। तब उसने कहा, आओ हम लोग दोनों हाथ उठाकर नाचें – आज तो बड़े आनन्द का दिन है, परन्तु दूसरी स्त्री ने एक हाथ ज्यों का त्यों दबाये ही रखा, केवल एक हाथ उठाकर नाची! तब जुलाहिन ने कहा, 'अरे यह क्या, आओ मैं दोनों हाथ उठाये हूँ।' पर दूसरी स्त्री एक बगल दबाकर ही नाचती रही और कहा, भाई जिसे जैसा आता है!”
फिर श्रीरामकृष्ण कहने लगे, “मैं बगल में कुछ दबाता नहीं, मैंने दोनों हाथ उठा दिये हैं, इसलिए मैं नित्य और लीला दोनों को स्वीकार करता हूँ।
“केशव सेन से मैंने कहा, 'मैं' का त्याग बिना किये कुछ होने का नहीं। उसने कहा, तब तो महाराज, दल-बल कुछ रह नहीं जाता। तब मैंने कहा, कच्चे 'मैं', दुष्ट 'मैं' को छोड़ने के लिए कहता हूँ। परन्तु पक्के 'मैं' में, ईश्वर के दास 'मैं' में, बालक के 'मैं' में, विद्या के 'मैं' में दोष नहीं। संसारियों का 'मैं' – अविद्या का 'मैं', कच्चा 'मैं' है; यह मोटी लाठी की तरह है। सच्चिदानन्द-सागर के पानी को वही लाठी दो भागों में बाँट रही है। परन्तु ईश्वर का दास 'मैं', बालक का 'मैं' या विद्या का 'मैं' पानी के ऊपर की पानी की रेखा की तरह है। पानी एक है; साफ नजर आ रहा है, केवल बीच में एक रेखा खिंची हुई, मानो पानी के दो भाग कर रही है। वस्तुतः पानी एक है – साफ दीख पड़ रहा है। शंकराचार्य ने विद्या का 'मैं' रखा था – लोकशिक्षा के लिए।
“ब्रह्मज्ञान के हो जाने पर भी वे अनेकों में विद्या का 'मैं' – भक्त का 'मैं' रख देते हैं। हनुमान साकार और निराकार के दर्शन करने के बाद सेव्य-सेवक का भाव लेकर, भक्त का भाव लेकर रहते थे। उन्होंने श्रीरामचन्द्र से कहा था, 'राम, कभी सोचता हूँ तुम
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पूर्ण हो और मैं अंश हूँ; कभी सोचता हूँ, तुम सेव्य हो और मैं सेवक हूँ; और राम! जब तत्त्वज्ञान होता है तब देखता हूँ, तुम्हीं ‘मैं’ हो, मैं ही ‘तुम’ हूँ।'
“कृष्ण के विरह से विकल होकर यशोदा राधिका के पास गयी। उनका कष्ट देखकर राधिका उनसे अपने स्वरूप में मिली और कहा, ‘श्रीकृष्ण चिदात्मा हैं और मैं चित्शक्ति। माँ, तुम मेरे पास वर माँगो।’ यशोदा ने कहा, ‘माँ! मुझे ब्रह्मज्ञान नहीं चाहिए, बस यही वरदान दो कि गोपाल के रूप के सदा दर्शन होते रहें, कृष्ण-भक्तों का सदा संग मिलता रहे। भक्तों की मैं सेवा करूँ और उनके नाम-गुणों का कीर्तन करूँ।’
“गोपियों की इच्छा हुई थी कि भगवान के ईश्वरी रूप का दर्शन करें। कृष्ण ने उन्हें यमुना में डुबकी लगाने के लिए कहा। डुबकी लगाते ही सब वैकुण्ठ जा पहुँचीं। वहाँ भगवान के उस षडैश्वर्यपूर्ण रूप के दर्शन तो हुए, परन्तु वह उन्हें अच्छा न लगा। तब कृष्ण से उन लोगों ने कहा, ‘हमारे लिए गोपाल के दर्शन, गोपाल की सेवा, बस यही रहे; हम और कुछ नहीं चाहतीं।’
“मथुरा जाने से पहले कृष्ण ने उन्हें ब्रह्मज्ञान देने का प्रयत्न किया था। कहला भेजा था, ‘मैं सर्व भूतों के अन्तर में भी हूँ और बाहर भी। तुम लोग क्या एक ही रूप में देख रही हो?’ गोपियों ने कहा, ‘कृष्ण हम लोगों को छोड़ जायेंगे, इसलिए ब्रह्मज्ञान का उपदेश भेजा है?’
“जानते हो गोपियों का भाव कैसा है? ‘हम राधा की – राधा हमारी।’”
एक भक्त – यह भक्त का ‘मैं’ क्या कभी नहीं जाता?
श्रीरामकृष्ण – वह ‘मैं’ कभी कभी चला जाता है। तब ब्रह्मज्ञान होता है, समाधि होती है। मेरा भी चला जाता है, परन्तु सब समय नहीं। सा, रे, ग, म, प, ध, नि; परन्तु ‘नि’ में अधिक देर तक नहीं रहा जाता। फिर नीचे के पदों में उतर आना पड़ता है। मैं कहता हूँ, माँ, मुझे ब्रह्मज्ञान न देना। पहले-पहल साकारवादी खूब आते थे। इसके बाद आजकल के निराकारवादी ब्राह्म समाजियों का धावा होने लगा। तब प्रायः उसी तरह मैं बेहोश होकर समाधिमग्न हो जाया करता था। और होश में आने पर कहता था, माँ, मुझे ब्रह्मज्ञान न देना।
पण्डितजी – हमारे कहने से क्या वे सुनेंगे?
