श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ नवम्बर, १८८३ परिच्छेद ५८ ३४१
एक श्री रजनीनाथ राय भी थे।
श्रीरामकृष्ण कहते हैं, “भाव के होने पर वायु स्थिर हो जाती है। अर्जुन ने जब लक्ष्यभेद किया, तब उनकी दृष्टि मछली की आँख पर ही थी – किसी दूसरी ओर नहीं। यहाँ तक कि आँख के सिवाय कोई दूसरा अंग उन्हें दीख ही नहीं पड़ा। ऐसी अवस्था में वायु स्थिर होती है, कुम्भक होता है।
“ईश्वरदर्शन का एक लक्षण यह है कि भीतर से महावायु घरघराती हुई सिर की ओर जाती है; तब समाधि होती है, भगवान् के दर्शन होते हैं।
कोरा पाण्डित्य मिथ्या है। ऐश्वर्य, वैभव, मान, पद सब मिथ्या है।
“जो पण्डित मात्र हैं किन्तु ईश्वर पर जिनकी भक्ति नहीं है उनकी बातें उलझनदार होती हैं। सामाध्यायी नाम के एक पण्डित ने कहा था, ‘ईश्वर नीरस है, तुम लोग अपनी भक्ति और प्रेम के द्वारा उसे सरस कर लो।’ जिन्हें वेदों ने ‘रसस्वरूप’ कहा है, उन्हें नीरस बतलाता है! इससे ज्ञात होता है कि वह मनुष्य नहीं जानता ईश्वर कौनसी वस्तु है; इसीलिए उसकी बातें इतनी उलझनदार हैं।
“एक ने कहा था, मेरे मामा के यहाँ घोड़ों की एक बड़ी गोशाला है! उसकी इस बात से समझना चाहिए कि घोड़ा एक भी नहीं है; क्योंकि घोड़े कभी गोशाला में नहीं रहते। (सब हँसते हैं।)
“किसी को ऐश्वर्य का – वैभव, सम्मान, पद आदि का – अहंकार होता है। यह सब दो दिन के लिए है। साथ कुछ भी न जाएगा। एक गीत में हैं –
(गीत का आशय) – ‘ऐ मन सोच ले, कोई किसी का नहीं है। तू इस संसार में वृथा ही मारा मारा फिरता है। मायाजाल में फँसकर दक्षिणाकाली को भूल न जाना। जिसके लिए तू इतना सोचता है, क्या वह तेरे साथ भी जाएगा? तेरी वही प्रेयसी, जब तू मर जाएगा तब तेरी लाश से अमंगल की शंका करके घर में पानी का छिड़काव करेगी। यह सोचना कि मुझे लोग मालिक जो कहते हैं, वह सिर्फ दो ही दिन के लिए है। जब कालाकाल के मालिक आ जाते हैं तब पहले के वही मालिक श्मशानघाट में फेंक दिये जाते हैं।’
“और धन का अहंकार भी न करना चाहिए। अगर कहो, मैं धनी हूँ। तो धनी भी एक-एक से बढ़कर हैं। सन्ध्या के बाद जब जुगनू उड़ता है, तब वह सोचता है, इस संसार को प्रकाश मैं दे रहा हूँ। परन्तु तारे ज्यों ही उगते हैं कि उसका अहंकार चला जाता है। तब तारे सोचने लगे, हमीं लोग संसार को प्रकाश देते हैं। कुछ देर बाद चन्द्रोदय हुआ। तब तारे लज्जा से म्लान हो गये। चन्द्रदेव सोचने लगे। मेरे ही आलोक से संसार हँस रहा है, संसार को प्रकाश मैं देता हूँ। देखते ही देखते सूर्य उगे, चन्द्र मलिन होकर ऐसे छिपे