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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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१४ सितम्बर, १८८४ । परिच्छेद ९० । ६०५

नरेन्द्र बरामदे में हाजरा आदि से बातें कर रहे हैं – उनकी चर्चा का शब्द श्रीरामकृष्ण के कमरे में सुन पड़ रहा है।

श्रीरामकृष्ण – खूब बक सकता है। इस समय घर की चिन्ता में बहुत पड़ गया है।

मास्टर - जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण – नरेन्द्र ने विपत्ति को सम्पत्ति समझने के लिए कहा था न?

मास्टर – जी हाँ, मनोबल खूब है।

बड़े काली – कम क्या है?

श्रीरामकृष्ण अपने आसन पर बैठ गये। कोन्नगर के एक भक्त श्रीरामकृष्ण से कह रहे हैं – 'महाराज, ये (साधक) आपको देखने आये हैं; इन्हें कुछ पूछना है।

साधक देह और सिर ऊँचा किये बैठे हैं।

साधक – महाराज, उपाय क्या है?

श्रीरामकृष्ण – गुरु की बातों पर विश्वास करना। उनके आदेश के अनुसार चलने पर ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं। जैसे डोर अगर ठिकाने से लगी हुई हो तो उसे पकड़कर चलने से पते पर पहुँचा जा सकता है।

साधक – क्या उनके दर्शन होते हैं?

श्रीरामकृष्ण – वे विषय-बुद्धि के रहते नहीं मिलते। कामिनी और कांचन का लेशमात्र रहते उनके दर्शन नहीं हो सकते। वे शुद्ध मन और शुद्ध बुद्धि से गोचर होते हैं। वह मन चाहिए जिसमें आसक्ति का लेशमात्र न हो। शुद्ध-मन, शुद्ध-बुद्धि और शुद्ध आत्मा, ये एक ही वस्तु हैं।

साधक – परन्तु शास्त्र में है – 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह' – वे मन और वाणी से परे हैं।

श्रीरामकृष्ण – रखो इसे। साधना किये बिना शास्त्रों का अर्थ समझ में नहीं आता। 'भंग-भंग' चिल्लाने से क्या होता है? पण्डित जितने हैं, सर्राटे के साथ श्लोकों की आवृत्ति करते हैं, परन्तु इससे होता क्या है? भंग जाहे जितनी देह में लगा ली जाय, पर इससे नशा नहीं होता, नशा लाने के लिए तो भंग पीनी ही चाहिए।

"दूध में मक्खन है, दूध में मक्खन है, इस तरह चिल्लाते रहने से क्या होता है? दूध जमाओ, दही बनाओ, मथो, तब होगा।"

साधक – मक्खन बनाना, ये सब तो शास्त्र की ही बातें हैं।

श्रीरामकृष्ण – शास्त्र की बात कहने या सुनने से क्या होता है? – उसकी धारणा होनी चाहिए। पंचाग में लिखा हैं – वर्षा पूरी होंगी, परंतु पंचाग दबाओं तो कही बूंद भर भी पानी नहीं निकलता।

साधक – मक्खन निकालना बतलाते हैं – आपने निकाला है मक्खन?

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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