श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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| ७ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद ८९ | ५९७ |
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जला दी गयी। कुछ देर बाद चन्द्रोदय हुआ। मन्दिर का आँगन, बगीचे के रास्ते, गंगातट, पंचवटी, पेड़ों का ऊपरी हिस्सा, सब कुछ चाँदनी में हँस रहे थे।
श्रीरामकृष्ण अपने आसन पर बैठे हुए भावावेश में माता का स्मरण कर रहे हैं।
अधर आकर बैठे। कमरे में मास्टर और निरंजन भी हैं। श्रीरामकृष्ण अधर के साथ बातचीत कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – अजी, तुम अब आये! कितना कीर्तन और नृत्य हो गया। श्यामदास का कीर्तन था – राम के उस्ताद का। परन्तु मुझे बहुत अच्छा न लगा। उठने की इच्छा भी नहीं हुई। उस आदमी की बात फिर पीछे से मालूम हुई। गोपीदास के साथवाले ने कहा, मेरे सिर पर जितने बाल हैं, उतनी उसकी रखेलियाँ हैं! (सब हँसते हैं।) क्या तुम्हारा काम हुआ?
अधर डिप्टी हैं। तीन सौ तनख्वाह पाते हैं। उन्होंने कलकत्ता म्यूनिसिपल्टी के वाइस चेअरमैन के लिए अर्जी दी थी। वहाँ हजार रुपये महीने की तनख्वाह है। इसके लिए अधर कलकत्ते के बहुत बड़े-बड़े आदमियों से मिले थे।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर और निरंजन से) – हाजरा ने कहा था, अधर का काम हो जायगा, तुम जरा माँ से कहो। अधर ने भी कहा था। मैंने माँ से कहा था, 'माँ, यह तुम्हारे यहाँ आयाजाया करता है, अगर उसे जगह मिलनी हो तो दे दो –' परन्तु इसके साथ ही माँ से मैंने यह भी कहा था कि माँ, इसकी बुद्धि कितनी हीन है? ज्ञान और भक्ति की प्रार्थना न करके तुम्हारे पास यह सब चाहता है!
(अधर से) “क्यों नीच प्रकृति के आदमियों के यहाँ इतना चक्कर मारते फिरे? इतना देखा और समझा, सातों काण्ड रामायण पढ़कर सीता किसकी भार्या थी, इतना भी नहीं समझे?”
अधर – संसार में रहने पर इन सब के बिना किये काम भी नहीं चलता। आपने तो मना भी नहीं किया था।
श्रीरामकृष्ण – निवृत्ति ही अच्छी है, प्रवृत्ति अच्छी नहीं। इस अवस्था के बाद मुझे तनख्वाह के बिल पर दस्तखत करने के लिए कहा था! मैंने कहा, 'यह मुझसे न होगा। मैं तो कुछ चाहता नहीं। तुम्हारी इच्छा हो तो किसी दूसरे को दे दो।'
“एकमात्र ईश्वर का दास हूँ – और किसका दास बनूँ?
“मुझे खाने की देर होती थी, इसलिए मल्लिक ने भोजन पकाने के लिए एक ब्राह्मण नौकर रख दिया था। एक महीने में एक रुपया दिया था। तब मुझे लज्जा हुई, उसके बुलाने से ही दौड़ना पड़ता था! – खुद जाऊँ वह बात दूसरी है।
“सांसारिक जीवन व्यतीत करने में मनुष्य को न जाने कितने नीच आदमियों को खुश करना पड़ता है, और उसके अतिरिक्त और भी न जाने क्या क्या करना पड़ता है।
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