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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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· परिच्छेद ५८

सिंदुरियापाटी में ब्राह्मभक्तों के प्रति उपदेश

(१)

समाधि में

कार्तिक की कृष्णा एकादशी है, सोमवार, २६ नवम्बर १८८३ ई.। श्री मणिलाल मल्लिक के मकान में सिन्दूरिया-पट्टी ब्राह्मसमाज का अधिवेशन हुआ करता है। मकान चितपुर रास्ते पर है। समाज का अधिवेशन राजपथ के पास ही दुमँजले के सभागृह में हुआ करता है। आज समाज की वार्षिकी है; इसीलिए मणिलाल महोत्सव मना रहे हैं।

उपासनागृह आज आनन्दपूर्ण है, बाहर और भीतर हरे हरे पल्लवों, नाना प्रकार के फूलों और पुष्पमालाओ से सुशोभित हो रहा है। कमरे में भक्तगण बैठे हुए उपासना कब शुरू होगी इसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। कमरे के भीतर सब को जगह नहीं मिल पायी है, कई लोग पश्चिम ओरवाले छत पर टहल रहे हैं या जगह जगह पर रखी सुन्दर कुर्सियों पर बैठे हैं। बीच बीच में गृहस्वामी तथा उनके स्वजन आकर मधुर शब्दों से अभ्यागत भक्तों का स्वागत कर रहे हैं। शाम के पहले से ही ब्राह्मभक्तगण आने लगे हैं। उन्हें आज एक विशेष उत्साह है - वहाँ आज श्रीरामकृष्णदेव का शुभागमन होगा। केशव, विजय, शिवनाथ आदि ब्राह्मसमाज के भक्त नेताओं को श्रीरामकृष्णदेव बहुत प्यार करते थे। यही कारण है कि ब्राह्मभक्तों के वे इतने प्यारे हो गए थे। वे भगवत्प्रेम में मस्त रहते है; उनका प्रेम, उनका प्रांजल विश्वास, ईश्वर के साथ बालक की तरह उनकी बातचीत, ईश्वर के लिए उनका व्याकुल होकर रोना, माता मानकर स्त्री-जाति की पूजा, उनका विषयप्रसंग-वर्जन, तैलधारावत् सदा ही ईश्वर-प्रसंग करते रहना, उनका सर्वधर्म-समन्वय और अन्य धर्मों के प्रति लेशमात्र भी द्वेषभाव का न रहना, भगवद्भक्तों के लिए उनका रोना, इन सब कारणों से ब्राह्मभक्तों का चित्त उनकी ओर आकर्षित हो चुका था; इसीलिए आज कितने ही भक्त बहुत दूर से उनके दर्शन के लिए आए हुए हैं।

शिवनाथ और सत्यभाषण

उपासना के पूर्व श्रीरामकृष्ण विजयकृष्ण गोस्वामी और दूसरे ब्राह्मभक्तों के साथ