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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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पृष्ठ 581
५५८श्रीरामकृष्णवचनामृत३० जून, १८८४

भक्तिमार्ग में। दुर्वासा को ज्ञानोन्माद हो गया था।

"संसारियों के ज्ञान और सर्वत्यागियों के ज्ञान में बड़ा अन्तर है। संसारियों का ज्ञान दीपक के प्रकाश के समान है, उससे घर के भीतर के अंश में ही उजाला होता है, उसके द्वारा अपनी देह, घर के काम, इनके अतिरिक्त और कुछ नहीं समझा जा सकता। सर्वत्यागी का ज्ञान सूर्य के प्रकाश की भाँति है। उस प्रकाश से घर का भीतर और बाहर सब प्रकाशित हो जाता है, सब देख लिया जाता है। चैतन्य देव का ज्ञान सौर-ज्ञान था – ज्ञानसूर्य का प्रकाश था। और उनके भीतर भक्तिचन्द्र की ठण्डी किरणें भी थीं। ब्रह्मज्ञान और भक्ति-प्रेम, दोनों थे।

"अभावमुख चैतन्य और भावमुख चैतन्य। भाव-भक्ति का एक मार्ग है और अभाव (नेति नेति ज्ञान-विचार) का भी एक दूसरा। तुम अभाव की बात कह रहे हो, परन्तु वह बड़ा कठिन है। कहा है, वह जगह ऐसी है कि वहाँ गुरु और शिष्य में भी मुलाकात नहीं होती। जनक के पास शुकदेव ब्रह्मज्ञान के उपदेश के लिए गये। जनक ने कहा, पहले दक्षिणा दे दो, तुम्हें ब्रह्मज्ञान हो जाने पर फिर तुम दक्षिणा थोड़े ही दोगे, क्योंकि तब गुरु और शिष्य में भेद ही नहीं रह जाता।

"भाव और अभाव सभी रास्ते हैं। मत जैसे अनन्त हैं वैसे ही पथ अनन्त हैं। परन्तु एक बात है। कलिकाल के लिए नारदीय भक्ति का ही विधान माना जाता है। इस मार्ग में पहले है भक्ति, भक्ति के पक जाने पर है भाव, भाव से उच्च है महाभाव। और प्रेम सभी जीवों को नहीं होता। यह जिसे हुआ है वह वस्तुलाभ कर चुका हैं।"

पण्डितजी – धर्म की व्याख्या करनी है, तो बहुतसी बातें कहकर समझाना पड़ता है।

श्रीरामकृष्ण – तुम अनावश्यक बातें छोड़कर कहा करो।

(५)

ब्रह्म शक्ति अभेद। सर्वधर्मसमन्वय

श्रीयुत मणि मल्लिक के साथ पण्डितजी बातचीत कर रहे हैं। मणि मल्लिक ब्राह्मसमाजी हैं। ब्राह्मसमाज के दोषों और गुणों पर घोर तर्क कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण अपनी छोटी खाट पर बैठे हुए सब सुन रहे हैं और फिर हँस रहे हैं। कभी कभी कह रहे हैं – यह सत्त्व का तम है, वीरों का भाव है, यह सब चाहिए। अन्याय और असत्य देखकर चुप न रहना चाहिए। सोचो कि व्यभिचारिणी स्त्री परमार्थ बिगाड़ने के लिए आ रही है, उस समय ऐसा ही वीरभाव चाहिए। तब कहना चाहिए, 'क्यों री, मेरा परलोक बरबाद करने चली है? अभी तुझे काट डालूँगा।'

फिर हँसकर कह रहे हैं – "मणि मल्लिक का ब्राह्मसमाजी मत बहुत दिनों से है।