श्रीरामकृष्ण – ईश्वर कल्पतरु हैं। भक्त जो कुछ चाहेगा, वही पायेगा। परन्तु कल्पतरु के पास पहुँचकर माँगना पड़ता है, तब कामना पूरी होती है।
“परन्तु एक बात है। वे भावग्राही हैं। जो जो कुछ सोचता है, साधना करने पर वह वैसा ही पाता है। जैसा भाव होता है, वैसा ही लाभ भी होता है, कोई बाजीगर राजा के सामने तमाशा दिखा रहा था। कहता था, ‘महाराज, रुपया दीजो – कपड़े दीजो’ यही सब। इसी समय उसकी जीभ ऊपर तालु में चढ़ गयी। साथ ही कुंभक हो गया। बस जबान
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५५४ श्रीरामकृष्णवचनामृत ३० जून, १८८४
बन्द हो गयी, शरीर बिलकुल स्थिर हो गया। तब लोगों ने ईंट की कब्र बनाकर उसी में उसे गाड़ रखा। किसी ने हजार साल बाद उस कब्र को खोदा। तब लोगों ने देखा, एक आदमी समाधिमग्न बैठा हुआ था। उसे साधु समझकर वे लोग उसकी पूजा करने लगे, इतने में ही हिलाने-डुलाने के कारण उसकी जीभ तालु से हट गयी। तब उसे होश हुआ और वह चिल्लाता हुआ कहने लगा, 'देखी मेरी कलाबाजी, महाराज, रुपया दीजो – कपड़े दीजो!'
“मैं रोता था और कहता था, माँ, मेरी विचार-बुद्धि पर वज्रपात हो।”
पण्डितजी – तो कहिये आप में भी विचार-बुद्धि थी?
श्रीरामकृष्ण – हाँ, एक समय थी।
पण्डितजी – तो बतलाइये जिस तरह हम लोगोंकी भी दूर हो जाय। आपकी किस तरह गयी?
श्रीरामकृष्ण – ऐसे ही एक तरह चली गयी।
(४)
ईश्वर-दर्शन जीवन का उद्देश्य है - उपाय व्याकुलता
श्रीरामकृष्ण कुछ देर चुपचाप बैठे रहकर फिर बातचीत करने लगे।
श्रीरामकृष्ण – ईश्वर कल्पतरु हैं। उनके पास पहुँचकर माँगना चाहिए। तब जो जो कुछ चाहता है, वही पाता है।
“ईश्वर ने न जाने क्या क्या बनाये हैं। उनके असंख्य ब्रह्माण्ड हैं, उनके अनन्त ऐश्वर्य के ज्ञान से हमें क्या जरूरत है? और अगर जानने की इच्छा हो, तो पहले उन्हें प्राप्त करना चाहिए, फिर वे स्वयं ही समझा देंगे। यदु मल्लिक के कितने मकान हैं, कम्पनी के कितने कागज हैं, इन सब बातों के जानने से हमें क्या मतलब? हमारा काम है किसी तरह बाबू से मुलाकात करना। इसके लिए खाई पर से कूदकर जाना हो या प्रार्थना करके अथवा दरवान के धक्के सहकर, हमें उन तक पहुँचना ही चाहिए। मुलाकात हो जाने पर उनके क्या क्या हैं, एक बार पूछने से बाबू खुद ही सब बतला देंगे और बाबू से मुलाकात हो जाने पर उनके कर्मचारी भी मानने लगते हैं। (सब हँसते हैं।)
“कोई कोई ऐश्वर्य को जानना नहीं चाहते। वे कहते हैं, कलवार की दूकान में कितने मन शराब है, इसे जानकर हम क्या करेंगे? हमारा काम तो बस एक ही बोतल से निकल जाता है। ऐश्वर्य का ज्ञान क्या करेगा लेकर? जितनी शराब पी है, उतनी ही में होश दुरुस्त नहीं है।
“भक्तियोग, ज्ञानयोग – ये ही सब मार्ग हैं, चाहे जिस रास्ते से होकर जाओ, उन्हें पाओगे। भक्ति का मार्ग सीधा है। ज्ञान और विचार का मार्ग विपत्तियों से भरा हुआ है।
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“कौनसा रास्ता अच्छा है, इसके अधिक विचार की क्या आवश्यकता है? विजय के साथ बहुत दिनों तक बातचीत हुई थी। विजय से मैंने कहा, एक आदमी प्रार्थना करता था, ‘हे ईश्वर, तुम क्या हो, कैसे हो, मुझे बता दो, मुझे दर्शन दो।’
“ज्ञान-विचार का मार्ग पार करना कठिन है। पार्वतीजी ने पर्वतराज को अपने अनेक ईश्वरी रूप दिखाकर कहा, ‘पिताजी, अगर ब्रह्मज्ञान चाहते हो तो साधुओं का संग करो।’
“शब्दों द्वारा ब्रह्म की व्याख्या नहीं की जा सकती। रामगीता में इस बात का निर्देश है कि शास्त्रों में ब्रह्म का केवल संकेत किया गया है – केवल उनके लक्षणों की ओर इशारा किया गया है; उदाहरणार्थ, यदि कोई यह कहे कि ‘गंगा पर का ग्वालों का गाँव’ तो उसका संकेत यही होता है कि वह गाँव गंगा के ‘तट’ पर स्थित है।
“निराकार ब्रह्मसाक्षात्कार क्यों नहीं होगा? पथ बड़ा कठिन है अवश्य। विषय-बुद्धि का लेशमात्र रहते नहीं होता। इन्द्रियों के जितने विषय हैं, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द इन सब का त्याग हो जाने पर, मन का लय हो जाने पर फिर कहीं उसका हृदय में प्रत्यक्ष अनुभव होता है, और फिर भी इससे इतना भी समझ में आता है कि ब्रह्म है – केवल ‘अस्ति’ का ज्ञान।”
