श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५५४ श्रीरामकृष्णवचनामृत ३० जून, १८८४
बन्द हो गयी, शरीर बिलकुल स्थिर हो गया। तब लोगों ने ईंट की कब्र बनाकर उसी में उसे गाड़ रखा। किसी ने हजार साल बाद उस कब्र को खोदा। तब लोगों ने देखा, एक आदमी समाधिमग्न बैठा हुआ था। उसे साधु समझकर वे लोग उसकी पूजा करने लगे, इतने में ही हिलाने-डुलाने के कारण उसकी जीभ तालु से हट गयी। तब उसे होश हुआ और वह चिल्लाता हुआ कहने लगा, 'देखी मेरी कलाबाजी, महाराज, रुपया दीजो – कपड़े दीजो!'
“मैं रोता था और कहता था, माँ, मेरी विचार-बुद्धि पर वज्रपात हो।”
पण्डितजी – तो कहिये आप में भी विचार-बुद्धि थी?
श्रीरामकृष्ण – हाँ, एक समय थी।
पण्डितजी – तो बतलाइये जिस तरह हम लोगोंकी भी दूर हो जाय। आपकी किस तरह गयी?
श्रीरामकृष्ण – ऐसे ही एक तरह चली गयी।
(४)
ईश्वर-दर्शन जीवन का उद्देश्य है - उपाय व्याकुलता
श्रीरामकृष्ण कुछ देर चुपचाप बैठे रहकर फिर बातचीत करने लगे।
श्रीरामकृष्ण – ईश्वर कल्पतरु हैं। उनके पास पहुँचकर माँगना चाहिए। तब जो जो कुछ चाहता है, वही पाता है।
“ईश्वर ने न जाने क्या क्या बनाये हैं। उनके असंख्य ब्रह्माण्ड हैं, उनके अनन्त ऐश्वर्य के ज्ञान से हमें क्या जरूरत है? और अगर जानने की इच्छा हो, तो पहले उन्हें प्राप्त करना चाहिए, फिर वे स्वयं ही समझा देंगे। यदु मल्लिक के कितने मकान हैं, कम्पनी के कितने कागज हैं, इन सब बातों के जानने से हमें क्या मतलब? हमारा काम है किसी तरह बाबू से मुलाकात करना। इसके लिए खाई पर से कूदकर जाना हो या प्रार्थना करके अथवा दरवान के धक्के सहकर, हमें उन तक पहुँचना ही चाहिए। मुलाकात हो जाने पर उनके क्या क्या हैं, एक बार पूछने से बाबू खुद ही सब बतला देंगे और बाबू से मुलाकात हो जाने पर उनके कर्मचारी भी मानने लगते हैं। (सब हँसते हैं।)
“कोई कोई ऐश्वर्य को जानना नहीं चाहते। वे कहते हैं, कलवार की दूकान में कितने मन शराब है, इसे जानकर हम क्या करेंगे? हमारा काम तो बस एक ही बोतल से निकल जाता है। ऐश्वर्य का ज्ञान क्या करेगा लेकर? जितनी शराब पी है, उतनी ही में होश दुरुस्त नहीं है।
“भक्तियोग, ज्ञानयोग – ये ही सब मार्ग हैं, चाहे जिस रास्ते से होकर जाओ, उन्हें पाओगे। भक्ति का मार्ग सीधा है। ज्ञान और विचार का मार्ग विपत्तियों से भरा हुआ है।