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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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२६ नवम्बर, १८८३परिच्छेद ५८३३९

की ओर भी चील चक्कर काटने लगी। अन्त में, घबराहट के मारे उसके चक्कर लगाते हुए मछली उससे छूटकर जमीन पर गीर पड़ी। तब वे कौए चील को छोड़ मछली की ओर उड़े। चील तब निश्चिन्त होकर एक पेड़ की डाल पर जा बैठी। बैठी हुयी सोचने लगी, ‘कुल बखेड़े की जड़ यही मछली थी; अब वह मेरे पास नहीं है इसीलिए मैं निश्चिन्त हूँ।’

“अवधूत ने चील से यह शिक्षा प्राप्त की कि जब तक मछली साथ रहेगी अर्थात् वासना रहेगी, तब तक कर्म भी रहेगा, और कर्म के कारण चिन्ता और अशान्ति भी रहेगी। वासना का त्याग होने से ही कर्मों का क्षय हो जाता है और शान्ति मिलती है।

“परन्तु निष्काम कर्म अच्छा है। उससे अशान्ति नहीं होती। पर निष्काम कर्म करना बड़ा कठिन है। मनुष्य सोचता है कि मैं निष्काम कर्म कर रहा हूँ परन्तु कहाँ से कामना निकल पड़ती है, यह समझ में नहीं आता। यदि पहले की साधना अधिक हो तो उसके बल से कोई कोई निष्काम कर्म कर सकते हैं। ईश्वरदर्शन के बाद निष्काम कर्म अनायास ही किए जा सकते हैं। ईश्वरदर्शन के बाद प्रायः कर्म छूट जाते हैं। दो-एक मनुष्य (नारदादि) लोकशिक्षा के लिए कर्म करते हैं।

संन्यासी को संचय न करना चाहिए।

प्रेम के फलस्वरूप कर्मत्याग

“अवधूत की एक आचार्या और थी – मधुमक्खी। मधुमक्खी बड़े परिश्रम से कितने ही दिनों में मधु-संचय करती है, परन्तु उस मधु का भोग वह स्वयं नहीं कर पाती। छत्ता कोई दूसरा ही आकर तोड़ ले जाता है। मधुमक्खी से अवधूत को यह शिक्षा मिली कि संचय न करना चाहिए। साधु-सन्तों को सोलहों आने ईश्वर पर अवलम्बित रहना चाहिए। उन्हें संचय न करना चाहिए।

“यह संसारियों के लिए नहीं है। संसारी को संसार का भरणपोषण करना पड़ता है। इसीलिए उन्हें संचय की आवश्यकता होती है। पक्षी और सन्त संचयी नहीं होते, परन्तु चिड़ियाँ बच्चे देने पर संचय करती हैं – चोंच में दबाकर बच्चे के लिए खाना ले आती हैं।

“देखो विजय, साधु के साथ अगर बोरिया-बधना रहे – कपड़े की पन्द्रह गिरहवाली गठरी रहे, तो उस पर विश्वास न करना। मैंने बटतल्ले में ऐसे साधु देखे थे। दो-तीन बैठे हुए थे, कोई दाल के कंकड़ चुन रहा था, कोई कपड़ा सी रहा था और कोई बड़े आदमी के घर के भण्डारे की गप्प लड़ा रहा था, ‘अरे उस बाबू ने लाखों रुपये खर्च किए, साधुओं को खूब खिलाया – पूड़ी, जलेबी, पेड़ा, बरफी, मालपुआ, बहुतसी चीजें तैयार करायीं’।” (सब हँसते हैं।)

विजय – जी हाँ, गया में इस तरह के साधु मुझे भी देखने को मिले हैं। गया के साधु लोटावाले होते हैं। (सब हँसते हैं।)