पण्डितजी – ‘अस्तीत्येवोपलब्धव्यः’ इत्यादि।
श्रीरामकृष्ण – उन्हें पाने की अगर किसी को इच्छा हो तो किसी एक भाव का आश्रय लेना पड़ता है, वीरभाव, सखीभाव, दासीभाव या सन्तानभाव।
मणिमल्लिक – हाँ, तभी दृढ़ता होगी।
श्रीरामकृष्ण – मैं सखीभाव में बहुत दिन था। कहता था, ‘मैं आनन्दमयी, ब्रह्ममयी की दासी हूँ।’
“हे दासियो, मुझे भी दासी बना लो, मैं गर्वपूर्वक कहता जाऊँगा कि मैं ब्रह्ममयी की दासी हूँ।’
“किसी किसी को बिना साधना के ही ईश्वर मिल जाते है। उन्हें नित्यसिद्ध कहते हैं। जिन लोगों ने जप-तपादि साधनों द्वारा ईश्वर को प्राप्त किया है, उन्हें साधनसिद्ध कहते हैं – और कोई कोई कृपासिद्ध भी होते हैं। जैसे हजार साल का अँधेरा घर, दिया ले जाओ तो उसी क्षण वहाँ उजाला हो जाता है।
“एक हैं वे, जो एकाएक सिद्ध हो जाते हैं, जैसे किसी गरीब का लड़का बड़े आदमी की दृष्टि में पड़ जाय। बाबू ने उसके साथ अपनी लड़की ब्याह दी, साथ ही उसे घर-द्वार, घोड़ेगाड़ी, दास-दासियाँ, सब कुछ मिल गया।
“एक और हैं स्वप्नसिद्ध। वे स्वप्न में दर्शन पाकर सिद्ध हो जाते हैं।”
सुरेन्द्र – (सहास्य) – तो हम लोग अभी खर्राटे लें, बाद में बाबू हो जायेंगे।
श्रीरामकृष्ण – (सस्नेह) – तुम बाबू तो हो ही। ‘क’ में आकार लगाने से ‘का’
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होता है, उस पर एक और आकार लगाना वृथा है। 'का' का 'का' ही रहेगा। (सब हँसते हैं।)
"नित्यसिद्ध की एक अलग ही श्रेणी है, जैसे 'अरणि' काठ, जरासा रगड़ने से ही आग पैदा हो जाती है, और न रगड़ने से भी होती है। नित्यसिद्ध थोड़ीसी साधना करने पर ही ईश्वर को पा जाता है और साधना न करने पर भी पाता है।
"हाँ, नित्यसिद्ध ईश्वर को पा लेने पर साधना करते हैं। जैसे कुम्हड़े का पौधा, पहले उसमें फल लगता है, तब ऊपर फूल होता है।"
कुम्हड़े के पौधे में फल पहले होते हैं, फिर फूल, यह सुनकर पण्डितजी हँस रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – और नित्यसिद्ध होमा पक्षी की तरह हैं। उसकी माँ आकाश में बहुत ऊँचे पर रहती है। अण्डे देने पर गिरते हुए अण्डे फूट जाते हैं और फिर बच्चे भी गिरते रहते हैं। गिरते गिरते ही उनके पर निकल आते और आँखें खुल जाती हैं; परन्तु जमीन पर गिरकर कहीं चोट न लग जाय, इस ख्याल से वे फिर सीधे ऊँचे की ओर अपनी माँ के पास उड़ने लगते हैं। माँ कहाँ है, बस यही धुन रहती है। देखो न, 'क' लिखते हुए प्रह्लाद की आँखों से अश्रुधारा बह चली थी।
पण्डितजी का विनयभाव देखकर श्रीरामकृष्ण बड़े सन्तुष्ट हुए हैं। वे पण्डितजी के स्वभाव के सम्बन्ध में भक्तों से कह रहे हैं –
"इनका स्वभाव बड़ा अच्छा है। मिट्टी की दीवार में कीला गाड़ते हुए कोई तकलीफ नहीं होती। पत्थर में कील की नोंक चाहे टूट जाय पर पत्थर का कुछ नहीं होता। ऐसे भी आदमी हैं, जो लाख ईश्वर की चर्चा सुनें, पर उन्हें चेतना किसी तरह नहीं होती। जैसे घड़ियाल, देह पर तलवार भी चोट नहीं कर सकती।"
पण्डितजी – घड़ियाल के पेट में बरछी मारने से मतलब सिद्ध हो जाता है। (सब हँसते हैं।)
श्रीरामकृष्ण – सब शास्त्रों के पाठ से क्या होगा – फिलॉसफी (Philosophy) पढ़कर क्या होगा? लम्बी लम्बी बातों से क्या होता है? धनुर्वेद की शिक्षा प्राप्त करनी हो तो पहले केले के पेड़ पर निशाना साधना चाहिए, फिर नरईत के पौधे पर, फिर जलती हुई दीपक की बत्ती पर – फिर उड़ती हुई चिड़िया पर।
"इसीलिए पहले साकार में मन स्थिर करना चाहिए।
"और त्रिगुणातीत भक्त भी हैं – नित्यभक्त जैसे नारदादि। उस भक्ति में श्याम भी चिन्मय है, धाम भी चिन्मय है, और भक्त भी चिन्मय है। ईश्वर, उनका धाम तथा भक्त, सभी नित्य हैं।
"जो लोग 'नेति-नेति' के द्वारा ज्ञानपूर्वक विचार कर रहे हैं, वे अवतार नहीं मानते।
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हाजरा सच कहता है, भक्तों के लिए ही अवतार है, वह ज्ञानियों के लिए नहीं – वे सोऽहं जो बने हैं!”
