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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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५५०श्रीरामकृष्णवचनामृत३० जून, १८८४

दही खाता हूँ और मजा लूटता हूँ। अरे वैद्य, तुझे बुद्धि भी नहीं है? तू इतने उथले में है? जरा जनक राजा को तो देख, वे कितने तेजस्वी थे, दोनों ओर वे संभालकर चलते थे, तभी तो दूध का कटोरा साफ कर देते थे!’ (सब हँसते हैं।)

“विज्ञानी को विशेष रूप से ईश्वर का आनन्द मिला है। किसी ने दूध की बात-ही-बात सुनी है, किसी ने दूध देखा भर है और किसी ने दूध पिया है। विज्ञानी ने दूध पिया है, पीकर स्वाद लिया है और हृष्ट-पुष्ट भी हुआ है।”

श्रीरामकृष्ण कुछ देर के लिए चुप हो गये। पण्डितजी से उन्होंने तम्बाकू पीने के लिए कहा। पण्डितजी दक्षिण-पूर्ववाले लम्बे बरामदे में तम्बाकू पीने चले गये।

(३)

ज्ञान और विज्ञान। गोपीभाव

पण्डितजी लौटकर फिर से भक्तों के साथ जमीन पर बैठ गये। श्रीरामकृष्ण छोटी खटिया पर बैठकर फिर वार्तालाप करने लगे।

श्रीरामकृष्ण – (पण्डितजी से) – यह बात तुमसे कहता हूँ। आनन्द तीन प्रकार के होते हैं – विषयानन्द, भजनानन्द और ब्रह्मानन्द। जिसमें लोग सदा ही लिप्त रहते हैं – जो कामिनी और कांचन का आनन्द है, उसे विषयानन्द कहते हैं। ईश्वर के नाम और गुणों का गान करने से जो आनन्द मिलता है, उसका नाम है भजनानन्द और ईश्वर के दर्शन में जो आनन्द है, उसका नाम है ब्रह्मानन्द। ब्रह्मानन्द को प्राप्त करके ऋषि स्वेच्छा-विहारी हो जाते थे।

“चैतन्यदेव की तीन तरह की अवस्थाएँ होती थीं – अन्तर्दशा, अर्धबाह्यदशा और बाह्यदशा। अन्तर्दशा में वे ईश्वर का दर्शन करके समाधिस्थ हो जाया करते थे – जड़-समाधि की अवस्था हो जाती थी। अर्धबाह्यदशा में बाहर का कुछ होश रहता था। बाह्यदशा में नाम और गुणों का कीर्तन करते थे।

हाजरा – (पण्डितजी से) – अब तो आपके सब सन्देह मिट गये न?

श्रीरामकृष्ण – (पण्डितजी से) – समाधि किसे कहते हैं? – जहाँ मन का लय हो जाता है। ज्ञानी को जड़-समाधि होती है – फिर ‘अहं’ नहीं रह जाता। भक्तियोग की समाधि को चेतन-समाधि कहते हैं। इसमें सेव्य और सेवक का ‘मैं’ रहता है – रस-रसिक का ‘मैं’ – स्वाद के विषय और स्वाद लेनेवाले का ‘मैं’। ईश्वर सेव्य हैं और भक्त सेवक; ईश्वर रस-स्वरूप हैं और भक्त रसिक। ईश्वर स्वाद के विषय हैं और भक्त स्वाद लेनेवाले। वह चीनी नहीं बन जाता, चीनी खाना पसन्द करता है।

पण्डितजी – वे अगर सम्पूर्ण ‘मैं’ का लय कर दें तो क्या हो? अगर चीनी बना लें तो?

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar