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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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१४ सितम्बर, १८८४ परिच्छेद ९० ६०७

गुणों से महापापियों का भी परित्राण हो जाता है, पर तुम्हारे पवित्र नाम का उच्चारण करते हुए मेरा हृदय न जाने क्यों काँप रहा है। मेरा अभ्यास पाप की सेवा में बढ़ गया है, जीवन वृथा ही चला जाता है, मैं पवित्र मार्ग का आश्रय किस तरह लूँगा? यदि इस पातकी और नराधम को तुम अपने दयालु नाम के गुण से तारो तो तार दो। कहो, मेरे केशों को पकड़कर कब अपने चरणों में आश्रय दोगे?"

(३)

नरेन्द्रादि को शिक्षा; ‘वेद-वेदान्त में केवल आभास है।’

नरेन्द्र गा रहे हैं –

"हे दीनों के शरण! तुम्हारा नाम बड़ा ही मधुर है। उसमें अमृत की धारा बह रही है। हे प्राणों में रमण करनेवाले! उससे मेरे श्रवणेन्द्रिय शीतल हो जाते हैं। जब कभी तुम्हारे नाम की सुधा श्रवणों का स्पर्श करती है तो समस्त विषाद-राशि का एक क्षण में नाश हो जाता है। हे हृदय के स्वामी – चिदानन्दघन! तुम्हारे नामों को गाते हुए हृदय अमृतमय हो जाता है।"

ज्योंही नरेन्द्र ने गाया – 'तुम्हारे नामों को गाते हुए हृदय अमृतमय हो जाता है', श्रीरामकृष्ण समाधिमग्न हो गये। समाधि के आरम्भ में हाथ की उँगलियाँ, खासकर अँगूठा काँप रहा था। कोन्नगर के भक्तों ने श्रीरामकृष्ण की समाधि कभी नहीं देखी थी। श्रीरामकृष्ण को मौन धारण करते हुए देखकर वे लोग उठे।

भवनाथ – आप लोग बैठिये, यह इनकी समाधि की अवस्था है।

कोन्नगर के भक्तों ने फिर आसन ग्रहण किया। नरेन्द्र गा रहे हैं। श्रीरामकृष्ण भावावेश में नीचे उतरकर नरेन्द्र के पास जमीन पर बैठे। बड़ी देर बाद जब कुछ प्राकृत अवस्था हुई तब वही जमीन पर बिछी हुई चटाई पर जा बैठे। नरेन्द्र का गाना समाप्त हो गया। तानपूरा यथास्थान रख दिया गया। श्रीरामकृष्ण को भाव का आवेश अब भी है। उसी अवस्था में कह रहे हैं – "यह भला कैसी बात है माँ! मक्खन निकालकर मुँह के सामने रखो। न तालाब में चारा (मछलियों का) छोड़ेगा – न बंसी लेकर बैठा रहेगा – बस, मछली पकड़कर उसके हाथ में रख दो! कैसा उत्पात है! माँ! तर्क-विचार अब न सुनूँगा, कैसा उत्पात है! अब मैं फटकार दूँगा।

"वे वेदविधि के पार हैं। – क्या वेद, वेदान्त और शास्त्रों को पढ़कर कोई उन्हें प्राप्त कर सकता है? (नरेन्द्र से) समझा? वेदों में आभास मात्र है।"

नरेन्द्र ने फिर स्वयं तानपूरा ले आने के लिए कहा। श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, मैं गाऊँगा। अब भी भावावेश है, श्रीरामकृष्ण गा रहे हैं।

उन्होंने कई गाने गाये। फिर वे गीत के एक चरण की आवृत्ति करते हुए कह रहे

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