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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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३० जून, १८८४परिच्छेद ८५५४९

"इस अवस्था के आने पर कामक्रोधादि दग्ध हो जाते हैं। शरीर में कुछ फर्क नहीं होता, वह दूसरे आदमियों के जैसा दिखायी देता है; पर भीतर पोल और निर्मल हो जाता है।"

भक्त – ईश्वर-दर्शन के बाद भी क्या शरीर रहता है?

श्रीरामकृष्ण – किसी किसी का कुछ कर्मों के लिए रह जाता है – लोक-शिक्षा के लिए। गंगा नहाने से पाप धुल जाता है और मुक्ति हो जाती है, परन्तु आँख का अन्धापन नहीं जाता; परन्तु इतना होता है कि पापों के लिए जिन कुछ जन्मों तक कर्मफल का भोग करना होता है, वे जन्म फिर नहीं होते। जिस चक्कर को वह लग चुका है, बस उसे ही वह पूरा कर जायेगा। बचे हुए के लिए फिर उसे चक्कर न लगाना होगा। कामक्रोधादि सब दग्ध हो जाते हैं; शरीर सिर्फ कुछ कर्मों के लिए रह जाता है।

पण्डितजी – उसे ही संस्कार कहते हैं।

श्रीरामकृष्ण – विज्ञानी सदा ही ईश्वर के दर्शन किया करता है। इसीलिए तो उसका इतना ढीला स्वभाव होता है। वह आँखें खोलकर भी ईश्वर के दर्शन करता है। कभी वह नित्य से लीला में आ जाता है और कभी लीला से नित्य में चला जाता है।

पण्डितजी – यह मैं नहीं समझा।

श्रीरामकृष्ण – 'नेति नेति' का विचार करके वह उसी नित्य और अखण्ड सच्चिदानन्द में पहुँच जाता है। वह इस तरह विचार करता है – वे न जीव हैं, न संसार हैं, न चौबीसों तत्त्व हैं। नित्य में पहुँचकर फिर वह देखता है, यह सब वे हीं हुए हैं – जीव, जगत् और चौबीसों तत्त्व – यह सब।

"दूध का दही जमाकर, फिर उसे मथकर मक्खन निकाला जाता है। परन्तु मक्खन के निकल आने पर वह देखता है, जिस मट्ठे का मक्खन है, उसी मक्खन का मट्ठा भी है। छाल का ही गूदा है और गूदे की ही छाला।"

पण्डितजी – (भूधर से सहास्य) – समझे? समझना बहुत मुश्किल है।

श्रीरामकृष्ण – मक्खन हुआ, तो मट्ठा भी हुआ है। मक्खन को सोचने लगे, तो साथ साथ मट्ठे को भी सोचता पड़ता है, क्योंकि मट्ठा न रहा तो मक्खन हो नहीं सकता। अतएव, नित्य को मानो तो लीला भी माननी होगी। अनुलोम और विलोम। साकार और निराकार के दर्शन कर लेने के बाद यह अवस्था है। साकार चिन्मय रूप है और निराकार अखण्ड सच्चिदानन्द।

"वे ही सब कुछ हुए हैं। इसीलिए विज्ञानी इस संसार को 'आनन्द की कुटिया' देखता है। और ज्ञानी के लिए यह संसार 'धोखे की टट्टी' है। रामप्रसाद ने 'धोखे की टट्टी' कहा है, इसीलिए किसी ने उत्तर दिया – 'यह संसार आनन्द की कुटिया है। मैं