श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
परिच्छेद ८९
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परिच्छेद ८९
प्रवृत्ति या निवृत्ति?
(१)
दक्षिणेश्वर में राम, बाबूराम आदि भक्तों के संग में
श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर मन्दिर में, अपने उसी कमरे में छोटी खाट पर भक्तों के साथ बैठे हैं। दिन के ग्यारह बजे होंगे, अभी उन्होंने भोजन नहीं किया।
कल शनिवार को श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ श्रीयुत अधर सेन के यहाँ गये थे। नाम-संकीर्तन के महोत्सव द्वारा भक्तों का जीवन सफल कर आये थे। आज यहाँ श्यामदास का कीर्तन होगा। श्रीरामकृष्ण को कीर्तनानन्द में देखने के लिए बहुत से भक्तों का समागम हो रहा है।
पहले बाबूराम, मास्टर, श्रीरामपुर के ब्राह्मण, मनोमोहन, भवनाथ, किशोरीलाल आये; फिर चुनीलाल, हरिपद, दोनों मुखर्जी भ्राता, राम, सुरेन्द्र, तारक, अधर और निरंजन आये। लाटू, हरीश और हाजरा आजकल दक्षिणेश्वर में ही रहते हैं। श्रीयुत रामलाल काली की पूजा करते हैं और श्रीरामकृष्ण की भी देखरेख रखते हैं। श्रीयुत राम चक्रवर्ती पर विष्णुमन्दिर की पूजा का भार है। लाटू और हरीश, दोनों श्रीरामकृष्ण की सेवा करते हैं। आज रविवार है, ७ सितम्बर, १८८४।
मास्टर के आकर प्रणाम करने पर श्रीरामकृष्ण ने पूछा, नरेन्द्र नहीं आया ?
उस दिन नरेन्द्र नहीं आ सके। श्रीरामपुर के ब्राह्मण, रामप्रसाद के गाने की किताब लेते आये हैं और उसी पुस्तक से गाने पढ़-पढ़कर श्रीरामकृष्ण को सुना रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – हाँ पढ़ो।
ब्राह्मण एक गीत पढ़कर सुनाने लगे। उसमें लिखा था – माँ वस्त्र धारण करो।
श्रीरामकृष्ण – यह सब रहने दो, विकट गीत। ऐसा कोई गीत पढ़ो जिसमें भक्ति हो।
ब्राह्मण – कौन कहे कि काली कैसी है, षड्दर्शनों को भी जिसके दर्शन नहीं होते।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – कल अधर सेन के यहाँ भावावस्था में एक ही तरह बैठे रहने के कारण पैरों में दर्द होने लगा था। इसीलिए बाबूराम को ले जाया करता हूँ।
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सहृदय है।
यह कहकर श्रीरामकृष्ण गाने लगे –
“ऐ सखि री, मैं अपना हृदय किसके पास खोलूँ – मुझे बोलना मना जो है। बिना किसी ऐसे को पाये जो मेरी व्यथा समझ सके, मैं तो मरी जा रही हूँ। केवल उसकी आँखों में आँखें डालकर मुझे अपने हृदय के प्रेमी का मिलन प्राप्त हो जायगा – परन्तु ऐसा तो कोई विरला ही होता है जो आनन्दसागर में निरन्तर बहता रहे।
“ये सब बाउलों (एक सम्प्रदाय) के गीत हैं।
“शाक्त मत में सिद्ध को कौल कहते हैं, वेदान्त के मत से परमहंस कहते हैं। बाउल-वैष्णवों के मत में साईं कहते हैं – साईं अन्तिम सीमा है।
“बाउल जब सिद्ध हो जाता है तब साईं होता है। तब सब अभेद हो जाता है। आधी माला गौ के हाड़ों की और आधी तुलसी की पहनता है। 'हिन्दुओं का नीर और मुसलमानों का पीर' बन जाता है।
“साईं जो होते हैं, वे अलख जगाया करते हैं। इसे वैदिक मत से ब्रह्म कहते हैं; वे लोग कहते हैं अलख। जीवों के सम्बन्ध में कहते हैं, अलख से आते हैं और अलख में जाते हैं। अर्थात् जीवात्मा अव्यक्त से आता है और अव्यक्त में ही लीन हो जाता है।
“वे लोग पूछते हैं, हवा की खबर जानते हो?
“अर्थात् कुण्डलिनी के जागने पर, इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना के भीतर से जो महावायु चढ़ती है उसकी खबर है?
“पूछते हैं, किस पैठ में हो? – छः पैठ – छहों चक्र हैं।
“अगर कोई कहे कि पांचवें में है, तो समझना चाहिए कि विशुद्ध चक्र तक मन की पहुँच है।
(मास्टर से) “तब निराकार के दर्शन होते हैं, जैसा गीत में है।”
यह कहकर श्रीरामकृष्ण कुछ स्वर करके कह रहे हैं – “उसके ऊर्ध्व भाग में कमल आकाश है, उस आकाश के अवरुद्ध हो जाने पर सब कुछ आकाश हो जाता है।
“एक बाउल आया था। मैंने उससे पूछा, 'क्या तुम्हारा रस का काम हो गया? – कड़ाही उतर गयी?' रस को जितना ही जलाओगे, उतना ही Refine (साफ) होगा। पहले रहता है ईख का रस – फिर होती है राब – फिर उसे जलाओ – तो होती है चीनी – और फिर मिश्री। धीरे धीरे और भी साफ हो रहा है।
“कड़ाही कब उतरेगी, अर्थात् साधना की समाप्ति कब होगी? – जब इन्द्रियाँ जीत ली जायेंगी। जैसे जोंक पर नमक छोड़ने से वे आप ही छूटकर गिर जाती हैं वैसे ही इन्द्रियाँ भी शिथिल हो जायेंगी। स्त्री के साथ रहता है, पर वह रमण नहीं करता।
“उनमें बहुत से लोग राधातन्त्र के मत से चलते हैं। पाँचों तत्त्व लेकर साधना करते
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हैं – पृथ्वीतत्त्व, जलतत्त्व, अग्नितत्त्व, वायुतत्त्व, आकाशतत्त्व, – मल, मूत्र, रज, वीर्य, ये सब तत्त्व ही हैं। ये साधनाएँ बड़ी घृणित हैं; जैसे पाखाने के भीतर से घर में प्रवेश करना।
“एक दिन मैं दालान में भोजन कर रहा था। घोषपाड़ा के मत का एक आदमी आया। आकर कहने लगा – ‘तुम स्वयं खाते हो या किसी को खिलाते हो?’ इसका यह अर्थ है जो सिद्ध होता है, वह अन्तर में ईश्वर देखता है।
“जो लोग इस मत से सिद्ध होते हैं, वे दूसरे मत के लोगों को ‘जीव’ कहते हैं। विजातीय मनुष्यों के सामने बातचीत नहीं करते। कहते हैं, यहाँ ‘जीव’ हैं!
“उस देश में मैंने इस मत को माननेवाली एक स्त्री देखी है। उसका नाम सरी (सरस्वती) पाथर है। इस मत के लोग आपस में एक दूसरे के यहाँ तो भोजन करते हैं, परन्तु दूसरे मत वालों के यहाँ नहीं खाते। मल्लिक घरानेवालों ने सरी पाथर के यहाँ तो भोजन किया, परन्तु हृदय के यहाँ नहीं खाया। कहते हैं, ये सब ‘जीव’ हैं! (सब हँसते हैं।)
“मैं एक दिन उसके यहाँ हृदय के साथ घूमने गया था। तुलसी के पेड़ खूब लगाये हैं। उसने चना-चिउड़ा दिया, मैंने थोड़ा सा खाया, हृदय तो बहुत सा खा गया – फिर बीमार भी पड़ा।
“वे लोग सिद्धावस्था को सहज अवस्था कहते हैं। एक दर्जे के आदमी हैं। वे ‘सहज सहज’ चिल्लाते फिरते हैं। वे सहज अवस्था के दो लक्षण बतलाते हैं। एक यह कि देह में कृष्ण की गन्ध भी न रहेगी और दूसरा यह कि पद्म पर भौंरा बैठेगा, परन्तु मधुपान न करेगा। कृष्ण की गन्ध भी न रह जायगी, इसका अर्थ यह है कि ईश्वर के भाव सब अन्तर में ही रहेंगे, बाहर कोई लक्षण प्रकट न होगा – नाम का जप भी न करेगा। दूसरे का अर्थ है, कामिनी और कांचन की आसक्ति का त्याग – जितेन्द्रियता।
“वे लोग ठाकुर-पूजन, मूर्तिपूजन, यह सब पसन्द नहीं करते – जीता-जागता आदमी चाहते हैं। इसीलिए उनके दर्जे के आदमियों को कर्ताभजा कहते हैं। कर्ताभजा अर्थात् जो लोग कर्ता को – गुरु को ईश्वर समझते और इसी भाव से उनकी पूजा करते हैं।”
(२)
श्रीरामकृष्ण और सर्वधर्मसमन्वय
श्रीरामकृष्ण – देखा, कितने तरह के मत हैं। जितने मत उतने पथ। अनन्त मत हैं और अनन्त पथ हैं।
भवनाथ – अब उपाय क्या है?
