श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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| ६०२ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ७ सितम्बर, १८८४ |
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अधर – (सहास्य) – हम लोगों की इतनी बातें हो गयीं, ये (मास्टर) तो कुछ भी न बोले।
श्रीरामकृष्ण – केशव के दल का एक लड़का – वह चार परीक्षाएँ पास कर चुका था – सब को मेरे साथ तर्क करते हुए देखकर बस मुस्कराता था और कहता था, इनसे भी तर्क! मैंने केशव सेन के यहाँ एक बार और उसे देखा था, परन्तु तब उसका वह चेहरा न रह गया था।
विष्णुमन्दिर के पुजारी राम चक्रवर्ती श्रीरामकृष्ण के कमरे में आये। श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं – “देखो राम! तुमने क्या दयाल से मिश्री की बात कही है? – नहीं-नहीं, इसके कहने की जरूरत नहीं है। बड़ी बड़ी बातें हो गयी हैं।”
रात में श्रीरामकृष्ण काली के प्रसाद की दो-एक पूड़ियाँ तथा सूजी की खीर खाते हैं। श्रीरामकृष्ण जमीन पर, आसन पर प्रसाद पाने के लिए बैठे। पास ही मास्टर बैठे हुए हैं, लाटू भी कमरे में हैं। भक्तगण सन्देश तथा कुछ मिठाइयाँ ले आये थे। एक सन्देश लेते ही श्रीरामकृष्ण ने कहा, यह किसका सन्देश है? इतना कहकर खीरवाले कटोरे से निकालकर उन्होंने वह नीचे डाल दिया। (मास्टर और लाटू से) – “यह मैं सब जानता हूँ। आनन्द चैटर्जी का लड़का ले आया है जो घोषपाड़ा-वाली औरत के पास जाता है।”
लाटू ने एक दूसरी बर्फी देने के लिए पूछा।
श्रीरामकृष्ण – किशोरी लाया है।
लाटू – क्या इसे दूँ?
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – हाँ।
मास्टर अंग्रेजी पढ़े हुए हैं। श्रीरामकृष्ण उनसे कहने लगे –
“सब लोगों की चीजें नहीं खा सकता। क्या यह सब तुम मानते हो?”
मास्टर – देखता हूँ, सब धीरे धीरे मानना पड़ेगा।
श्रीरामकृष्ण – हाँ।
श्रीरामकृष्ण पश्चिमवाले गोल बरामदे में हाथ धोने के लिए गये। मास्टर हाथ पर पानी छोड़ रहे हैं।
शरत्काल है। चाँद निकला हुआ है। आकाश निर्मल है। भागीरथी का हृदय स्वच्छ दर्पण के समान झलक रहा है; भांटे का समय है, भागीरथी दक्षिण की ओर बह रही हैं; मुँह धोते हुए श्रीरामकृष्ण मास्टर से कह रहे हैं – ‘तो नारायण को रुपया दोगे न?’ मास्टर – ‘जी हाँ, जैसी आज्ञा, जरूर दूँगा।’
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar