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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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३० जून, १८८४ परिच्छेद ८५ ५५९

उसके भीतर तुम अपना मत घुसेड़ने की कोशिश न करो। पुराने संस्कार कभी एकाएक छूट सकते हैं? एक हिन्दू बड़ा भक्त था। सदा जगदम्बा की पूजा करता और उनका नाम लेता था। जब मुसलमानों का राज्य हुआ, तब उसे पकड़कर मुसलमानों ने मुसलमान बना लिया और कहा, अब तू मुसलमान हो गया। अब अल्ला का नाम ले, अल्ला का नाम जपा कर। वह आदमी बड़े कष्ट से 'अल्ला-अल्ला' कहने लगा; परन्तु फिर भी कभी-कभी 'जगदम्बा' का नाम निकल ही पड़ता था। तब मुसलमान उसे मारने दौड़ते। वह कहता था, 'दोहाई - शेखजी, मुझे मारना नहीं, मैं तुम्हारे अल्ला का नाम लेने की बड़ी कोशिश कर रहा हूँ, परन्तु करूँ क्या, भीतर जगदम्बा जो समायी हुई हैं, तुम्हारे अल्ला को धक्के मारकर निकाल देती हैं।' (सब हँसते हैं।)

(पण्डितजी से हँसते हुए) "मणि मल्लिक से कुछ कहना मत।

"बात यह है कि रुचि-भेद है, जिसके पेट में जो कुछ फायदा पहुँचाये। अनेक धर्म और अनेक मतों की सृष्टि उन्होंने अधिकारी विशेष के लिए की है। सभी आदमी ब्रह्मज्ञान के अधिकारी नहीं होते। और यही सोचकर उन्होंने साकार-पूजन की व्यवस्था की है। प्रकृति सब की अलग अलग होती है और फिर अधिकार-भेद भी है।"

सब लोग चुप हैं। श्रीरामकृष्ण पण्डितजी से कह रहे हैं, अब जाओ, देवताओं के दर्शन करो और बगीचा घूमकर देख लो।

दिन के पाँच बजे होंगे। पण्डितजी और उनके मित्र उठे। ठाकुरबाड़ी देखने जायेंगे। उनके साथ कोई-कोई भक्त भी गये। कुछ देर बाद मास्टर के साथ टहलते हुए श्रीरामकृष्ण भी गंगाजी के किनारे नहाने के घाट की ओर जा रहे है। श्रीरामकृष्ण मास्टर से कह रहे हैं, बाबूराम अब कहता है, लिख-पढ़कर क्या होगा?

गंगा के तट पर पण्डितजी के साथ श्रीरामकृष्ण की फिर भेंट हुई। श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, 'काली के दर्शन करने नहीं गये? - मैं तो इसीलिए आया हूँ।' पण्डितजी ने कहा, जी हाँ, चलिये, दर्शन करें।

श्रीरामकृष्ण के चेहरे पर प्रसन्नता की झलक है। आँगन के भीतर से काली-मन्दिर जाते हुए कह रहे हैं, एक गाना है। यह कहकर मधुर कण्ठ से गा रहे हैं -

"मेरी माँ काली थोड़े ही है? वह दिगम्बरा मूर्ति काले रूप से ही हृदयपद्म को प्रकाशित कर देती है ...।"

चाँदनी से आँगन में आकर फिर कह रहे हैं - घर में ज्ञानाग्नि प्रज्वलित करके ब्रह्ममयी का स्वरूप देखो।

मन्दिर में आकर श्रीरामकृष्ण ने काली को भूमिष्ठ हो प्रणाम किया। माता के श्रीचरणों पर जवापुष्प तथा बिल्वदल शोभा दे रहे थे। त्रिनेत्रा भक्तों को स्नेह की दृष्टि से देख रही हैं। हाथों में वर और अभय है। माता बनारसी साड़ी और भाँतिभाँति के अलंकार