श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३० जून, १८८४ | परिच्छेद ८५ | ५४७
(१) मैंने अपने हृदय में काली-नाम के कल्पतरू को रोपित कर लिया है। अब की बार जब यमराज आयेंगे, तब उन्हें हृदय खोलकर दिखाऊँगा, इसीलिए बैठा हुआ हूँ। देह के भीतर छः दुर्जन हैं, उन्हें मैंने घर से निकाल दिया है। रामप्रसाद कहते हैं, श्रीदुर्गा का नाम लेकर मैंने पहले ही से यात्रारम्भ कर दिया है।
(२) मन! अपने में ही रहना, किसी दूसरे के घर न जाना। जो कुछ तू चाहेगा, वह तुझे बैठे ही बैठे मिल जायगा। तू अपने अन्तःपुर में ही उसकी तलाश कर।
श्रीरामकृष्ण गाकर बतला रहे हैं कि मुक्ति की अपेक्षा भक्ति बड़ी है।
(गाना) “मुझे मुक्ति देते हुए कष्ट नहीं होता, परन्तु भक्ति देते बड़ी तकलीफ होती है। जिसे मेरी भक्ति मिलती है, वह सेवा का अधिकारी हो जाता है। फिर उसे कौन पा सकता है! वह त्रिलोकजयी हो जाता है। शुद्धा भक्ति एकमात्र वृन्दावन में है, गोपियों के सिवा किसी दूसरे को उसका ज्ञान नहीं। भक्ति ही के कारण, नन्द के यहाँ, उन्हें पिता मानकर, मैं उनकी बाधाओं को अपने सिर लेता हूँ।”
(२)
ज्ञानी और विज्ञानी। विचार कब तक?
पण्डितजी ने वेद और शास्त्रों का अध्ययन किया है। सदा ज्ञान की चर्चा में रहते हैं। श्रीरामकृष्ण छोटी खाट पर बैठे हुए उन्हें देख रहे हैं और कहानियों के रूप में अनेक प्रकार के उपदेश दे रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (पण्डितजी से) – वेदादि बहुत से शास्त्र हैं, परन्तु साधना किये बिना – तपस्या किये बिना – कोई ईश्वर को पा नहीं सकता। उनके दर्शन न तो षड्दर्शनों में होते हैं और न आगम, निगम और न तन्त्रसार में ही।
“शास्त्रों में जो कुछ लिखा है, उसे समझकर उसी के अनुसार काम करना चाहिए। किसी ने एक चिट्ठी खो दी थी। उसने चिट्ठी कहाँ रख दी यह उसे याद न रही। तब वह दिया लेकर खोजने लगा। दो तीन लोगों ने मिलकर खोजा, तब वह चिट्ठी मिली। उसमें लिखा था, पाँच सेर सन्देश और एक धोती भेजना। पढ़कर उसने फिर उस चिट्ठी को फेंक दिया। तब फिर चिट्ठी की कोई जरूरत न थी। पाँच सेर सन्देश और एक धोती के भेजने ही से मतलब था।
“पढ़ने की अपेक्षा सुनना अच्छा है, सुनने से देखना अच्छा है। श्रीगुरु-मुख से या साधु के मुख से सुनने पर धारणा अच्छी होती है, क्योंकि फिर शास्त्रों के असार-भाग के सोचने की आवश्यकता नहीं रहती। हनुमान ने कहा था, ‘भाई, मैं तिथि और नक्षत्र यह सब कुछ नहीं जानता, मैं तो बस श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण करता रहता हूँ।’
“सुनने की अपेक्षा देखना और अच्छा है। देखने पर सब सन्देह मिट जाते हैं।