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श्रीरामकृष्ण – एक को बलपूर्वक पकड़ना पड़ता है। छत पर जाने की चाह है, तो जीने से भी चढ़ सकते हो; बाँस की सीढ़ी लगाकर भी चढ़ सकते हो; रस्सी की सीढ़ी 'लगाकर, सिर्फ रस्सी पकड़कर या केवल एक बाँस के सहारे, किसी भी तरह से छत पर पहुँच सकते हो, परन्तु एक पैर इसमें और दूसरा उसमें रखने से नहीं होता। एक को दृढ़ भाव से पकड़े रहना चाहिए। ईश्वरलाभ करने की इच्छा हो तो एक ही रास्ते पर चलना चाहिए।
“और दूसरे मतों को भी एक एक मार्ग समझना। यह भाव न हो कि मेरा ही मार्ग ठीक है, और सब झूठ हैं; द्वेष न हो।
“अच्छा, मैं किस मार्ग का हूँ? केशव सेन कहता था, आप हमारे मत के हैं – निराकार में आ रहे हैं। शशधर कहता है, ये हमारे हैं; विजय भी कहता है, ये हमारे मत के हैं।”
श्रीरामकृष्ण सभी मार्गों से साधना करके ईश्वर के निकट पहुँचे थे; इसलिए सब लोग उन्हें अपने ही मत का आदर्श मानते थे।
श्रीरामकृष्ण मास्टर आदि दो-एक भक्तों के साथ पंचवटी की ओर जा रहे हैं – हाथ मुँह धोयेंगे। दिन के बारह बजे का समय है। अब ज्वार आनेवाली है। देखने के लिए श्रीरामकृष्ण पंचवटी के रास्ते पर प्रतीक्षा कर रहे हैं।
भक्तों से कह रहे हैं – “ज्वार और भाटा कितने आश्चर्य के विषय हैं!
“परन्तु एक बात देखो, समुद्र के पास ही नदियों में ज्वार-भाटा होते हैं। परन्तु समुद्र से बहुत दूर होने पर उसी नदी में ज्वार-भाटा नहीं होता, बल्कि एक ही ओर बहाव रहता है। इसका क्या अर्थ? – इस भाव का अपने आध्यात्मिक जीवन पर आरोप करो। जो लोग ईश्वर के बहुत पास पहुँच जाते हैं, उन्हीं में भक्ति और भाव होता है। और, किसी किसी को – ईश्वरकोटि को – महाभाव, प्रेम, यह सब होता है।
(मास्टर से) “अच्छा, ज्वार-भाटा क्यों होते हैं?”
मास्टर – अंग्रेजी ज्योतिष-शास्त्र में लिखा है, सूर्य और चन्द्र के आकर्षण से ऐसा होता है।
यह कहकर मास्टर मिट्टी में रेखाएँ खींचकर सूर्य और चन्द्र की गति बतलाने लगे। थोड़ी देर तक देखकर श्रीरामकृष्ण ने कहा – बस रहने दो, मेरा माथा घूमने लगा।
बात हो ही रही थी कि ज्वार आने की आवाज होने लगी। देखते ही देखते जलोच्छ्वास का घोर शब्द होने लगा। ठाकुरमन्दिर की तटभूमि में टकराता हुआ बड़े वेग से पानी उत्तर की ओर चला गया। श्रीरामकृष्ण एक नजर से देख रहे हैं। दूर की नाव देखकर बालक की तरह कहने लगे, देखो देखो – अब उस नाव की क्या हालत होती है!
श्रीरामकृष्ण मास्टर से बातचीत करते हुए पंचवटी के बिलकुल नीचे पहुँच गये।
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५९४ श्रीरामकृष्णवचनामृत ७ सितम्बर, १८८४.
उनके हाथ में एक छाता था, उसे पंचवटी के चबूतरे पर रख दिया। नारायण को वे साक्षात् नारायण देखते हैं इसीलिए बहुत प्यार करते हैं। नारायण स्कूल में पढ़ता है। इस समय श्रीरामकृष्ण उसी की बातचीत कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – नारायण को देखा है तुमने? कैसा स्वभाव है! क्या लड़के, बच्चे, बूढ़े सब से मिलता है। विशेष शक्ति के बिना यह बात नहीं होती। और सब लोग उसे प्यार करते हैं। अच्छा, क्या वह यथार्थ ही सरल है।
मास्टर – जी हाँ, जान तो ऐसा ही पड़ता है।
श्रीरामकृष्ण – सुना, तुम्हारे यहाँ जाता है।
मास्टर – जी हाँ, दो-एक बार आया था।
श्रीरामकृष्ण – क्या एक रुपया तुम उसे दोगे या काली से कहूँ?
मास्टर – अच्छा तो है, मैं ही दे दूँगा।
श्रीरामकृष्ण – बड़ा अच्छा है। जो ईश्वर के अनुरागी हैं उन्हें देना अच्छा है। इससे धन का सदुपयोग होता है। सब रुपये संसार को सौंपने से क्या होगा?
किशोरीलाल के लड़के-बच्चे हो गये हैं। वेतन कम पाता है इससे पूरा नहीं पड़ता। श्रीरामकृष्ण मास्टर से कह रहे हैं – “नारायण कहता था, किशोरीलाल के लिए एक नौकरी ठीक कर दूँगा। नारायण को यह बात याद दिलाना।”
मास्टर पंचवटी में खड़े हुए हैं। श्रीरामकृष्ण कुछ देर बाद झाऊतल्ले से लौटे। मास्टर से कह रहे हैं – जरा बाहर एक चटाई बिछाने के लिए कहो, मैं थोड़ी देर बाद जाता हूँ, लेटूँगा।
श्रीरामकृष्ण कमरे में पहुँचकर कह रहे हैं – तुममें से किसी को छाता ले आने की बात याद नहीं रहीं। (सब हँसते हैं।) जल्दबाज आदमी पास की चीज भी नहीं देखते। एक आदमी एक दूसरे के यहाँ कोयले में आग सुलगाने के लिए गया था, और इधर उसके हाथ में लालटेन जल रही थी।
“एक आदमी अंगौछा खोज रहा था, अन्त में वह उसी के कन्धे पर पड़ा हुआ मिला!”
श्रीरामकृष्ण के लिए काली का अन्न-भोग लाया गया। श्रीरामकृष्ण प्रसाद पायेंगे। दिन के एक बजे का समय होगा। वे भोजन करके जरा विश्राम करेंगे। भक्तगण कमरे में बैठे ही रहे। समझाने पर वे बाहर जाकर बैठे। हरीश, निरंजन और हरिपद पाकशाला में प्रसाद पायेंगे। श्रीरामकृष्ण हरीश से कह रहे हैं, अपने लिए थोड़ा सा अमरस लेते जाना।
श्रीरामकृष्ण विश्राम करने लगे। बाबूराम से कहा, “बाबूराम, जरा मेरे पास आ।” बाबूराम पान लगा रहे थे, कहा, “मैं पान लगा रहा हूँ।”
श्रीरामकृष्ण – रख उधर, फिर पान लगाना।
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श्रीरामकृष्ण विश्राम कर रहे हैं। इधर पंचवटी में और बकुल के पेड़ के नीचे कुछ भक्त बैठे हुए हैं - दोनों मुखर्जी भाई, चुनीलाल, हरिपद, भवनाथ और तारक। तारक वृन्दावन से अभी अभी लौटे हैं। भक्तगण उनसे वृन्दावन की बातें सुन रहे हैं। तारक नित्यगोपाल के साथ अब तक वृन्दावन में थे।
(३)
कीर्तनानन्द में
श्रीरामकृष्ण जरा विश्राम कर रहे हैं। श्यामदास माथुर अपने आदमियों को लेकर कीर्तन गा रहे हैं - 'सुखमय सायर (सागर) मरुभूमि भइल, जलद निहारइ चातकि मरि गइला।' श्रीराधा का यह विरह-वर्णन हो रहा है। सुनकर श्रीरामकृष्ण को भावावेश हो रहा है। वे छोटी खाट पर बैठे हुए हैं। बाबूराम, निरंजन, राम, मनोमोहन, मास्टर, सुरेन्द्र, भवनाथ आदि भक्त जमीन पर बैठे हैं। गाना जम नहीं रहा है।
कोन्नगर के नवाई चैतन्य से श्रीरामकृष्ण कीर्तन करने के लिए कह रहे हैं। नवाई मनोमोहन के चाचा हैं। पेन्शन लेकर कोन्नगर में श्रीगंगाजी के तट पर भजन-साधन करते हैं। श्रीरामकृष्ण का प्रायः दर्शन करने आते हैं।
नवाई उच्च कण्ठ से संकीर्तन कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण आसन छोड़कर नृत्य करने लगे। साथ ही नवाई और भक्तगण उन्हें घेरकर नृत्य करने लगे। कीर्तन खूब जम गया। महिमाचरण भी श्रीरामकृष्ण के साथ नृत्य कर रहे हैं।
कीर्तन हो जाने पर श्रीरामकृष्ण अपने आसन पर बैठे। हरिनाम के बाद अब आनन्दमयी का नाम ले रहे हैं। श्रीरामकृष्ण भावपूर्ण हैं। नाम लेते हुए ऊर्ध्वदृष्टि हो रहे हैं।
गाना - "माँ, आनन्दमयी होकर मुझे निरानन्द न करना।"
गाना - "उसका चिन्तन करने पर भाव का उदय होता है। जैसा भाव होता है, फल भी वैसा ही मिलता है। इसकी जड़ विश्वास है। जो काली का भक्त है, उसे तो जीवन्मुक्त कहना चाहिए। वह सदा ही आनन्द में रहता है। अगर उनके चरणरूपी सुधा-सरोवर में चित्त लगा रहा तो समझना चाहिए, उसके लिए पूजा, जप, होम, बलि, ये सब कुछ भी नहीं हैं।"
श्रीरामकृष्ण ने तीन-चार गाने और गाये। अन्त में जो पद उन्होंने गाया, उसका भाव यह है - "मन! आदरणीया श्यामा माँ को यत्नपूर्वक हृदय में रखना। तू देख और मैं देखूँ, कोई दूसरा उन्हें न देखने पाये।"
यह गाना गाते हुए श्रीरामकृष्ण जैसे खड़े हो गये। माता के प्रेम में पागल हो गये। 'आदरणीया श्यामा माँ को हृदय में रखना' यह इतना अंश बार बार भक्तों को गाकर सुना रहे हैं। शराब पीकर मतवाले हुए की तरह सब को गाकर सुना रहे हैं। श्रीरामकृष्ण गाते
५९६ श्रीरामकृष्णवचनामृत ७ सितम्बर, १८८४
हुए बहुत झूम रहे हैं। यह देख निरंजन उन्हें पकड़ने के लिए बढ़े। श्रीरामकृष्ण ने मधुर स्वरों में कहा – 'मत छू।' श्रीरामकृष्ण को नाचते हुए देखकर भक्तगण उठकर खड़े हो गये। श्रीरामकृष्ण मास्टर का हाथ पकड़कर कहते हैं – 'नाच।'
श्रीरामकृष्ण अपने आसन पर बैठे हुए हैं। भाव की पूर्ण मात्रा है – बिलकुल मतवाले हैं।
भाव का कुछ उपशम होने पर कह रहे हैं – ॐ ॐ ॐ काली! भक्तों में से कितने ही खड़े हैं। महिमाचरण खड़े हुए श्रीरामकृष्ण को पंखा झुल रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (महिमाचरण से) – आप लोग बैठिये।
“आप वेद से जरा कुछ सुनाइये।”
महिमाचरण सुना रहे हैं – जय यज्वमान आदि; फिर वे महानिर्वाण-तन्त्र की स्तुति का पाठ करने लगे –
“ॐ नमस्ते सते ते जगत्कारणाय नमस्ते चिते सर्वलोकाश्रयाय। नमोऽद्वैततत्त्वाय मुक्तिप्रदाय, नमो ब्रह्मणे व्यापिने शाश्वताय॥ त्वमेकं शरण्यं त्वमेकं वरेण्यम् त्वमेकं जगत्पालकं स्वप्रकाशम्। त्वमेकं जगत्कर्तृपातृप्रहर्तृ त्वमेकं परं निश्चलं निर्विकल्पम्॥ भयानां भयं भीषणं भीषणानाम् गतिः प्राणिनां पावनं पावनानाम्। महोच्चैः पदानां नियन्तृ त्वमेकम् परेषां परं रक्षणं रक्षणानाम्॥ वयं त्वां स्मरामो वयं त्वां भजामो वयं त्वां जगत्साक्षिरूपं नमामः॥ सदेकं निधानं निरालम्बमीशम् भवाम्भोधिपोतं शरण्यं व्रजामः॥”
श्रीरामकृष्ण ने हाथ जोड़कर स्तुति सुनी। पाठ हो जाने पर हाथ जोड़कर उन्होंने प्रणाम किया। भक्तों ने भी प्रणाम किया।
कलकत्ते से अधर आये। श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – आज खूब आनन्द रहा। महिम चक्रवर्ती भी इधर झुक रहा है। कीर्तन में खूब आनन्द रहा – क्यों?
मास्टर – जी हाँ।
महिमाचरण ज्ञानचर्चा करते हैं। आज उन्होंने कीर्तन किया है, और नाचे भी हैं। श्रीरामकृष्ण इस बात पर आनन्द प्रकट कर रहे हैं।
शाम हो रही है। भक्तों में से बहुतेरे श्रीरामकृष्ण को प्रणाम कर बिदा हुए।
(४)
प्रवृत्ति या निवृत्ति? अधर का कर्म
शाम हो गयी है। दक्षिणवाले लम्बे बरामदे में और पश्चिम के गोल बरामदे में बत्ती
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जला दी गयी। कुछ देर बाद चन्द्रोदय हुआ। मन्दिर का आँगन, बगीचे के रास्ते, गंगातट, पंचवटी, पेड़ों का ऊपरी हिस्सा, सब कुछ चाँदनी में हँस रहे थे।
श्रीरामकृष्ण अपने आसन पर बैठे हुए भावावेश में माता का स्मरण कर रहे हैं।
अधर आकर बैठे। कमरे में मास्टर और निरंजन भी हैं। श्रीरामकृष्ण अधर के साथ बातचीत कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – अजी, तुम अब आये! कितना कीर्तन और नृत्य हो गया। श्यामदास का कीर्तन था – राम के उस्ताद का। परन्तु मुझे बहुत अच्छा न लगा। उठने की इच्छा भी नहीं हुई। उस आदमी की बात फिर पीछे से मालूम हुई। गोपीदास के साथवाले ने कहा, मेरे सिर पर जितने बाल हैं, उतनी उसकी रखेलियाँ हैं! (सब हँसते हैं।) क्या तुम्हारा काम हुआ?
अधर डिप्टी हैं। तीन सौ तनख्वाह पाते हैं। उन्होंने कलकत्ता म्यूनिसिपल्टी के वाइस चेअरमैन के लिए अर्जी दी थी। वहाँ हजार रुपये महीने की तनख्वाह है। इसके लिए अधर कलकत्ते के बहुत बड़े-बड़े आदमियों से मिले थे।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर और निरंजन से) – हाजरा ने कहा था, अधर का काम हो जायगा, तुम जरा माँ से कहो। अधर ने भी कहा था। मैंने माँ से कहा था, 'माँ, यह तुम्हारे यहाँ आयाजाया करता है, अगर उसे जगह मिलनी हो तो दे दो –' परन्तु इसके साथ ही माँ से मैंने यह भी कहा था कि माँ, इसकी बुद्धि कितनी हीन है? ज्ञान और भक्ति की प्रार्थना न करके तुम्हारे पास यह सब चाहता है!
(अधर से) “क्यों नीच प्रकृति के आदमियों के यहाँ इतना चक्कर मारते फिरे? इतना देखा और समझा, सातों काण्ड रामायण पढ़कर सीता किसकी भार्या थी, इतना भी नहीं समझे?”
अधर – संसार में रहने पर इन सब के बिना किये काम भी नहीं चलता। आपने तो मना भी नहीं किया था।
श्रीरामकृष्ण – निवृत्ति ही अच्छी है, प्रवृत्ति अच्छी नहीं। इस अवस्था के बाद मुझे तनख्वाह के बिल पर दस्तखत करने के लिए कहा था! मैंने कहा, 'यह मुझसे न होगा। मैं तो कुछ चाहता नहीं। तुम्हारी इच्छा हो तो किसी दूसरे को दे दो।'
“एकमात्र ईश्वर का दास हूँ – और किसका दास बनूँ?
“मुझे खाने की देर होती थी, इसलिए मल्लिक ने भोजन पकाने के लिए एक ब्राह्मण नौकर रख दिया था। एक महीने में एक रुपया दिया था। तब मुझे लज्जा हुई, उसके बुलाने से ही दौड़ना पड़ता था! – खुद जाऊँ वह बात दूसरी है।
“सांसारिक जीवन व्यतीत करने में मनुष्य को न जाने कितने नीच आदमियों को खुश करना पड़ता है, और उसके अतिरिक्त और भी न जाने क्या क्या करना पड़ता है।
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५९८ श्रीरामकृष्णवचनामृत ७ सितम्बर, १८८४
“ऊँची अवस्था प्राप्त होने के पश्चात् तरह तरह के दृश्य मुझे दीख पड़ने लगे। तब माँ से कहा, 'माँ यहीं से मन को मोड़ दो जिससे मुझे धनी लोगों की खुशामद न करनी पड़े।
“जिसका काम कर रहे हो, उसी का करो। लोग सौ-पचास रुपये के लिए जी देते हैं, तुम तो तीन सौ महीना पाते हो। उस देश में मैंने डिप्टी देखा था, ईश्वर घोषाल को। सिर पर टोपी – गुस्सा नाक पर; मैंने लड़कपन में उसे देखा था; डिप्टी कुछ कम थोड़े ही होता है!
“जिसका काम कर रहे हो, उसी का करते रहो। एक ही आदमी की नौकरी से जी ऊब जाता है, फिर पाँच आदमियों की नौकरी?
“एक स्त्री किसी मुसलमान को देखकर मुग्ध हो गयी थी, उसने उसे मिलने के लिए बुलाया। मुसलमान आदमी अच्छा था, प्रकृति का साधु था। उसने कहा – 'मैं पेशाब करूँगा, अपनी हण्डी ले आऊँ।' उस स्त्री ने कहा – 'हण्डी तुम्हें यहीं मिल जायगी, मैं दूँगी तुम्हें हण्डी।' उसने कहा – 'ना, सो बात नहीं होगी! जिस हण्डी के पास मैंने एक दफे शर्म खोई, इस्तेमाल तो मैं उसी का करूँगा – नयी हण्डी के पास दोबारा बेईमान न हो सकूँगा।' यह कहकर वह चला गया। औरत की भी अक्ल दुरुस्त हो गयी; हण्डी का मतलब वह समझ गयी।”
पिता का वियोग हो जाने पर नरेन्द्र को बड़ी तकलीफ हो रही है। माता और भाइयों के भोजन-वस्त्र के लिए वे नौकरी की तलाश कर रहे हैं। विद्यासागर के बहूबाजार वाले स्कूल में कुछ दिनों तक उन्होंने प्रधान शिक्षक का काम किया था।
अधर – अच्छा, नरेन्द्र कोई काम करेगा या नहीं?
श्रीरामकृष्ण – हाँ, वह करेगा। माँ और भाई जो हैं।
अधर – अच्छा, नरेन्द्र की जरूरत पचास रुपये से भी पूरी हो सकती है और सौ रुपये से भी उसका काम चल सकता है। अब अगर उसे सौ रुपये मिलें तो वह काम करेगा या नहीं?
श्रीरामकृष्ण – विषयी लोग धन का आदर करते हैं। वे सोचते हैं, ऐसी चीज और दूसरी न होगी। शम्भू ने कहा – 'यह सारी सम्पत्ति ईश्वर के श्रीचरणों में सौंप जाऊँ, मेरी बड़ी इच्छा है।' वे विषय थोड़े ही चाहते हैं? वे तो ज्ञान, भक्ति, विवेक, वैराग्य यह सब चाहते हैं।
“जब श्रीठाकुर-मन्दिर से गहने चोरी चले गये, तब सेजो बाबू ने कहा – 'क्यों महाराज! तुम अपने गहने न बचा सके! हंसेश्वरी देवी को देखो, किस तरह अपने गहने बचा लिये थे!'
“सेजो बाबू ने मेरे नाम एक ताल्लुका लिख देने के लिए कहा था। मैंने काली-
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मन्दिर से उनकी बात सुनी। सेजो बाबू और हृदय एक साथ सलाह कर रहे थे। मैंने सेजो बाबू से जाकर कहा, 'देखो, ऐसा विचार मत करो। इसमें मेरा बड़ा नुकसान है।'
अधर – जैसी बात आप कह रहे हैं, सृष्टि के आरम्भ से अब तक ज्यादा से ज्यादा छः ही सात ऐसे हुए होंगे।
श्रीरामकृष्ण – क्यों, त्यागी हैं क्यों नहीं? ऐश्वर्य का त्याग करने से ही लोग उन्हें समझ जाते हैं। फिर ऐसे भी त्यागी पुरुष हैं, जिन्हें लोग नहीं जानते। क्या उत्तर भारत में ऐसे पवित्र पुरुष नहीं हैं?
अधर – कलकत्ते में एक को जानता हूँ, वे देवेन्द्र ठाकुर हैं।
श्रीरामकृष्ण – कहते क्या हो! – उसने जैसा भोग किया वैसा बहुत कम आदमियों को नसीब हुआ होगा। जब सेजो बाबू के साथ मैं उसके वहाँ गया, तब देखा छोटे छोटे उसके कितने ही लड़के थे – डाक्टर आया हुआ था, नुस्खा लिख रहा था। जिसके आठ लड़के और ऊपर से लड़कियाँ हैं, वह ईश्वर की चिन्ता न करे तो और कौन करेगा? इतने ऐश्वर्य का भोग करके भी अगर वह ईश्वर की चिन्ता न करता तो लोग कितना धिक्कारते!
निरंजन – द्वारकानाथ ठाकुर का सब कर्ज उन्होंने चुका दिया था।
श्रीरामकृष्ण – चल, रख ये सब बातें। अब जला मत। शक्ति के रहते भी जो बाप का किया हुआ कर्ज नहीं चुकाता, वह भी कोई आदमी है?
"हाँ, बात यह है कि संसारी लोग बिलकुल डूबे रहते हैं, उनकी तुलना में वह बहुत अच्छा था – उन्हें शिक्षा मिलेगी।
"यथार्थ त्यागी भक्त और संसारी भक्त में बड़ा अन्तर है। यथार्थ संन्यासी – सच्चा त्यागी भक्त – मधुमक्खी की तरह है। मधुमक्खी फूल को छोड़ और किसी चीज पर नहीं बैठती। मधु को छोड़ और किसी चीज का ग्रहण नहीं करती। संसारी भक्त दूसरी मक्खियों के समान होते हैं जो बर्फियों पर भी बैठती हैं और सड़े घावों पर भी। अभी देखो तो वे ईश्वरी भावों में मग्न हैं, थोड़ी देर में देखो तो कामिनी और कांचन को लेकर मतवाले हो जाते हैं।
"सच्चा त्यागी भक्त चातक के समान होता है। चातक स्वाति नक्षत्र के जल को छोड़ और पानी नहीं पीता, सात समुद्र और तेरह नदियाँ भले ही भरीं रहें। वह दूसरा पानी हरगिज नहीं पी सकता। सच्चा भक्त कामिनी और कांचन को छू भी नहीं सकता, पास भी नहीं रख सकता, क्योंकि कहीं आसक्ति न आ जाय।"
(५)
चैतन्यदेव, श्रीरामकृष्ण और लोकमान्यता
अधर – चैतन्य ने भी भोग किया था।
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| ६०० | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ७ सितम्बर, १८८४ |
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श्रीरामकृष्ण – (चौंककर) – क्या भोग किया था?