श्रीरामकृष्ण और सारी भक्तमण्डली चुपचाप बैठी है। पण्डितजी बातचीत करने लगे।
पण्डितजी – अच्छा, यह निष्ठुर भाव किस तरह दूर हों? हास्य देखता हूँ तो मांसपेशियों (Muscles) की, स्नायुओं (Nerves) की याद आती है। शोक देखता हूँ तो एक स्नायविक क्रिया (Nervous System) की उत्तेजना जान पड़ती है।
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – यही बात नारायण शास्त्री भी कहता था, शास्त्र पढ़ने का यह दोष है कि वह तर्क और विचार में डाल देता है।
पण्डितजी – क्या कोई उपाय नहीं है?
श्रीरामकृष्ण – है, विवेक। एक गाना है, उसमें कहा है कि उसके विवेक नाम के लड़के से तत्त्व की बातें पूछना।
“विवेक, वैराग्य, ईश्वर पर अनुराग, ये ही सब उपाय हैं। विवेक के हुए बिना बात कभी पूरी नहीं उतरती। पण्डित सामाध्यायी ने बहुत कुछ व्याख्या के बाद कहा, ईश्वर नीरस है। एक ने कहा था, मेरे मामा के यहाँ एक गोशाले भर घोड़े हैं। गोशाले में भी कहीं घोड़े रहते हैं!
(सहास्य) “तुम तो गुलाबजामुन बन रहे हो। अभी कुछ दिन रस में पड़े रहो, इससे तुम्हारे लिए भी अच्छा है और दूसरों के लिए भी। बस दो-चार दिन के लिए रहो।”
पण्डितजी – (मुस्कराकर) – गुलाबजामुन जलकर खंगार हो गया है।
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – नहीं नहीं, अच्छा पका है, उसी की लाली है।
हाजरा – अच्छा भूना गया है, अभी रस और खींचेगा।
श्रीरामकृष्ण – बात यह है कि अधिक शास्त्र पढ़ने की जरूरत नहीं है। ज्यादा पढ़ने पर तर्क और विचार आ जाते हैं। न्यांगटा मुझे सिखलाता था – उपदेश देता था – गीता का दस बार उच्चारण करने से जो फल होता है, वही गीता का सार है। – अर्थात् दस बार ‘गीता-गीता’ कहने से तागी-तागी (त्यागी-त्यागी) निकलता है।
“उपाय विवेक और वैराग्य है, और ईश्वर पर अनुराग। पर कैसा अनुराग? ईश्वर के लिए जो व्याकुल हो रहा है – जैसी व्याकुलता के साथ बछड़े के पीछे गौ दौड़ती है।”
पण्डितजी – वेदों में बिलकुल ऐसा ही है। गौ जैसे बछड़े को पुकारती है, तुम्हें हम उसी तरह पुकारते हैं।
श्रीरामकृष्ण – व्याकुलता के साथ रोओ। और विवेक-वैराग्य प्राप्त करके अगर कोई सर्वस्व का त्याग कर सके तो उनका साक्षात्कार हो सकता है।
“उस व्याकुलता के आने पर उन्माद की अवस्था हो जाती है, ज्ञानमार्ग में रहो चाहे
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भक्तिमार्ग में। दुर्वासा को ज्ञानोन्माद हो गया था।
"संसारियों के ज्ञान और सर्वत्यागियों के ज्ञान में बड़ा अन्तर है। संसारियों का ज्ञान दीपक के प्रकाश के समान है, उससे घर के भीतर के अंश में ही उजाला होता है, उसके द्वारा अपनी देह, घर के काम, इनके अतिरिक्त और कुछ नहीं समझा जा सकता। सर्वत्यागी का ज्ञान सूर्य के प्रकाश की भाँति है। उस प्रकाश से घर का भीतर और बाहर सब प्रकाशित हो जाता है, सब देख लिया जाता है। चैतन्य देव का ज्ञान सौर-ज्ञान था – ज्ञानसूर्य का प्रकाश था। और उनके भीतर भक्तिचन्द्र की ठण्डी किरणें भी थीं। ब्रह्मज्ञान और भक्ति-प्रेम, दोनों थे।
"अभावमुख चैतन्य और भावमुख चैतन्य। भाव-भक्ति का एक मार्ग है और अभाव (नेति नेति ज्ञान-विचार) का भी एक दूसरा। तुम अभाव की बात कह रहे हो, परन्तु वह बड़ा कठिन है। कहा है, वह जगह ऐसी है कि वहाँ गुरु और शिष्य में भी मुलाकात नहीं होती। जनक के पास शुकदेव ब्रह्मज्ञान के उपदेश के लिए गये। जनक ने कहा, पहले दक्षिणा दे दो, तुम्हें ब्रह्मज्ञान हो जाने पर फिर तुम दक्षिणा थोड़े ही दोगे, क्योंकि तब गुरु और शिष्य में भेद ही नहीं रह जाता।
"भाव और अभाव सभी रास्ते हैं। मत जैसे अनन्त हैं वैसे ही पथ अनन्त हैं। परन्तु एक बात है। कलिकाल के लिए नारदीय भक्ति का ही विधान माना जाता है। इस मार्ग में पहले है भक्ति, भक्ति के पक जाने पर है भाव, भाव से उच्च है महाभाव। और प्रेम सभी जीवों को नहीं होता। यह जिसे हुआ है वह वस्तुलाभ कर चुका हैं।"
पण्डितजी – धर्म की व्याख्या करनी है, तो बहुतसी बातें कहकर समझाना पड़ता है।
श्रीरामकृष्ण – तुम अनावश्यक बातें छोड़कर कहा करो।
(५)
ब्रह्म शक्ति अभेद। सर्वधर्मसमन्वय
श्रीयुत मणि मल्लिक के साथ पण्डितजी बातचीत कर रहे हैं। मणि मल्लिक ब्राह्मसमाजी हैं। ब्राह्मसमाज के दोषों और गुणों पर घोर तर्क कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण अपनी छोटी खाट पर बैठे हुए सब सुन रहे हैं और फिर हँस रहे हैं। कभी कभी कह रहे हैं – यह सत्त्व का तम है, वीरों का भाव है, यह सब चाहिए। अन्याय और असत्य देखकर चुप न रहना चाहिए। सोचो कि व्यभिचारिणी स्त्री परमार्थ बिगाड़ने के लिए आ रही है, उस समय ऐसा ही वीरभाव चाहिए। तब कहना चाहिए, 'क्यों री, मेरा परलोक बरबाद करने चली है? अभी तुझे काट डालूँगा।'
फिर हँसकर कह रहे हैं – "मणि मल्लिक का ब्राह्मसमाजी मत बहुत दिनों से है।
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उसके भीतर तुम अपना मत घुसेड़ने की कोशिश न करो। पुराने संस्कार कभी एकाएक छूट सकते हैं? एक हिन्दू बड़ा भक्त था। सदा जगदम्बा की पूजा करता और उनका नाम लेता था। जब मुसलमानों का राज्य हुआ, तब उसे पकड़कर मुसलमानों ने मुसलमान बना लिया और कहा, अब तू मुसलमान हो गया। अब अल्ला का नाम ले, अल्ला का नाम जपा कर। वह आदमी बड़े कष्ट से 'अल्ला-अल्ला' कहने लगा; परन्तु फिर भी कभी-कभी 'जगदम्बा' का नाम निकल ही पड़ता था। तब मुसलमान उसे मारने दौड़ते। वह कहता था, 'दोहाई - शेखजी, मुझे मारना नहीं, मैं तुम्हारे अल्ला का नाम लेने की बड़ी कोशिश कर रहा हूँ, परन्तु करूँ क्या, भीतर जगदम्बा जो समायी हुई हैं, तुम्हारे अल्ला को धक्के मारकर निकाल देती हैं।' (सब हँसते हैं।)
(पण्डितजी से हँसते हुए) "मणि मल्लिक से कुछ कहना मत।
"बात यह है कि रुचि-भेद है, जिसके पेट में जो कुछ फायदा पहुँचाये। अनेक धर्म और अनेक मतों की सृष्टि उन्होंने अधिकारी विशेष के लिए की है। सभी आदमी ब्रह्मज्ञान के अधिकारी नहीं होते। और यही सोचकर उन्होंने साकार-पूजन की व्यवस्था की है। प्रकृति सब की अलग अलग होती है और फिर अधिकार-भेद भी है।"
सब लोग चुप हैं। श्रीरामकृष्ण पण्डितजी से कह रहे हैं, अब जाओ, देवताओं के दर्शन करो और बगीचा घूमकर देख लो।
दिन के पाँच बजे होंगे। पण्डितजी और उनके मित्र उठे। ठाकुरबाड़ी देखने जायेंगे। उनके साथ कोई-कोई भक्त भी गये। कुछ देर बाद मास्टर के साथ टहलते हुए श्रीरामकृष्ण भी गंगाजी के किनारे नहाने के घाट की ओर जा रहे है। श्रीरामकृष्ण मास्टर से कह रहे हैं, बाबूराम अब कहता है, लिख-पढ़कर क्या होगा?
