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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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पृष्ठ 575

५५२ श्रीरामकृष्णवचनामृत ३० जून, १८८४

हैं, इसलिए मैं सब कुछ लेता हूँ। सुनो, मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ।

“एक स्त्री अपनी एक पहचानवाली स्त्री से मिलने गयी जो जुलाहिन थी। यह जुलाहिन उस समय सूत कात रही थी – कितने ही तरह के रेशम के सूत। अपनी साथिन को देखकर उसे बड़ी खुशी हुई। उसने कहा आओ तुम्हारा स्वागत है, मुझे बड़ा आनन्द हुआ है, तुम जरा बैठो, मैं जाकर तुम्हारे लिए कुछ मिठाई ले आऊँ। और यह कहकर वह बाहर चली गयी। इधर तरह तरह के रंगीन रेशम के सूत देखकर उस स्त्री को लालच हो आया और उसने झट कुछ सूत बगल में छिपा लिया। कुछ समय बाद जुलाहिन मिठाई लेकर वापस आयी और बड़े उत्साह से उस स्त्री को खिलाने लगी, परन्तु थोड़ी ही देर में जब उसकी नजर अपने सूत पर पड़ी तो वह समझ गयी कि इस स्त्री ने मेरा कुछ सूत दबा लिया है। निदान उसने सूत वसूल करने का एक उपाय सोच निकाला।

“उसने कहा, 'सखी! आज तो बहुत दिनों के बाद तुमसे मुलाकात हुई है। आज बड़े आनन्द का दिन है। मेरी बड़ी इच्छा है, आओ हम दोनों आज नाचें।' दूसरी स्त्री ने कहा, 'आनन्द की बात तो कुछ न पूछो। तुम्हारी इच्छा है, तो ठीक ही है।' खैर दोनों स्त्रियाँ नाचने लगीं। पर जुलाहिन ने देखा कि वह स्त्री दोनों हाथ ऊपर उठाकर नहीं नाच रही है। तब उसने कहा, आओ हम लोग दोनों हाथ उठाकर नाचें – आज तो बड़े आनन्द का दिन है, परन्तु दूसरी स्त्री ने एक हाथ ज्यों का त्यों दबाये ही रखा, केवल एक हाथ उठाकर नाची! तब जुलाहिन ने कहा, 'अरे यह क्या, आओ मैं दोनों हाथ उठाये हूँ।' पर दूसरी स्त्री एक बगल दबाकर ही नाचती रही और कहा, भाई जिसे जैसा आता है!”

फिर श्रीरामकृष्ण कहने लगे, “मैं बगल में कुछ दबाता नहीं, मैंने दोनों हाथ उठा दिये हैं, इसलिए मैं नित्य और लीला दोनों को स्वीकार करता हूँ।

“केशव सेन से मैंने कहा, 'मैं' का त्याग बिना किये कुछ होने का नहीं। उसने कहा, तब तो महाराज, दल-बल कुछ रह नहीं जाता। तब मैंने कहा, कच्चे 'मैं', दुष्ट 'मैं' को छोड़ने के लिए कहता हूँ। परन्तु पक्के 'मैं' में, ईश्वर के दास 'मैं' में, बालक के 'मैं' में, विद्या के 'मैं' में दोष नहीं। संसारियों का 'मैं' – अविद्या का 'मैं', कच्चा 'मैं' है; यह मोटी लाठी की तरह है। सच्चिदानन्द-सागर के पानी को वही लाठी दो भागों में बाँट रही है। परन्तु ईश्वर का दास 'मैं', बालक का 'मैं' या विद्या का 'मैं' पानी के ऊपर की पानी की रेखा की तरह है। पानी एक है; साफ नजर आ रहा है, केवल बीच में एक रेखा खिंची हुई, मानो पानी के दो भाग कर रही है। वस्तुतः पानी एक है – साफ दीख पड़ रहा है। शंकराचार्य ने विद्या का 'मैं' रखा था – लोकशिक्षा के लिए।

“ब्रह्मज्ञान के हो जाने पर भी वे अनेकों में विद्या का 'मैं' – भक्त का 'मैं' रख देते हैं। हनुमान साकार और निराकार के दर्शन करने के बाद सेव्य-सेवक का भाव लेकर, भक्त का भाव लेकर रहते थे। उन्होंने श्रीरामचन्द्र से कहा था, 'राम, कभी सोचता हूँ तुम