अधर – उतने बड़े पण्डित थे, कितना मान था!
श्रीरामकृष्ण – दूसरों की दृष्टि में वह मान था, उनकी दृष्टि में कुछ भी नहीं था। "मुझे तुम जैसा डिप्टी माने अथवा यह छोटा निरंजन, मेरे लिए दोनों एक हैं, सच कहता हूँ। एक धनी आदमी मेरे वश में रहे ऐसा भाव मेरे मन में नहीं पैदा होता। मनोमोहन ने कहा है, 'सुरेन्द्र कहता था, राखाल इनके (श्रीरामकृष्ण के) पास रहता है, इसका दावा हो सकता है' मैंने कहा, कौन है रे सुरेन्द्र? जिसकी दरी और तकिया यहाँ है, और जो दस रुपया महीना देता है, उसकी इतनी हिम्मत कि वह ऐसी बातें कहे?"
अधर – क्या दस रुपये प्रति महिना देते हैं?
श्रीरामकृष्ण – दस रुपये में दो महीने का खर्च चलता है। कुछ भक्त यहाँ रहते हैं, वह भक्तों की सेवा के लिए खर्च देता है। यह उसी के लिए पुण्य है, इसमें मेरा क्या है? मैं राखाल और नरेन्द्र आदि को प्यार करता हूँ तो क्या किसी अपने लाभ के लिए?
मास्टर – यह प्यार माँ के प्यार की तरह है।
श्रीरामकृष्ण – माँ फिर भी इस आशा से बहुत कुछ करती है कि नौकरी करके खिलायेगा। मैं जो इन्हें प्यार करता हूँ, इसका कारण यह है कि मैं इन्हें साक्षात् नारायण देखता हूँ – यह बात की बात नहीं है।
(अधर से) "सुनो, दिया जलाने पर कीड़ों की कमी नहीं रहती। उन्हें पा लेने पर फिर वे सब बन्दोबस्त कर देते हैं, कोई कमी नहीं रह जाती। वे जब हृदय में आ जाते हैं, तब सेवा करनेवाले बहुत इकट्ठे हो जाते हैं।
"एक कम उम्र का संन्यासी किसी गृहस्थ के यहाँ भिक्षा के लिए गया। वह जन्म से ही संन्यासी था। संसार की बातें कुछ न जानता था। गृहस्थ की एक युवती लड़की ने आकर भिक्षा दी। संन्यासी ने कहा, 'माँ, इसकी छाती पर कितने बड़े-बड़े फोड़े हुए हैं?' उस लड़की की माँ ने कहा, 'नहीं महाराज, इसके पेट से बच्चा होगा, बच्चे को दूध पिलाने के लिए ईश्वर ने इसे स्तन दिये हैं – उन्हीं स्तनों का दूध बच्चा पीयेगा।' तब संन्यासी ने कहा, 'फिर सोच किस बात की है? मैं अब क्यों भिक्षा माँगूँ? जिन्होंने मेरी सृष्टि की है, वे ही मुझे खाने को भी देंगे।'
"सुनो, जिस यार के लिए सब कुछ छोड़कर स्त्री चली आयी है, उससे मौका आने पर वह अवश्य कह सकती है कि तेरी छाती पर चढ़कर भोजन-वस्त्र लूँगी।
"न्यांगटा कहता था कि एक राजा ने सोने की थाली और सोने के गिलास में साधुओं को भोजन कराया था। काशी में मैंने देखा, बड़े-बड़े महन्तों का बड़ा मान है – कितने ही पश्चिम के अमीर हाथ जोड़े हुए उनके सामने खड़े थे और कह रहे थे – कुछ आज्ञा हो।
७ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद ८० | ६०१
| ७ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद ८० | ६०१ |
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“परन्तु जो सच्चा साधु है - यथार्थ त्यागी है, वह न तो सोने की थाली चाहता है और न मान। परन्तु यह भी है कि ईश्वर उनके लिए किसी बात की कमी नहीं रखते। उन्हें पाने के लिए प्रयत्न करते हुए जिसे जिस चीज की जरूरत होती है, वे पूरी कर देते हैं।
“आप हाकिम हैं - क्या कहूँ - जो कुछ अच्छा समझो, वही करो। मैं तो मूर्ख हूँ।”
अधर - (हँसते हुए, भक्तों से) - क्या ये मेरी परीक्षा ले रहे हैं?
श्रीरामकृष्ण - (सहास्य) - निवृत्ति ही अच्छी है। देखो न, मैंने दस्तखत नहीं किये। ईश्वर ही वस्तु हैं और सब अवस्तु।
हाजरा भक्तों के पास जमीन पर आकर बैठे। हाजरा कभी कभी ‘सोऽहम्-सोऽहम्’ किया करते हैं। वे लाटू आदि भक्तों से कहते हैं - ‘उनकी पूजा करके क्या होता है? उन्हीं की वस्तु उन्हें दी जाती है।’ एक दिन उन्होंने नरेन्द्र से भी यही बात कही थी। श्रीरामकृष्ण हाजरा से कह रहे हैं -
“लाटू से मैंने कहा था, कौन किसकी भक्ति करता है।”
हाजरा - भक्त आप ही अपने को पुकारता है।
श्रीरामकृष्ण - यह तो बड़ी ऊँची बात है। महाराज बलि से वृन्धावलि ने कहा था, तुम ब्रह्मण्य देव को क्या धन दोगे?
“तुम जो कुछ कहते हो, उसी के लिए साधन-भजन तथा उनके नाम और गुणों का कीर्तन है।
“अपने भीतर अगर दर्शन हो जायँ तब तो सब हो गया। उसके देखने के लिए ही साधना की जाती है। और उसी साधना के लिए शरीर है। जब तक सोने की मूर्ति नहीं ढल जाती तब तक मिट्टी के साँचे की जरूरत रहती है। सोने की मूर्ति के बन जाने पर मिट्टी का साँचा फेंक दिया जाता है। ईश्वर के दर्शन हो जाने पर शरीर का त्याग किया जा सकता है।
“वे केवल अन्तर में ही नहीं हैं, बाहर भी हैं। काली-मन्दिर में माँ ने मुझे दिखाया, सब कुछ चिन्मय है। माँ स्वयं सब कुछ बनी हैं - प्रतिमा, मैं, पूजा की चीजें, पत्थर - सब चिन्मय हैं।
“इसका साक्षात्कार करने के लिए ही साधन-भजन, नाम-गुण-कीर्तन आदि सब हैं। इसके लिए ही उनकी भक्ति करना है। वे लोग (लाटू आदि) अभी साधारण भावों को लेकर हैं - अभी उतनी ऊँची अवस्था नहीं हुई। वे लोग भक्ति लेकर हैं। और उनसे ‘सोऽहम्’ आदि बातें मत कहना।”
अधर और निरंजन जलपान करने के लिए बरामदे में गये। मास्टर श्रीरामकृष्ण के पास जमीन पर बैठे हुए हैं।
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| ६०२ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ७ सितम्बर, १८८४ |
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अधर – (सहास्य) – हम लोगों की इतनी बातें हो गयीं, ये (मास्टर) तो कुछ भी न बोले।
श्रीरामकृष्ण – केशव के दल का एक लड़का – वह चार परीक्षाएँ पास कर चुका था – सब को मेरे साथ तर्क करते हुए देखकर बस मुस्कराता था और कहता था, इनसे भी तर्क! मैंने केशव सेन के यहाँ एक बार और उसे देखा था, परन्तु तब उसका वह चेहरा न रह गया था।
विष्णुमन्दिर के पुजारी राम चक्रवर्ती श्रीरामकृष्ण के कमरे में आये। श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं – “देखो राम! तुमने क्या दयाल से मिश्री की बात कही है? – नहीं-नहीं, इसके कहने की जरूरत नहीं है। बड़ी बड़ी बातें हो गयी हैं।”
रात में श्रीरामकृष्ण काली के प्रसाद की दो-एक पूड़ियाँ तथा सूजी की खीर खाते हैं। श्रीरामकृष्ण जमीन पर, आसन पर प्रसाद पाने के लिए बैठे। पास ही मास्टर बैठे हुए हैं, लाटू भी कमरे में हैं। भक्तगण सन्देश तथा कुछ मिठाइयाँ ले आये थे। एक सन्देश लेते ही श्रीरामकृष्ण ने कहा, यह किसका सन्देश है? इतना कहकर खीरवाले कटोरे से निकालकर उन्होंने वह नीचे डाल दिया। (मास्टर और लाटू से) – “यह मैं सब जानता हूँ। आनन्द चैटर्जी का लड़का ले आया है जो घोषपाड़ा-वाली औरत के पास जाता है।”
लाटू ने एक दूसरी बर्फी देने के लिए पूछा।
श्रीरामकृष्ण – किशोरी लाया है।
लाटू – क्या इसे दूँ?
