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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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३३६श्रीरामकृष्णवचनामृत२६ नवम्बर, १८८३

प्रसन्नतापूर्वक वार्तालाप कर रहे हैं। समाजगृह में दीप जल चुका है, अब शीघ्र ही उपासना शुरू होगी।

श्रीरामकृष्ण बोले, "क्योंजी, क्या शिवनाथ न आएगा?" एक ब्राह्मभक्त ने कहा, "जी नहीं, आज उनको कई काम हैं आ न सकेंगे।"

श्रीरामकृष्ण - शिवनाथ को देखने से मुझे बड़ा आनन्द होता है। मानो भक्तिरस में डूबा हुआ है। और जिसे बहुत लोग मानते-जानते हैं उसमें ईश्वर की कुछ शक्ति अवश्य रहती है। परन्तु शिवनाथ में एक बहुत बड़ा दोष है - उसकी बात का कोई निश्चय नहीं रहता। मुझसे उसने कहा था, एक बार वहाँ (दक्षिणेश्वर) जाएँगे, परन्तु फिर नहीं आया और न कोई खबर ही भेजी; यह अच्छा नहीं है। एक यह भी कहा है कि सत्य बोलना कलिकाल की तपस्या है। दृढ़ता के साथ सत्य को पकड़े रहने से ईश्वरलाभ होता है। सत्य की दृढ़ता के न रहने से क्रमशः सब नष्ट हो जाता है। यही सोचकर मैं अगर कभी कह डालता हूँ, मुझे शौच को जाना है, फिर शौच को जाने की आवश्यकता न भी रहे, तो भी एक बार गड़वा लेकर झाऊतल्ले की ओर जाता हूँ। यही भय लगा रहता है कि कहीं सत्य की दृढ़ता न खो जाए। इस अवस्था के बाद हाथ में फूल लेकर माँ से मैंने कहा था, 'माँ, यह लो तुम अपना ज्ञान, यह लो अपना अज्ञान, मुझे शुद्धा भक्ति दो माँ; यह लो अपना भला, यह लो अपना बुरा, मुझे शुद्धा भक्ति दो माँ; यह लो अपना पुण्य, यह लो अपना पाप, मुझे शुद्धा भक्ति दो।' जब यह सब मैंने कहा था, तब यह बात नहीं कह सका कि माँ, यह लो अपना सत्य, यह लो अपना असत्य। माँ को सब कुछ तो दे सका, परन्तु सत्य न दे सका।

ब्राह्मसमाज की पद्धति के अनुसार उपासना होने लगी। आचार्यजी वेदी पर बैठ गए। उद्बोधन-मन्त्र के बाद आचार्यजी परब्रह्म को लक्ष्य करके वेदोक्त महामन्त्रों का उच्चारण करने लगे। ब्राह्मभक्तगण स्वर मिलाकर प्राचीन आर्यऋषियों के मुख से निकले हुए, उनकी पवित्र रसनाओं द्वारा उच्चारित नामों का कीर्तन करने लगे; कहने लगे -

"सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म, आनन्दरूपममृतं यद्विभाति, शान्तम् शिवमद्वैतम् शुद्धम-पापविद्धम्।"

प्रणवसंयुक्त यह ध्वनि भक्तों के हृदयाकाश में प्रतिध्वनित होने लगी। अनेकों के अन्तस्तल में वासना का निर्वाण-सा हो गया। चित्त बहुत-कुछ स्थिर और ध्यानोन्मुख होने लगा। सब की आँखें मुँदी हुई हैं - थोड़ी देर के लिए सब कोई वेदोक्त सगुण ब्रह्म का चिन्तन करने लगे।

श्रीरामकृष्णदेव भावमग्न हैं। निःस्पन्द, स्थिरदृष्टि, निर्वाक्, चित्रपुत्तलिका की तरह बैठे हुए हैं। आत्मापक्षी न जाने कहाँ आनन्दपूर्वक विहार कर रहा है, शरीर शून्य मन्दिर-सा पड़ा हुआ है।

समाधि के कुछ समय बाद श्रीरामकृष्णदेव आँखें खोलकर चारों ओर देख रहे हैं।