श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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५९४ श्रीरामकृष्णवचनामृत ७ सितम्बर, १८८४.
उनके हाथ में एक छाता था, उसे पंचवटी के चबूतरे पर रख दिया। नारायण को वे साक्षात् नारायण देखते हैं इसीलिए बहुत प्यार करते हैं। नारायण स्कूल में पढ़ता है। इस समय श्रीरामकृष्ण उसी की बातचीत कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – नारायण को देखा है तुमने? कैसा स्वभाव है! क्या लड़के, बच्चे, बूढ़े सब से मिलता है। विशेष शक्ति के बिना यह बात नहीं होती। और सब लोग उसे प्यार करते हैं। अच्छा, क्या वह यथार्थ ही सरल है।
मास्टर – जी हाँ, जान तो ऐसा ही पड़ता है।
श्रीरामकृष्ण – सुना, तुम्हारे यहाँ जाता है।
मास्टर – जी हाँ, दो-एक बार आया था।
श्रीरामकृष्ण – क्या एक रुपया तुम उसे दोगे या काली से कहूँ?
मास्टर – अच्छा तो है, मैं ही दे दूँगा।
श्रीरामकृष्ण – बड़ा अच्छा है। जो ईश्वर के अनुरागी हैं उन्हें देना अच्छा है। इससे धन का सदुपयोग होता है। सब रुपये संसार को सौंपने से क्या होगा?
किशोरीलाल के लड़के-बच्चे हो गये हैं। वेतन कम पाता है इससे पूरा नहीं पड़ता। श्रीरामकृष्ण मास्टर से कह रहे हैं – “नारायण कहता था, किशोरीलाल के लिए एक नौकरी ठीक कर दूँगा। नारायण को यह बात याद दिलाना।”
मास्टर पंचवटी में खड़े हुए हैं। श्रीरामकृष्ण कुछ देर बाद झाऊतल्ले से लौटे। मास्टर से कह रहे हैं – जरा बाहर एक चटाई बिछाने के लिए कहो, मैं थोड़ी देर बाद जाता हूँ, लेटूँगा।
श्रीरामकृष्ण कमरे में पहुँचकर कह रहे हैं – तुममें से किसी को छाता ले आने की बात याद नहीं रहीं। (सब हँसते हैं।) जल्दबाज आदमी पास की चीज भी नहीं देखते। एक आदमी एक दूसरे के यहाँ कोयले में आग सुलगाने के लिए गया था, और इधर उसके हाथ में लालटेन जल रही थी।
“एक आदमी अंगौछा खोज रहा था, अन्त में वह उसी के कन्धे पर पड़ा हुआ मिला!”
श्रीरामकृष्ण के लिए काली का अन्न-भोग लाया गया। श्रीरामकृष्ण प्रसाद पायेंगे। दिन के एक बजे का समय होगा। वे भोजन करके जरा विश्राम करेंगे। भक्तगण कमरे में बैठे ही रहे। समझाने पर वे बाहर जाकर बैठे। हरीश, निरंजन और हरिपद पाकशाला में प्रसाद पायेंगे। श्रीरामकृष्ण हरीश से कह रहे हैं, अपने लिए थोड़ा सा अमरस लेते जाना।
श्रीरामकृष्ण विश्राम करने लगे। बाबूराम से कहा, “बाबूराम, जरा मेरे पास आ।” बाबूराम पान लगा रहे थे, कहा, “मैं पान लगा रहा हूँ।”
श्रीरामकृष्ण – रख उधर, फिर पान लगाना।
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