भारतकोश
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

पृष्ठ 621, कुल 711 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 621

५९८ श्रीरामकृष्णवचनामृत ७ सितम्बर, १८८४

“ऊँची अवस्था प्राप्त होने के पश्चात् तरह तरह के दृश्य मुझे दीख पड़ने लगे। तब माँ से कहा, 'माँ यहीं से मन को मोड़ दो जिससे मुझे धनी लोगों की खुशामद न करनी पड़े।

“जिसका काम कर रहे हो, उसी का करो। लोग सौ-पचास रुपये के लिए जी देते हैं, तुम तो तीन सौ महीना पाते हो। उस देश में मैंने डिप्टी देखा था, ईश्वर घोषाल को। सिर पर टोपी – गुस्सा नाक पर; मैंने लड़कपन में उसे देखा था; डिप्टी कुछ कम थोड़े ही होता है!

“जिसका काम कर रहे हो, उसी का करते रहो। एक ही आदमी की नौकरी से जी ऊब जाता है, फिर पाँच आदमियों की नौकरी?

“एक स्त्री किसी मुसलमान को देखकर मुग्ध हो गयी थी, उसने उसे मिलने के लिए बुलाया। मुसलमान आदमी अच्छा था, प्रकृति का साधु था। उसने कहा – 'मैं पेशाब करूँगा, अपनी हण्डी ले आऊँ।' उस स्त्री ने कहा – 'हण्डी तुम्हें यहीं मिल जायगी, मैं दूँगी तुम्हें हण्डी।' उसने कहा – 'ना, सो बात नहीं होगी! जिस हण्डी के पास मैंने एक दफे शर्म खोई, इस्तेमाल तो मैं उसी का करूँगा – नयी हण्डी के पास दोबारा बेईमान न हो सकूँगा।' यह कहकर वह चला गया। औरत की भी अक्ल दुरुस्त हो गयी; हण्डी का मतलब वह समझ गयी।”

पिता का वियोग हो जाने पर नरेन्द्र को बड़ी तकलीफ हो रही है। माता और भाइयों के भोजन-वस्त्र के लिए वे नौकरी की तलाश कर रहे हैं। विद्यासागर के बहूबाजार वाले स्कूल में कुछ दिनों तक उन्होंने प्रधान शिक्षक का काम किया था।

अधर – अच्छा, नरेन्द्र कोई काम करेगा या नहीं?

श्रीरामकृष्ण – हाँ, वह करेगा। माँ और भाई जो हैं।

अधर – अच्छा, नरेन्द्र की जरूरत पचास रुपये से भी पूरी हो सकती है और सौ रुपये से भी उसका काम चल सकता है। अब अगर उसे सौ रुपये मिलें तो वह काम करेगा या नहीं?

श्रीरामकृष्ण – विषयी लोग धन का आदर करते हैं। वे सोचते हैं, ऐसी चीज और दूसरी न होगी। शम्भू ने कहा – 'यह सारी सम्पत्ति ईश्वर के श्रीचरणों में सौंप जाऊँ, मेरी बड़ी इच्छा है।' वे विषय थोड़े ही चाहते हैं? वे तो ज्ञान, भक्ति, विवेक, वैराग्य यह सब चाहते हैं।

“जब श्रीठाकुर-मन्दिर से गहने चोरी चले गये, तब सेजो बाबू ने कहा – 'क्यों महाराज! तुम अपने गहने न बचा सके! हंसेश्वरी देवी को देखो, किस तरह अपने गहने बचा लिये थे!'

“सेजो बाबू ने मेरे नाम एक ताल्लुका लिख देने के लिए कहा था। मैंने काली-