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – हाँ।
मास्टर अंग्रेजी पढ़े हुए हैं। श्रीरामकृष्ण उनसे कहने लगे –
“सब लोगों की चीजें नहीं खा सकता। क्या यह सब तुम मानते हो?”
मास्टर – देखता हूँ, सब धीरे धीरे मानना पड़ेगा।
श्रीरामकृष्ण – हाँ।
श्रीरामकृष्ण पश्चिमवाले गोल बरामदे में हाथ धोने के लिए गये। मास्टर हाथ पर पानी छोड़ रहे हैं।
शरत्काल है। चाँद निकला हुआ है। आकाश निर्मल है। भागीरथी का हृदय स्वच्छ दर्पण के समान झलक रहा है; भांटे का समय है, भागीरथी दक्षिण की ओर बह रही हैं; मुँह धोते हुए श्रीरामकृष्ण मास्टर से कह रहे हैं – ‘तो नारायण को रुपया दोगे न?’ मास्टर – ‘जी हाँ, जैसी आज्ञा, जरूर दूँगा।’
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परिच्छेद ९०
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परिच्छेद ९०
साधना तथा साधुसंग
(१)
'ज्ञान, अज्ञान के परे चले जाओ।' शशधर का शुष्क ज्ञान
श्रीरामकृष्ण दोपहर के भोजन के बाद अपने कमरे में विश्राम कर रहे हैं। कुछ भक्त भी बैठे हुए हैं। आज नरेन्द्र, भवनाथ आदि भक्त कलकते से आये हैं। दोनों मुखर्जी भाई, ज्ञानबाबू, छोटे गोपाल, बड़े काली, ये भी आये हैं। तीन-चार भक्त कोन्नगर से आये हुए हैं। उन्हें बुखार आया था, सूचना आयी थी। आज रविवार है, १४ सितम्बर, १८८४।
पिता का स्वर्गवास हो जाने पर नरेन्द्र अपनी माँ और भाइयों की चिन्ता में पड़कर बड़े व्याकुल हैं। वे कानून की परीक्षा के लिए तैयारी कर रहे हैं।
ज्ञानबाबू चार परीक्षाएँ पास कर चुके हैं। वे सरकारी नौकरी करते हैं। दस-ग्यारह बजे के लगभग आये हैं।
श्रीरामकृष्ण – (ज्ञानबाबू को देखकर) – क्यों जी, एकाएक ज्ञानोदय, यह क्या?
ज्ञान – (सहास्य) – जी, बड़े भाग्य से ज्ञानोदय होता है।
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – तुम ज्ञानी होकर भी अज्ञानी क्यों हो? हाँ, मैं समझा, जहाँ ज्ञान है, वहीं अज्ञान है! वशिष्ठ देव इतने ज्ञानी थे, परन्तु लड़कों के शोक से वे भी रोये थे। अतएव तुम ज्ञान और अज्ञान के पार हो जाओ। पैरों में अज्ञान का काँटा लग गया है, उसे निकालने के लिए ज्ञानरूपी काँटे की जरूरत है। निकल जाने पर दोनों काँटे फेंक देना चाहिए।
"ज्ञान कहता है, यह संसार धोखे की टट्टी है; और जो ज्ञान और अज्ञान के पार चले गये हैं, वे कहते हैं, यह आनन्द की कुटिया है। वह देखता है, ईश्वर ही जीव-जगत् और चौबीसों तत्त्व हुए हैं।
"उन्हें पा लेने पर फिर संसार में रहा जा सकता है। तब आदमी निर्लिप्त हो सकता है। उस देश में बढ़ई की औरतों को मैंने देखा है, ढेंकी में चूड़ा कूटती हैं, एक हाथ से धान चलाती हैं, दूसरे से बच्चे को दूध पिलाती हैं, साथ ही खरीददारों से बातचीत भी करती हैं, कहती हैं तुम्हारे ऊपर दो आने उधार हैं, दे जाना। परन्तु उनका बारह आना मन
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६०४ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १४ सितम्बर, १८८४
हाथ पर रहता है कि कहीं ढेंकी न गिर जाय।
“बारह आना मन ईश्वर पर रखकर चार आने से काम करना चाहिए।”
श्रीरामकृष्ण शशधर पण्डित की बात भक्तों से कह रहे हैं – “देखा, एकरुखा आदमी है। केवल सूखा ज्ञान और विचार लेकर है।
“जो नित्य में पहुँचकर लीला लेकर रहता है, उसका ज्ञान पक्का है, उसकी भक्ति भी पक्की है।
“नारदादि ने ब्रह्मज्ञान के पश्चात् भक्ति ली थी, इसी का नाम विज्ञान है।
“केवल ज्ञान शुष्क होता है – जैसे एकाएक फूट पड़नेवाले आतशबाजी के अनार – कुछ देर फूल छूटने पर तुरन्त फूट जाते हैं। नारद और शुकदेव आदि का ज्ञान, जैसे अच्छे अनार। थोड़ी देर एक तरह के फूल निकलते हैं, फिर बन्द होकर दूसरी तरह के फूल निकलने लगते हैं। नारद और शुकदेव आदि का ईश्वर पर प्रेम हुआ था। प्रेम सच्चिदानन्द को पकड़ने की रस्सी है।”
दोपहर के भोजन के बाद श्रीरामकृष्ण जरा विश्राम कर रहे हैं।
बकुल के पेड़ के नीचे बैठने की जो जगह है, वहाँ दो-चार भक्त बैठे हुए गप्पें लड़ा रहे हैं। भवनाथ, दोनों मुखर्जी भाई, मास्टर, छोटे गोपाल, हाजरा आदि। श्रीरामकृष्ण झाऊतल्ले की ओर जा रहे हैं, वहाँ जाकर जरा बैठे।
मुखर्जी – (हाजरा से) – आपने इनके पास से बहुत कुछ सीखा है।
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – नहीं बचपन से ही इनकी यह अवस्था है। (सब हँसते हैं।)
श्रीरामकृष्ण झाऊतल्ले से लौट रहे हैं। भक्तों ने देखा, भावावेश में हैं। पागल की तरह चल रहे हैं। जब कमरे में आये तब प्रकृतिस्थ हो गये।
(२)
गुरुवाक्य पर विश्वास। शास्त्रों की धारणा कब होती है?
श्रीरामकृष्ण के कमरे में बहुत से भक्तों का समागम हुआ है। कोन्नगर के भक्तों में एक साधक अभी पहले-पहल आये हैं। उम्र पचास के ऊपर होगी। देखने से मालूम होता है कि भीतर पाण्डित्य का पूरा अभिमान है। बातचीत करते हुए वे कह रहे, 'समुद्र-मंथन के पहले क्या चन्द्र न था? परन्तु इसकी मीमांसा कौन करे?'
मास्टर – (सहास्य) – देवी के एक गाने में है – जब ब्रह्माण्ड ही न था, तब मुण्डमाला तुझे कहाँ मिली होगी?
साधक – (विरक्ति से) – वह दूसरी बात है।
कमरे में खड़े होकर श्रीरामकृष्ण ने एकाएक कहा – 'वह आया था – नारायण।'
१४ सितम्बर, १८८४ । परिच्छेद ९० । ६०५
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१४ सितम्बर, १८८४ । परिच्छेद ९० । ६०५
नरेन्द्र बरामदे में हाजरा आदि से बातें कर रहे हैं – उनकी चर्चा का शब्द श्रीरामकृष्ण के कमरे में सुन पड़ रहा है।
श्रीरामकृष्ण – खूब बक सकता है। इस समय घर की चिन्ता में बहुत पड़ गया है।
मास्टर - जी हाँ।
श्रीरामकृष्ण – नरेन्द्र ने विपत्ति को सम्पत्ति समझने के लिए कहा था न?
मास्टर – जी हाँ, मनोबल खूब है।
बड़े काली – कम क्या है?
श्रीरामकृष्ण अपने आसन पर बैठ गये। कोन्नगर के एक भक्त श्रीरामकृष्ण से कह रहे हैं – 'महाराज, ये (साधक) आपको देखने आये हैं; इन्हें कुछ पूछना है।
साधक देह और सिर ऊँचा किये बैठे हैं।
साधक – महाराज, उपाय क्या है?
श्रीरामकृष्ण – गुरु की बातों पर विश्वास करना। उनके आदेश के अनुसार चलने पर ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं। जैसे डोर अगर ठिकाने से लगी हुई हो तो उसे पकड़कर चलने से पते पर पहुँचा जा सकता है।
साधक – क्या उनके दर्शन होते हैं?
श्रीरामकृष्ण – वे विषय-बुद्धि के रहते नहीं मिलते। कामिनी और कांचन का लेशमात्र रहते उनके दर्शन नहीं हो सकते। वे शुद्ध मन और शुद्ध बुद्धि से गोचर होते हैं। वह मन चाहिए जिसमें आसक्ति का लेशमात्र न हो। शुद्ध-मन, शुद्ध-बुद्धि और शुद्ध आत्मा, ये एक ही वस्तु हैं।
साधक – परन्तु शास्त्र में है – 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह' – वे मन और वाणी से परे हैं।
श्रीरामकृष्ण – रखो इसे। साधना किये बिना शास्त्रों का अर्थ समझ में नहीं आता। 'भंग-भंग' चिल्लाने से क्या होता है? पण्डित जितने हैं, सर्राटे के साथ श्लोकों की आवृत्ति करते हैं, परन्तु इससे होता क्या है? भंग जाहे जितनी देह में लगा ली जाय, पर इससे नशा नहीं होता, नशा लाने के लिए तो भंग पीनी ही चाहिए।
"दूध में मक्खन है, दूध में मक्खन है, इस तरह चिल्लाते रहने से क्या होता है? दूध जमाओ, दही बनाओ, मथो, तब होगा।"
साधक – मक्खन बनाना, ये सब तो शास्त्र की ही बातें हैं।
श्रीरामकृष्ण – शास्त्र की बात कहने या सुनने से क्या होता है? – उसकी धारणा होनी चाहिए। पंचाग में लिखा हैं – वर्षा पूरी होंगी, परंतु पंचाग दबाओं तो कही बूंद भर भी पानी नहीं निकलता।
साधक – मक्खन निकालना बतलाते हैं – आपने निकाला है मक्खन?
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| ६०६ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १४ सितम्बर, १८८४ |
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श्रीरामकृष्ण – मैंने क्या किया है और क्या नहीं किया यह बात रहने दो। और ये बातें समझाना बहुत मुश्किल है। कोई अगर पूछे कि घी का स्वाद कैसा है तो कहना पड़ता है, जैसा है – वैसा ही है।
“यह सब समझना हो तो साधुओं का संग करना चाहिए। कौनसी नाड़ी कफ की है, कौनसी पित्त की और कौन वायु की, इसके जानने की अगर जरूरत हो तो सदा वैद्य के साथ रहना चाहिए।”
साधक – दूसरे के साथ रहने में कोई कोई आपत्ति करते हैं।
श्रीरामकृष्ण – वह ज्ञान के बाद – ईश्वर-प्राप्ति के बाद की अवस्था है। पहले तो सत्संग चाहिए ही न?
साधक चुप हैं।
साधक – (कुछ देर बाद, झुंझलाकर) – आपने उन्हें जाना? – कहिये – प्रत्यक्ष रूप से हो या अनुभव से। इच्छा हो और आप कह सकें तो कहिये, नहीं तो न सही।
श्रीरामकृष्ण – (मुस्कराते हुए) – क्या कहूँ, आभास मात्र कहा जा सकता हैं।
साधक – वही कहिये।
नरेन्द्र गायेंगे। नरेन्द्र कहते हैं, पखावज अभी तक नहीं लाया गया।
छोटे गोपाल – महिमाचरण बाबू के पास है।
श्रीरामकृष्ण – नहीं, उसकी चीज ले आने की कोई जरूरत नहीं।
कोन्नगर के एक भक्त कलाकारों के ढंग के गाने गा रहे हैं। गाना हो रहा है और श्रीरामकृष्ण एक एक बार साधक की अवस्था देख रहे हैं। गवैया नरेन्द्र के साथ गाने और बजाने के विषय पर घोर तर्क कर रहे हैं।
साधक गवैये से कह रहे हैं, “तुम भी तो यार कम नहीं हो, इन सब वाद-विवादों से गरज?” इस विवाद में एक और महाशय बोल रहे थे; श्रीरामकृष्ण ने साधक से कहा, “आपने इन्हें कुछ न कहा?”
श्रीरामकृष्ण कोन्नगर के भक्तों से कह रहे हैं, “देखता हूँ, आप लोगों के साथ भी इनकी नहीं बनती।” नरेन्द्र गा रहे हैं।
गाना सुनते हुए साधक ध्यानमग्न हो गये। श्रीरामकृष्ण के तख्त के उत्तर की ओर मुँह किये बैठे हैं। दिन के तीन या चार बजे का समय होगा – पश्चिम की ओर से धूप आकर उन पर पड़ रही थी। श्रीरामकृष्ण ने फौरन एक छाता लेकर अपने पश्चिम ओर रखा, जिससे धूप न लगे। नरेन्द्र गा रहे हैं –
“इस मलिन और पंकिल मन को लेकर तुम्हे कैसे पुकारूँ? क्या जलती हुई आग में कभी तृण पैठने का भी साहस कर सकता है? तुम पुण्य के आधार हो, जलती हुई आग के समान हो, मैं तृण जैसे पापी तुम्हारी पूजा कैसे करूँ? परन्तु सुना है, तुम्हारे नाम के
१४ सितम्बर, १८८४ परिच्छेद ९० ६०७
१४ सितम्बर, १८८४ परिच्छेद ९० ६०७
गुणों से महापापियों का भी परित्राण हो जाता है, पर तुम्हारे पवित्र नाम का उच्चारण करते हुए मेरा हृदय न जाने क्यों काँप रहा है। मेरा अभ्यास पाप की सेवा में बढ़ गया है, जीवन वृथा ही चला जाता है, मैं पवित्र मार्ग का आश्रय किस तरह लूँगा? यदि इस पातकी और नराधम को तुम अपने दयालु नाम के गुण से तारो तो तार दो। कहो, मेरे केशों को पकड़कर कब अपने चरणों में आश्रय दोगे?"
