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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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६०६श्रीरामकृष्णवचनामृत१४ सितम्बर, १८८४

श्रीरामकृष्ण – मैंने क्या किया है और क्या नहीं किया यह बात रहने दो। और ये बातें समझाना बहुत मुश्किल है। कोई अगर पूछे कि घी का स्वाद कैसा है तो कहना पड़ता है, जैसा है – वैसा ही है।

“यह सब समझना हो तो साधुओं का संग करना चाहिए। कौनसी नाड़ी कफ की है, कौनसी पित्त की और कौन वायु की, इसके जानने की अगर जरूरत हो तो सदा वैद्य के साथ रहना चाहिए।”

साधक – दूसरे के साथ रहने में कोई कोई आपत्ति करते हैं।

श्रीरामकृष्ण – वह ज्ञान के बाद – ईश्वर-प्राप्ति के बाद की अवस्था है। पहले तो सत्संग चाहिए ही न?

साधक चुप हैं।

साधक – (कुछ देर बाद, झुंझलाकर) – आपने उन्हें जाना? – कहिये – प्रत्यक्ष रूप से हो या अनुभव से। इच्छा हो और आप कह सकें तो कहिये, नहीं तो न सही।

श्रीरामकृष्ण – (मुस्कराते हुए) – क्या कहूँ, आभास मात्र कहा जा सकता हैं।

साधक – वही कहिये।

नरेन्द्र गायेंगे। नरेन्द्र कहते हैं, पखावज अभी तक नहीं लाया गया।

छोटे गोपाल – महिमाचरण बाबू के पास है।

श्रीरामकृष्ण – नहीं, उसकी चीज ले आने की कोई जरूरत नहीं।

कोन्नगर के एक भक्त कलाकारों के ढंग के गाने गा रहे हैं। गाना हो रहा है और श्रीरामकृष्ण एक एक बार साधक की अवस्था देख रहे हैं। गवैया नरेन्द्र के साथ गाने और बजाने के विषय पर घोर तर्क कर रहे हैं।

साधक गवैये से कह रहे हैं, “तुम भी तो यार कम नहीं हो, इन सब वाद-विवादों से गरज?” इस विवाद में एक और महाशय बोल रहे थे; श्रीरामकृष्ण ने साधक से कहा, “आपने इन्हें कुछ न कहा?”

श्रीरामकृष्ण कोन्नगर के भक्तों से कह रहे हैं, “देखता हूँ, आप लोगों के साथ भी इनकी नहीं बनती।” नरेन्द्र गा रहे हैं।

गाना सुनते हुए साधक ध्यानमग्न हो गये। श्रीरामकृष्ण के तख्त के उत्तर की ओर मुँह किये बैठे हैं। दिन के तीन या चार बजे का समय होगा – पश्चिम की ओर से धूप आकर उन पर पड़ रही थी। श्रीरामकृष्ण ने फौरन एक छाता लेकर अपने पश्चिम ओर रखा, जिससे धूप न लगे। नरेन्द्र गा रहे हैं –

“इस मलिन और पंकिल मन को लेकर तुम्हे कैसे पुकारूँ? क्या जलती हुई आग में कभी तृण पैठने का भी साहस कर सकता है? तुम पुण्य के आधार हो, जलती हुई आग के समान हो, मैं तृण जैसे पापी तुम्हारी पूजा कैसे करूँ? परन्तु सुना है, तुम्हारे नाम के