श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
पृष्ठ 622, कुल 711 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
| ७ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद ८९ | ५९९ |
|---|
मन्दिर से उनकी बात सुनी। सेजो बाबू और हृदय एक साथ सलाह कर रहे थे। मैंने सेजो बाबू से जाकर कहा, 'देखो, ऐसा विचार मत करो। इसमें मेरा बड़ा नुकसान है।'
अधर – जैसी बात आप कह रहे हैं, सृष्टि के आरम्भ से अब तक ज्यादा से ज्यादा छः ही सात ऐसे हुए होंगे।
श्रीरामकृष्ण – क्यों, त्यागी हैं क्यों नहीं? ऐश्वर्य का त्याग करने से ही लोग उन्हें समझ जाते हैं। फिर ऐसे भी त्यागी पुरुष हैं, जिन्हें लोग नहीं जानते। क्या उत्तर भारत में ऐसे पवित्र पुरुष नहीं हैं?
अधर – कलकत्ते में एक को जानता हूँ, वे देवेन्द्र ठाकुर हैं।
श्रीरामकृष्ण – कहते क्या हो! – उसने जैसा भोग किया वैसा बहुत कम आदमियों को नसीब हुआ होगा। जब सेजो बाबू के साथ मैं उसके वहाँ गया, तब देखा छोटे छोटे उसके कितने ही लड़के थे – डाक्टर आया हुआ था, नुस्खा लिख रहा था। जिसके आठ लड़के और ऊपर से लड़कियाँ हैं, वह ईश्वर की चिन्ता न करे तो और कौन करेगा? इतने ऐश्वर्य का भोग करके भी अगर वह ईश्वर की चिन्ता न करता तो लोग कितना धिक्कारते!
निरंजन – द्वारकानाथ ठाकुर का सब कर्ज उन्होंने चुका दिया था।
श्रीरामकृष्ण – चल, रख ये सब बातें। अब जला मत। शक्ति के रहते भी जो बाप का किया हुआ कर्ज नहीं चुकाता, वह भी कोई आदमी है?
"हाँ, बात यह है कि संसारी लोग बिलकुल डूबे रहते हैं, उनकी तुलना में वह बहुत अच्छा था – उन्हें शिक्षा मिलेगी।
"यथार्थ त्यागी भक्त और संसारी भक्त में बड़ा अन्तर है। यथार्थ संन्यासी – सच्चा त्यागी भक्त – मधुमक्खी की तरह है। मधुमक्खी फूल को छोड़ और किसी चीज पर नहीं बैठती। मधु को छोड़ और किसी चीज का ग्रहण नहीं करती। संसारी भक्त दूसरी मक्खियों के समान होते हैं जो बर्फियों पर भी बैठती हैं और सड़े घावों पर भी। अभी देखो तो वे ईश्वरी भावों में मग्न हैं, थोड़ी देर में देखो तो कामिनी और कांचन को लेकर मतवाले हो जाते हैं।
"सच्चा त्यागी भक्त चातक के समान होता है। चातक स्वाति नक्षत्र के जल को छोड़ और पानी नहीं पीता, सात समुद्र और तेरह नदियाँ भले ही भरीं रहें। वह दूसरा पानी हरगिज नहीं पी सकता। सच्चा भक्त कामिनी और कांचन को छू भी नहीं सकता, पास भी नहीं रख सकता, क्योंकि कहीं आसक्ति न आ जाय।"
(५)
चैतन्यदेव, श्रीरामकृष्ण और लोकमान्यता
अधर – चैतन्य ने भी भोग किया था।
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar