भारतकोश
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

पृष्ठ 615, कुल 711 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 615

५९२ श्रीरामकृष्णवचनामृत ७ सितम्बर, १८८४

हैं – पृथ्वीतत्त्व, जलतत्त्व, अग्नितत्त्व, वायुतत्त्व, आकाशतत्त्व, – मल, मूत्र, रज, वीर्य, ये सब तत्त्व ही हैं। ये साधनाएँ बड़ी घृणित हैं; जैसे पाखाने के भीतर से घर में प्रवेश करना।

“एक दिन मैं दालान में भोजन कर रहा था। घोषपाड़ा के मत का एक आदमी आया। आकर कहने लगा – ‘तुम स्वयं खाते हो या किसी को खिलाते हो?’ इसका यह अर्थ है जो सिद्ध होता है, वह अन्तर में ईश्वर देखता है।

“जो लोग इस मत से सिद्ध होते हैं, वे दूसरे मत के लोगों को ‘जीव’ कहते हैं। विजातीय मनुष्यों के सामने बातचीत नहीं करते। कहते हैं, यहाँ ‘जीव’ हैं!

“उस देश में मैंने इस मत को माननेवाली एक स्त्री देखी है। उसका नाम सरी (सरस्वती) पाथर है। इस मत के लोग आपस में एक दूसरे के यहाँ तो भोजन करते हैं, परन्तु दूसरे मत वालों के यहाँ नहीं खाते। मल्लिक घरानेवालों ने सरी पाथर के यहाँ तो भोजन किया, परन्तु हृदय के यहाँ नहीं खाया। कहते हैं, ये सब ‘जीव’ हैं! (सब हँसते हैं।)

“मैं एक दिन उसके यहाँ हृदय के साथ घूमने गया था। तुलसी के पेड़ खूब लगाये हैं। उसने चना-चिउड़ा दिया, मैंने थोड़ा सा खाया, हृदय तो बहुत सा खा गया – फिर बीमार भी पड़ा।

“वे लोग सिद्धावस्था को सहज अवस्था कहते हैं। एक दर्जे के आदमी हैं। वे ‘सहज सहज’ चिल्लाते फिरते हैं। वे सहज अवस्था के दो लक्षण बतलाते हैं। एक यह कि देह में कृष्ण की गन्ध भी न रहेगी और दूसरा यह कि पद्म पर भौंरा बैठेगा, परन्तु मधुपान न करेगा। कृष्ण की गन्ध भी न रह जायगी, इसका अर्थ यह है कि ईश्वर के भाव सब अन्तर में ही रहेंगे, बाहर कोई लक्षण प्रकट न होगा – नाम का जप भी न करेगा। दूसरे का अर्थ है, कामिनी और कांचन की आसक्ति का त्याग – जितेन्द्रियता।

“वे लोग ठाकुर-पूजन, मूर्तिपूजन, यह सब पसन्द नहीं करते – जीता-जागता आदमी चाहते हैं। इसीलिए उनके दर्जे के आदमियों को कर्ताभजा कहते हैं। कर्ताभजा अर्थात् जो लोग कर्ता को – गुरु को ईश्वर समझते और इसी भाव से उनकी पूजा करते हैं।”

(२)

श्रीरामकृष्ण और सर्वधर्मसमन्वय

श्रीरामकृष्ण – देखा, कितने तरह के मत हैं। जितने मत उतने पथ। अनन्त मत हैं और अनन्त पथ हैं।

भवनाथ – अब उपाय क्या है?