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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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३० जून, १८८४ परिच्छेद ८५ ५५५

“कौनसा रास्ता अच्छा है, इसके अधिक विचार की क्या आवश्यकता है? विजय के साथ बहुत दिनों तक बातचीत हुई थी। विजय से मैंने कहा, एक आदमी प्रार्थना करता था, ‘हे ईश्वर, तुम क्या हो, कैसे हो, मुझे बता दो, मुझे दर्शन दो।’

“ज्ञान-विचार का मार्ग पार करना कठिन है। पार्वतीजी ने पर्वतराज को अपने अनेक ईश्वरी रूप दिखाकर कहा, ‘पिताजी, अगर ब्रह्मज्ञान चाहते हो तो साधुओं का संग करो।’

“शब्दों द्वारा ब्रह्म की व्याख्या नहीं की जा सकती। रामगीता में इस बात का निर्देश है कि शास्त्रों में ब्रह्म का केवल संकेत किया गया है – केवल उनके लक्षणों की ओर इशारा किया गया है; उदाहरणार्थ, यदि कोई यह कहे कि ‘गंगा पर का ग्वालों का गाँव’ तो उसका संकेत यही होता है कि वह गाँव गंगा के ‘तट’ पर स्थित है।

“निराकार ब्रह्मसाक्षात्कार क्यों नहीं होगा? पथ बड़ा कठिन है अवश्य। विषय-बुद्धि का लेशमात्र रहते नहीं होता। इन्द्रियों के जितने विषय हैं, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द इन सब का त्याग हो जाने पर, मन का लय हो जाने पर फिर कहीं उसका हृदय में प्रत्यक्ष अनुभव होता है, और फिर भी इससे इतना भी समझ में आता है कि ब्रह्म है – केवल ‘अस्ति’ का ज्ञान।”

पण्डितजी – ‘अस्तीत्येवोपलब्धव्यः’ इत्यादि।

श्रीरामकृष्ण – उन्हें पाने की अगर किसी को इच्छा हो तो किसी एक भाव का आश्रय लेना पड़ता है, वीरभाव, सखीभाव, दासीभाव या सन्तानभाव।

मणिमल्लिक – हाँ, तभी दृढ़ता होगी।

श्रीरामकृष्ण – मैं सखीभाव में बहुत दिन था। कहता था, ‘मैं आनन्दमयी, ब्रह्ममयी की दासी हूँ।’

“हे दासियो, मुझे भी दासी बना लो, मैं गर्वपूर्वक कहता जाऊँगा कि मैं ब्रह्ममयी की दासी हूँ।’

“किसी किसी को बिना साधना के ही ईश्वर मिल जाते है। उन्हें नित्यसिद्ध कहते हैं। जिन लोगों ने जप-तपादि साधनों द्वारा ईश्वर को प्राप्त किया है, उन्हें साधनसिद्ध कहते हैं – और कोई कोई कृपासिद्ध भी होते हैं। जैसे हजार साल का अँधेरा घर, दिया ले जाओ तो उसी क्षण वहाँ उजाला हो जाता है।

“एक हैं वे, जो एकाएक सिद्ध हो जाते हैं, जैसे किसी गरीब का लड़का बड़े आदमी की दृष्टि में पड़ जाय। बाबू ने उसके साथ अपनी लड़की ब्याह दी, साथ ही उसे घर-द्वार, घोड़ेगाड़ी, दास-दासियाँ, सब कुछ मिल गया।

“एक और हैं स्वप्नसिद्ध। वे स्वप्न में दर्शन पाकर सिद्ध हो जाते हैं।”

सुरेन्द्र – (सहास्य) – तो हम लोग अभी खर्राटे लें, बाद में बाबू हो जायेंगे।

श्रीरामकृष्ण – (सस्नेह) – तुम बाबू तो हो ही। ‘क’ में आकार लगाने से ‘का’

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