गंगा के तट पर पण्डितजी के साथ श्रीरामकृष्ण की फिर भेंट हुई। श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, 'काली के दर्शन करने नहीं गये? - मैं तो इसीलिए आया हूँ।' पण्डितजी ने कहा, जी हाँ, चलिये, दर्शन करें।
श्रीरामकृष्ण के चेहरे पर प्रसन्नता की झलक है। आँगन के भीतर से काली-मन्दिर जाते हुए कह रहे हैं, एक गाना है। यह कहकर मधुर कण्ठ से गा रहे हैं -
"मेरी माँ काली थोड़े ही है? वह दिगम्बरा मूर्ति काले रूप से ही हृदयपद्म को प्रकाशित कर देती है ...।"
चाँदनी से आँगन में आकर फिर कह रहे हैं - घर में ज्ञानाग्नि प्रज्वलित करके ब्रह्ममयी का स्वरूप देखो।
मन्दिर में आकर श्रीरामकृष्ण ने काली को भूमिष्ठ हो प्रणाम किया। माता के श्रीचरणों पर जवापुष्प तथा बिल्वदल शोभा दे रहे थे। त्रिनेत्रा भक्तों को स्नेह की दृष्टि से देख रही हैं। हाथों में वर और अभय है। माता बनारसी साड़ी और भाँतिभाँति के अलंकार
५६० श्रीरामकृष्णवचनामृत ३० जून, १८८४
पहने हुए हैं। श्रीमूर्त्ति के दर्शन कर भूधर के बड़े भाई ने कहा, 'मैं वह कुछ नहीं जानता। इतना ही जानता हूँ कि यह तो चिन्मयी है।'
ईश्वरलाभ और कर्मत्याग। नयी हण्डी
श्रीरामकृष्ण अब लौट रहे हैं। बाबूराम को उन्होंने बुलाया। मास्टर भी साथ हो लिये।
शाम हो गयी है। घर के पश्चिमवाले गोल बरामदे में आकर श्रीरामकृष्ण बैठ गये। भावस्थ हैं, अवस्था अर्ध-बाह्य है। पास ही बाबूराम और मास्टर हैं।
आजकल श्रीरामकृष्ण की सेवा ठीक से नहीं होती। उन्हें तकलीफ रहती है। आजकल राखाल नहीं रहते। कोई कोई हैं, परन्तु वे, श्रीरामकृष्ण को उनकी सभी अवस्थाओं में छू नहीं सकते। श्रीरामकृष्ण भावावस्था में कह रहे हैं – 'छू - ना-रा-छू-' अर्थात् 'इस अवस्था में और किसी को छूने नहीं दे सकता। तू रहे तो अच्छा हो।'
पण्डितजी देवताओं के दर्शन करके श्रीरामकृष्ण के कमरे में आये। श्रीरामकृष्ण पश्चिम के गोल बरामदे से कह रहे हैं, तुम कुछ जलपान कर लो। पण्डितजी ने कहा, अभी मुझे सन्ध्या करनी है। श्रीरामकृष्ण भावावेश में मस्त होकर गाने लगे और उठकर खड़े हो गये।
“गया, गंगा, प्रभास, काशी, कांची, यह सब कौन चाहता है – अगर काली का स्मरण करता हुआ वह अपनी देह त्याग सके? त्रिसन्ध्या की बात लोग कहते हैं, परन्तु वह यह कुछ नहीं चाहता। सन्ध्या खुद उसकी खोज में फिरती रहती है, परन्तु सन्धि कभी नहीं पाती। पूजा, होम, जप और यज्ञ, किसी पर उसका मन लगता ही नहीं।”
श्रीरामकृष्ण प्रेमोन्मत्त होकर कह रहे हैं, सन्ध्या कितने दिन के लिए है? – जब तक ॐ कहते हुए मन लीन न हो जाय।
पण्डितजी – तो जलपान कर लेता हूँ, उसके बाद सन्ध्या करूँगा।
श्रीरामकृष्ण – मैं तुम्हारे बहाव को न रोकूँगा। समय के बिना आये त्याग अच्छा नहीं है। फल बड़ा हो जाता है, तब फूल आप झर जाता है। कच्ची अवस्था में नारियल का पत्ता खींचना न चाहिए। इस तरह तोड़ने से पेड़ खराब हो जाता है।
सुरेन्द्र घर जाने के लिए तैयार हैं। मित्रों को अपनी गाड़ी पर ले जाने के लिए बुला रहे हैं।
सुरेन्द्र – महेन्द्र बाबू चलियेगा?
श्रीरामकृष्ण की अब भी भावावस्था है। अभी तक पूरी प्राकृत अवस्था नहीं आयी। वे उसी अवस्था में सुरेन्द्र से कह रहे हैं – 'तुम्हारा घोड़ा जितना खींच सकें, उससे अधिक लोगों को न बैठाना।' सुरेन्द्र प्रणाम करके चले गये।
३० जून, १८८४ | परिच्छेद ८५ | ५६१
३० जून, १८८४ | परिच्छेद ८५ | ५६१
पण्डितजी सन्ध्या करने गये। मास्टर और बाबूराम कलकत्ता जायेंगे, श्रीरामकृष्ण को प्रणाम कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण अब भी भावावेश में हैं।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – बात नहीं निकलती, जरा ठहरो अभी।
मास्टर बैठे। श्रीरामकृष्ण की क्या आज्ञा होती है, इसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण ने इशारे से बाबूराम से बैठने के लिए कहा। बाबूराम ने मास्टर से कहा, जरा देर और बैठिये। श्रीरामकृष्ण ने बाबूराम से हवा करने के लिए कहा। बाबूराम पंखा झल रहे हैं, और मास्टर भी।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से, सस्नेह) – तुम अब उतना नहीं आते, क्यों?
मास्टर – जी, कोई खास कारण नहीं है। घर में काम था।
श्रीरामकृष्ण – बाबूराम का घर कहाँ है, यह मैं कल समझा। इसीलिए तो इसे रखने की इतनी कोशिश कर रहा हूँ। चिड़िया समय समझकर अण्डे फोड़ती है। बात यह है कि ये सब शुद्धात्मा लड़के हैं, कभी कामिनी और कांचन में नहीं पड़े। है न?
मास्टर – जी हाँ। अभी तक कोई धक्का नहीं लगा।
श्रीरामकृष्ण – नयी हण्डी है, दूध रखा जाय तो बिगड़ नहीं सकता।
मास्टर – जी हाँ।
श्रीरामकृष्ण – बाबूराम के यहाँ रहने की जरूरत भी है। कभी कभी मेरी अवस्था ऐसी हो जाती है कि उस समय ऐसे आदमियों का रहना जरूरी हो जाता है। उसने कहा है, धीरे धीरे रहूँगा, नहीं तो घरवाले शोरगुल मचायेंगे। मैंने कहा है, शनिवार और रविवार को आ जाया कर।
इधर पण्डितजी सन्ध्या करके आ गये। उनके साथ भूधर और बड़े भाई भी थे। पण्डितजी अब जलपान करेंगे।
भूधर के बड़े भाई कह रहे हैं, हम लोगों का क्या होगा, जरा कुछ आज्ञा कर दीजिये।
श्रीरामकृष्ण – तुम लोग मुमुक्षु हो। व्याकुलता के होने से ईश्वर मिलते हैं। श्राद्ध का अन्न न खाया करो। संसार में व्यभिचारिणी स्त्री की तरह होकर रहो। व्यभिचारिणी स्त्री घर का सब काम बड़ी प्रसन्नता से करती है, परन्तु उसका मन दिन-रात उसके यार के साथ रहता है। संसार का काम करो, परन्तु मन ईश्वर पर रखो।
पण्डितजी जलपान कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण कहते हैं, आसन पर बैठकर खाओ।
उन्होंने पण्डितजी से फिर कहा, 'तुमने गीता पढ़ी होगी। जिसे सब लोग मानें उसमें ईश्वर की विशेष शक्ति है।'
पण्डितजी –
" 'यद्यत् विभूतिमत् सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।' "
श्रीरामकृष्ण – तुम्हारे भीतर अवश्य ही उनकी शक्ति है।
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५६२ श्रीरामकृष्णवचनामृत ३० जून, १८८४
पण्डितजी – जो व्रत मैंने लिया है, क्या इसे अध्यवसाय के साथ पूरा करने की कोशिश करूँ?
श्रीरामकृष्ण ने जैसे अनुरोध की रक्षा के लिए कहा, 'हाँ होगा,' परन्तु इस बात को दबाने के लिए दूसरा प्रसंग उठा दिया।
श्रीरामकृष्ण – शक्ति को मानना चाहिए। विद्यासागर ने कहा, क्या उन्होंने किसी को ज्यादा शक्ति भी दी है? मैंने कहा, नहीं तो फिर एक आदमी सौ आदमियों को कैसे मार डालता है? क्वीन विक्टोरिया का इतना मान – इतना नाम क्यों है अगर उनमें शक्ति न होती? मैंने पूछा, तुम यह मानते हो या नहीं? तब उसने कहा, हाँ, मानता हूँ।
पण्डितजी उठे और श्रीरामकृष्ण को भूमिष्ठ हो प्रणाम किया। साथवाले उनके मित्रों ने भी प्रणाम किया।
श्रीरामकृष्ण कहते हैं – "फिर आना। गंजेड़ी गंजेड़ी को देखता है, तो खुश होता है; कभी तो उसे गले से लगा लेता है। दूसरे आदमी देखकर मुँह छिपाते हैं। गाय अपने साथ की गायों को देखती है तो उनकी देह चाटती है, पर दूसरी गायों को सिर से ठोकर मारती है।" (सब हँसते हैं।)
पण्डितजी के चले जाने पर श्रीरामकृष्ण हँस हँसकर कह रहे हैं – "डाइल्यूट (Dilute = मुग्ध) हो गया है, एक ही दिन में। देखा, कैसा विनय-भाव है, और सब बातें समझकर ग्रहण कर लेता है।"
आषाढ़ की शुक्ला सप्तमी है। पश्चिमवाले बरामदे में चाँदनी छिटक रही है। श्रीरामकृष्ण अब भी वहीं बैठे हैं। मास्टर प्रणाम कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण स्नेहपूर्वक पूछ रहे हैं, क्या जाओगे?
मास्टर – जी हाँ, अब चलता हूँ।
श्रीरामकृष्ण – एक दिन मैंने सोचा कि सब के यहाँ एक-एक बार जाऊँगा – क्यों?
मास्टर – जी हाँ, बड़ी कृपा होगी।
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परिच्छेद ८६
परिच्छेद ८६
साधना की आवश्यकता
(१)
पुनर्यात्रा दिन
श्रीरामकृष्ण बलराम बाबू के बैठकखाने में भक्तों के साथ बैठे हुए हैं। श्रीमुख पर प्रसन्नता झलक रही है, भक्तों से बातचीत कर रहे हैं।
आज रथ की पुनर्यात्रा है, दिन बृहस्पति है, ३ जुलाई १८८४, आषाढ़ की शुक्ला दशमी। श्रीयुत बलराम के यहाँ जगन्नाथजी की सेवा होती है, एक छोटा सा रथ भी है। उन्होंने पुनर्यात्रा के उपलक्ष्य में श्रीरामकृष्ण को निमन्त्रण भेजा था। यहाँ छोटा रथ, घर के बाहरवाले दुमंजले बरामदे में चलाया जाता है।
गत २५ जून बुधवार को रथयात्रा का प्रथम दिन था। श्रीरामकृष्ण ने श्रीयुत ईशान मुखोपाध्याय के यहाँ आकर निमन्त्रण स्वीकार किया था। उसी दिन पिछले पहर कालेज स्ट्रीट में भूधर के यहाँ पण्डित शशधर के साथ उनकी पहली मुलाकात हुई थी। तीन दिन की बात है, दक्षिणेश्वर में शशधर श्रीरामकृष्ण से मिले थे।
श्रीरामकृष्ण की आज्ञा पाकर बलराम ने आज शशधर को न्योता भेजा है। पण्डितजी हिन्दूधर्म की व्याख्या करके लोगों को शिक्षा देते हैं।
श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ बातचीत कर रहे हैं। पास ही राम, मास्टर, बलराम, मनोमोहन, कई बालक भक्त, बलराम के पिता आदि बैठे हैं। बलराम के पिता वैष्णव हैं, बड़े निष्ठावान हैं। वे प्रायः वृन्दावन में अपने ही प्रतिष्ठित कुंज में अकेले रहते हैं और श्रीश्यामसुन्दर विग्रह की सेवा करते हैं। वृन्दावन में वे अपना सारा समय देवसेवा में ही लगाते हैं। कभी कभी चैतन्य-चरितामृत आदि भक्तिग्रन्थों का पाठ करते हैं। कभी किसी भक्तिग्रन्थ की दूसरी लिपि उतारते हैं। कभी बैठे हुए स्वयं ही फूलों की माला तैयार करते हैं। कभी वैष्णवों का निमन्त्रण करके उनकी सेवा करते हैं। श्रीरामकृष्ण के दर्शन करने के लिए बलराम ने उन्हें पत्र पर पत्र भेजकर कलकत्ता बुलाया है। 'सभी धर्मों में साम्प्रदायिक भाव है, खासकर वैष्णवों में। दूसरे मत वाले एक दूसरे से विरोध करते हैं, वे समन्वय करना नहीं जानते।' – यही बात श्रीरामकृष्ण भक्तों से कह रहे हैं।
५६४ श्रीरामकृष्णवचनामृत ३ जुलाई, १८८४
श्रीरामकृष्ण – (बलराम के पिता और दूसरे भक्तों से) – वैष्णवों का एक ग्रन्थ है भक्तमाल, बड़ी अच्छी पुस्तक है। भक्तों की सब बातें उसमें हैं। परन्तु एक ही ढर्रे की है। एक जगह भगवती को विष्णुमन्त्र दिलाया है, तब पिण्ड छोड़ा है!
“‘मैंने वैष्णवचरण की बड़ी तारीफ करके सेजो बाबू के पास बुलवाया था। सेजो बाबू ने खूब खातिर की। चाँदी के बर्तन निकालकर उन्हीं में उनको जलपान कराया। फिर जब बातें होने लगीं, तब उसने सेजो बाबू के सामने कह डाला – ‘हमारे केशव-मन्त्र के बिना कुछ होने-जाने का नहीं।’ सेजो बाबू देवी के उपासक थे। इतना सुनते ही उनका मुँह लाल हो गया। मैंने वैष्णव चरण का हाथ दबा दिया।
“सुना है कि श्रीमद्भागवत जैसे ग्रन्थ में भी इस तरह की बातें हैं। ‘केशव का मन्त्र बिना लिये भवसागर के पार जाना कुत्ते की पूँछ पकड़कर महासमुद्र पार करना है।’ भिन्न-भिन्न मतवालों ने अपने ही मत को प्रधान बतलाया है।
“शाक्त भी वैष्णवों को छोटा सिद्ध करने की चेष्टा करते हैं। श्रीकृष्ण भव-नदी के नाविक हैं, पार कर देते हैं, इस पर शाक्त लोग कहते हैं – ‘हाँ, यह बिलकुल ठीक है, क्योंकि हमारी माँ राजराजेश्वरी हैं, भला वे कभी खुद आकर पार कर सकती हैं? – कृष्ण को पार करने के लिए नौकर रख लिया है।’ (सब हँसते हैं।)
“अपने मत पर लोग अहंकार भी कितना करते हैं! उस देश (कामारपुकुर), श्यामबाजार आदि स्थानों में कोरी बहुत हैं। उनमें बहुत से वैष्णव हैं। वे बड़ी लम्बी लम्बी बातें मारते हैं। कहते हैं, ‘अरे ये किस विष्णु को मानते हैं – पाता (पालनकर्ता) विष्णु को? – उसे तो हम लोग छुयेंगे भी नहीं! कौन शिव? – हम लोग तो आत्माराम शिव – आत्मारामेश्वर शिव को मानते हैं।’ कोई दूसरा बोल उठा, ‘तुम लोग समझाओ भी तो, किस हरि को मानते हो?’ इधर कपड़े बुनते हैं और उधर इतनी लम्बी लम्बी बातें!
“रति की माँ, रानी कात्यायनी की सहचरी है; – वैष्णवचरण के दल की है, कट्टर वैष्णवी। यहाँ बहुत आया-जाया करती थी। भक्ति का खूब दिखलावा था, ज्योंही मुझे उसने काली का प्रसाद पाते हुए देखा कि भागी।
“जिसने समन्वय किया है, वही मनुष्य है। अधिकतर आदमी एक खास ढर्रे के होते हैं। परन्तु मैं देखता हूँ, सब एक हैं। शाक्त, वैष्णव, वेदान्त मत, सब उसी एक को लेकर हैं; जो साकार हैं वे ही निराकार हैं, उन्हीं के अनेक रूप हैं। ‘निर्गुण मेरे पिता हैं, सगुण मेरी माँ; मैं किसकी निन्दा करूँ और किसकी वन्दना, दोनों ही पलड़े भारी हैं।’ वेदों में जिनकी बात है उन्हीं की बात तन्त्रों में है और पुराणों में भी उसी एक सच्चिदानन्द की बातें हैं। जो नित्य हैं, लीला भी उन्हीं की है।
“वेदों में है – ॐ सच्चिदानन्द ब्रह्म। तन्त्रों में है – ॐ सच्चिदानन्दः शिवः –