श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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परिच्छेद ९०
साधना तथा साधुसंग
(१)
'ज्ञान, अज्ञान के परे चले जाओ।' शशधर का शुष्क ज्ञान
श्रीरामकृष्ण दोपहर के भोजन के बाद अपने कमरे में विश्राम कर रहे हैं। कुछ भक्त भी बैठे हुए हैं। आज नरेन्द्र, भवनाथ आदि भक्त कलकते से आये हैं। दोनों मुखर्जी भाई, ज्ञानबाबू, छोटे गोपाल, बड़े काली, ये भी आये हैं। तीन-चार भक्त कोन्नगर से आये हुए हैं। उन्हें बुखार आया था, सूचना आयी थी। आज रविवार है, १४ सितम्बर, १८८४।
पिता का स्वर्गवास हो जाने पर नरेन्द्र अपनी माँ और भाइयों की चिन्ता में पड़कर बड़े व्याकुल हैं। वे कानून की परीक्षा के लिए तैयारी कर रहे हैं।
ज्ञानबाबू चार परीक्षाएँ पास कर चुके हैं। वे सरकारी नौकरी करते हैं। दस-ग्यारह बजे के लगभग आये हैं।
श्रीरामकृष्ण – (ज्ञानबाबू को देखकर) – क्यों जी, एकाएक ज्ञानोदय, यह क्या?
ज्ञान – (सहास्य) – जी, बड़े भाग्य से ज्ञानोदय होता है।
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – तुम ज्ञानी होकर भी अज्ञानी क्यों हो? हाँ, मैं समझा, जहाँ ज्ञान है, वहीं अज्ञान है! वशिष्ठ देव इतने ज्ञानी थे, परन्तु लड़कों के शोक से वे भी रोये थे। अतएव तुम ज्ञान और अज्ञान के पार हो जाओ। पैरों में अज्ञान का काँटा लग गया है, उसे निकालने के लिए ज्ञानरूपी काँटे की जरूरत है। निकल जाने पर दोनों काँटे फेंक देना चाहिए।
"ज्ञान कहता है, यह संसार धोखे की टट्टी है; और जो ज्ञान और अज्ञान के पार चले गये हैं, वे कहते हैं, यह आनन्द की कुटिया है। वह देखता है, ईश्वर ही जीव-जगत् और चौबीसों तत्त्व हुए हैं।
"उन्हें पा लेने पर फिर संसार में रहा जा सकता है। तब आदमी निर्लिप्त हो सकता है। उस देश में बढ़ई की औरतों को मैंने देखा है, ढेंकी में चूड़ा कूटती हैं, एक हाथ से धान चलाती हैं, दूसरे से बच्चे को दूध पिलाती हैं, साथ ही खरीददारों से बातचीत भी करती हैं, कहती हैं तुम्हारे ऊपर दो आने उधार हैं, दे जाना। परन्तु उनका बारह आना मन
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