(३)
नरेन्द्रादि को शिक्षा; ‘वेद-वेदान्त में केवल आभास है।’
नरेन्द्र गा रहे हैं –
"हे दीनों के शरण! तुम्हारा नाम बड़ा ही मधुर है। उसमें अमृत की धारा बह रही है। हे प्राणों में रमण करनेवाले! उससे मेरे श्रवणेन्द्रिय शीतल हो जाते हैं। जब कभी तुम्हारे नाम की सुधा श्रवणों का स्पर्श करती है तो समस्त विषाद-राशि का एक क्षण में नाश हो जाता है। हे हृदय के स्वामी – चिदानन्दघन! तुम्हारे नामों को गाते हुए हृदय अमृतमय हो जाता है।"
ज्योंही नरेन्द्र ने गाया – 'तुम्हारे नामों को गाते हुए हृदय अमृतमय हो जाता है', श्रीरामकृष्ण समाधिमग्न हो गये। समाधि के आरम्भ में हाथ की उँगलियाँ, खासकर अँगूठा काँप रहा था। कोन्नगर के भक्तों ने श्रीरामकृष्ण की समाधि कभी नहीं देखी थी। श्रीरामकृष्ण को मौन धारण करते हुए देखकर वे लोग उठे।
भवनाथ – आप लोग बैठिये, यह इनकी समाधि की अवस्था है।
कोन्नगर के भक्तों ने फिर आसन ग्रहण किया। नरेन्द्र गा रहे हैं। श्रीरामकृष्ण भावावेश में नीचे उतरकर नरेन्द्र के पास जमीन पर बैठे। बड़ी देर बाद जब कुछ प्राकृत अवस्था हुई तब वही जमीन पर बिछी हुई चटाई पर जा बैठे। नरेन्द्र का गाना समाप्त हो गया। तानपूरा यथास्थान रख दिया गया। श्रीरामकृष्ण को भाव का आवेश अब भी है। उसी अवस्था में कह रहे हैं – "यह भला कैसी बात है माँ! मक्खन निकालकर मुँह के सामने रखो। न तालाब में चारा (मछलियों का) छोड़ेगा – न बंसी लेकर बैठा रहेगा – बस, मछली पकड़कर उसके हाथ में रख दो! कैसा उत्पात है! माँ! तर्क-विचार अब न सुनूँगा, कैसा उत्पात है! अब मैं फटकार दूँगा।
"वे वेदविधि के पार हैं। – क्या वेद, वेदान्त और शास्त्रों को पढ़कर कोई उन्हें प्राप्त कर सकता है? (नरेन्द्र से) समझा? वेदों में आभास मात्र है।"
नरेन्द्र ने फिर स्वयं तानपूरा ले आने के लिए कहा। श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, मैं गाऊँगा। अब भी भावावेश है, श्रीरामकृष्ण गा रहे हैं।
उन्होंने कई गाने गाये। फिर वे गीत के एक चरण की आवृत्ति करते हुए कह रहे
६०८ श्रीरामकृष्णवचनामृत १४ सितम्बर, १८८४
हैं – “माँ, मुझे पागल कर दे। उन्हें ज्ञान और विचार द्वारा या शास्त्रों का पाठ करके कोई नहीं प्राप्त कर सकता।” वे विनयपूर्वक गानेवाले से कह रहे हैं – ‘भाई, आनन्दमयी का एक गाना गाइये।’ ”
गवैये – महाराज, क्षमा कीजियेगा।
श्रीरामकृष्ण गवैये को हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए कह रह हैं – “नहीं भाई, इसके लिए आग्रह कर सकता हूँ।” इतना कहकर गोविन्द अधिकारी की यात्रा (नाटक) के दल में गायी जानेवाली वृन्दा की उक्ति को गाते हुए कह रहे हैं – ‘राधिका अगर कृष्ण को कुछ कहना चाहे तो कह सकती है, क्योंकि कृष्ण के लिए तमाम रात जगकर उन्होंने भोर कर दिया।’
“बाबू, तुम ब्रह्ममयी के पुत्र हो, वे घट-घट में हैं, तुम पर मेरा जोर अवश्य है। किसान ने अपने गुरु से कहा था – ‘तुम्हें ठोंककर मन्त्र लूँगा।”
गवैये – (सहास्य) – जूतियों से ठोंककर?
श्रीरामकृष्ण – (गुरु के उद्देश्य में प्रणाम करके, हँसकर) – नहीं, इतनी दूर नहीं बढ़ सकता हूँ।
फिर भावावेश में कह रहे हैं – “प्रवर्तक, साधक, सिद्ध और सिद्धों के सिद्ध हैं – क्या तुम सिद्ध हो या सिद्ध के सिद्ध? अच्छा गाओ।”
गवैये आलाप करके गाने लगे।
श्रीरामकृष्ण – (आलाप सुनकर) – भाई इससे भी आनन्द होता है।
गाना समाप्त हो गया। कोन्नगर के भक्त श्रीरामकृष्ण को प्रणाम करके बिदा हो गये। साधक हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए कह रहे हैं – ‘गुसाईंजी, तो मैं अब चलता हूँ।’ श्रीरामकृष्ण अब भी भावावेश में हैं – माता के साथ बातचीत कर रहे हैं –
“माँ, मैं या तुम? क्या मैं करता हूँ? – नहीं नहीं, तुम करती हो।
“अब तक तुमने विचार सुना या मैंने? ना – मैंने नहीं सुना – तुम्हीं ने सुना है।”
श्रीरामकृष्ण की प्राकृत अवस्था हो रही है। अब वे नरेन्द्र, भवनाथ, मुखर्जी आदि भक्तों से बातचीत कर रहे हैं। साधक की बात उठाते हुए भवनाथ ने पूछा, कैसा आदमी है?
श्रीरामकृष्ण – तमोगुणी भक्त है।
भवनाथ – खूब श्लोक कह सकता है।
श्रीरामकृष्ण – मैंने एक आदमी से कहा था – ‘वह रजोगुणी साधु है – उसे क्यों सीधा-फीधा देते हो?’ एक दूसरे साधु ने मुझे शिक्षा दी। उसने कहा – ‘ऐसी बात मत कहो, साधु तीन तरह के होते हैं – सतोगुणी, रजोगुणी और तमोगुणी।’ उस दिन से मैं सब तरह के साधुओं को मानता हूँ।
१४ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद १० | ६०९
| १४ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद १० | ६०९ |
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नरेन्द्र – (सहास्य) – क्या? उसी तरह जैसे हाथी नारायण है? सभी नारायण हैं।
श्रीरामकृष्ण – (हँसते हुए) – विद्या और अविद्या के रूपों से वे ही लीला कर रहे हैं। मैं दोनों को प्रणाम करता हूँ। चण्डी में है – 'वही लक्ष्मी है और अभागे के यहाँ की धूल भी वही है।' (भवनाथ आदि से) यह क्या विष्णु पुराण में है?
भवनाथ – (हँसते हुए) – जी, मुझे तो नहीं मालूम। कोन्नगर के भक्त आप की समाधि-अवस्था देखकर उठे चले जा रहे थे।
श्रीरामकृष्ण – कोई फिर कह रहा था कि तुम लोग बैठो।
भवनाथ – (हँसते हुए) – वह मैं हूँ।
श्रीरामकृष्ण – तुम जैसे लोगों को यहाँ लाते हो, वैसे ही भगा भी देते हो!
गवैये के साथ नरेन्द्र का वादविवाद हुआ था, उसी की बात चल रही है।
मुखर्जी – नरेन्द्र ने भी मोर्चा नहीं छोड़ा।
श्रीरामकृष्ण – हाँ, ऐसी दृढ़ता तो चाहिए ही। इसे सत्त्व का तम कहते हैं। लोग जो कुछ कहेंगे क्या उसी पर विश्वास करना होगा? वेश्या से क्या यह कहा जायगा कि तुम्हें जो रुचे वही करो? तो वेश्या की बात भी माननी होगी। मान करने पर एक सखी ने कहा था – 'राधिका को अहंकार हुआ है।' वृन्दे ने कहा, "यह 'अहं' किसका है? – यह उन्हीं का अहंकार है – कृष्ण के ही गर्व से वे गर्व करती हैं।"
अब हरिनाम के माहात्म्य की बात हो रही है।
भवनाथ – नाम करने पर मेरी देह हलकी पड़ जाती है।
श्रीरामकृष्ण – वे पाप का हरण करते हैं, इसीलिए उन्हें हरि कहते हैं। वे त्रिताप के हरण करनेवाले हैं।
"और चैतन्य देव ने इस नाम का प्रचार किया था, अतएव अच्छा है। देखो, चैतन्य देव कितने बड़े पण्डित थे और वे अवतार थे। उन्होंने इस नाम का प्रचार किया था, अतएव यह बहुत ही अच्छा है। (हँसते हुए) कुछ किसान एक न्योते में गये थे। भोजन करते समय उनसे पूछा गया, तुम लोग आमड़ें की खटाई खाओगे? उन्होंने कहा, बाबुओं ने अगर उसे खाया हो तो हमें भी देना। मतलब यह कि उन्होंने खाया होगा तो वह चीज अच्छी ही होगी।" (सब हँसते हैं।)
श्रीरामकृष्ण की शिवनाथ शास्त्री से मिलने की इच्छा हुई है। वे मुखर्जियों से कह रहे हैं – 'एक बार शिवनाथ शास्त्री को देखने के लिए जाऊँगा, तुम्हारी गाड़ी से जाऊँगा तो किराया न पड़ेगा।'
मुखर्जी – जो आज्ञा, एक दिन भेज दी जायगी।
श्रीरामकृष्ण – (भक्तों से) – अच्छा, क्या वह हम लोगों को पसन्द करेगा? वे लोग साकारवादियों की कितनी निन्दा करते हैं।