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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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परिच्छेद ५७

दक्षिणेश्वर में कार्तिकी पूर्णिमा

(१)

श्रीरामकृष्ण की अद्भुत स्थिति - नित्य-लीलायोग

आज मंगलवार, १६ अक्टूबर १८८३ ई.। बलराम के पिता दूसरे भक्तों के साथ उपस्थित हैं। बलराम के पिता परम वैष्णव हैं। हाथ में हरिनाम की माला रहती है, सदा जप करते रहते हैं।

कट्टर वैष्णवगण अन्य सम्प्रदाय के लोगों को उतना पसन्द नहीं करते। बलराम के पिता बीच बीच में श्रीरामकृष्ण का दर्शन करते हैं, उनका उन वैष्णवों का-सा भाव नहीं है।

श्रीरामकृष्ण – जिनका उदार भाव है वे सभी देवताओं को मानते हैं, – कृष्ण, काली, शिव, राम आदि।

बलराम के पिता – हाँ, जिस प्रकार एक पति, अलग अलग पोशाक में।

श्रीरामकृष्ण – परन्तु निष्ठाभक्ति एक चीज है। गोपियाँ जब मथुरा में गयीं तो पगड़ी पहने हुए कृष्ण को देखकर उन्होंने घूँघट काढ़ लिया और कहा, 'यह कौन है! हमारे पीतवस्त्रधारी, मोहनचूड़ावाले श्रीकृष्ण कहाँ हैं?'

"हनुमान की भी निष्ठाभक्ति है। द्वापर युग में द्वारका में जब आए तो कृष्ण ने रुक्मिणी से कहा, 'हनुमान रामरूप न देखने से सन्तुष्ट न होगा।' इसलिए रामरूप में उन्हें दर्शन दिया!

"कौन जाने भाई, मेरी यही एक स्थिति है। मैं केवल नित्य से लीला में उतर आता हूँ और फिर लीला से नित्य में चला जाता हूँ।

"नित्य में पहुँचने का नाम है ब्रह्मज्ञान। बड़ा कठिन है। विषयबुद्धि एकदम नष्ट हुए बिना कुछ नहीं होता। हिमालय के घर जब भगवती ने जन्म लिया तो पिता को अनेक रूपों में दर्शन दिया। हिमालय ने उनसे कहा, 'मैं ब्रह्मदर्शन की इच्छा करता हूँ।' तब भगवती ने कहा, 'पिताजी, यदि वैसी इच्छा हो तो सत्संग करना पड़ेगा। संसार से अलग होकर बीच बीच में निर्जन में साधुसंग कीजिए।'

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar